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सत्ता पर विराजमान सरकारों को आज तक नहीं पता चला 'राजस्थान में कितने हैं किसान'

राजस्थान के बजट की बात करें तो इस बार कुल बजट का तकरीबन बीस फीसदी किसानों पर खर्च करने का लक्ष्य रखा गया है.

सत्ता पर विराजमान सरकारों को आज तक नहीं पता चला 'राजस्थान में कितने हैं किसान'
सरकार चाहे केन्द्र की हो या राज्य की, योजनाओं का मूल आधार किसान ही है.

जयपुर: बात राज्य की हो या केन्द्र सरकार की, सरकार में बैठे ज्यादातर नेता किसान के हित की बात करते हैं. किसान हित में किसी को न तो ऐतराज हो सकता है और होना भी नहीं चाहिए, लेकिन सरकारों की नीयत पर तब सवाल खड़े होते हैं, जब उन्हें यही नहीं पता कि आखिर किसानों की संख्या कितनी है? राजस्थान भी इस मामले में अछूता नहीं है. सरकार के मंत्री कहते हैं कि प्रदेश में कभी किसानों की अलग से गिनती की ही नहीं गई.

सरकार चाहे केन्द्र की हो या राज्य की, योजनाओं का मूल आधार किसान ही है. हर कोई किसान को मजबूत करने की बात करता है. फिर चाहे 'सबका साथ-सबका विकास' का नारा देने वाले हों या 'आम आदमी के साथ अपनी पार्टी का हाथ' रखने की बात करने वाले. राजस्थान के बजट की बात करें तो इस बार कुल बजट का तकरीबन बीस फीसदी किसानों पर खर्च करने का लक्ष्य रखा गया है. इसमें कृषि और उससे जुड़ी दूसरी सेवाओं पर 8 हज़ार 57 करोड़ रुपए, ग्रामीण विकास पर 12 हज़ार 873 करोड़ रुपए और सिंचाई पर दो हज़ार 939 करोड़ रुपए के साथ आर्थिक, सामाजिक और सामुदायिक सेवाओं के दूसरे खर्चे भी शामिल हैं. 

इन सबके बीच हैरानी की बात यह है कि सरकार को यह पता ही नहीं है कि जिन किसानों के लिए यह पैसा खर्च होना है उनकी जनसंख्या कितनी है? खुद सहकारिता मन्त्री उदयलाल आंजना कहते हैं कि सरकार के पास किसानों की संख्या का कोई रिकॉर्ड नहीं है.

सरकार के मंत्री ने किसानों की संख्या का कोई रिकॉर्ड नहीं होने की बात कह तो दी, लेकिन वे यह नहीं बता सके कि अगर किसानों का आंकड़ा नहीं है. तो फिर सरकार किसानों के लिए योजनाएं किस आधार पर बनाती है?. इस पर आंजना का तर्क है कि अभी तक प्रदेश में किसानों की जोत के आधार पर काम होता आया है.

सहकारिता मन्त्री के इस बयान के बाद तो मानों विपक्ष को भी मुद्दा मिल गया हो. नेता प्रतिपक्ष गुलाबचन्द कटारिया कहते हैं कि अगर किसानों का कोई रिकॉर्ड नहीं है तो सरकार क्या कर रही है?. कटारिया कहते हैं कि सरकार कोई दिवालिया थोड़े ही हो गई है जो किसानों की गिनती नहीं करा सकती.

कटारिया ने भी सरकार की खामी पर सवाल पूछते ही घेरने में कोई संकोच नहीं किया, लेकिन उनका यह जवाब मौजूदा सरकार के साथ ही प्रदेश में अब तक सत्ता पर काबिज रही बीजेपी सरकारों पर भी उतना ही गम्भीर सवाल खड़ा करता है. ऐसा इसलिए क्योंकि सरकार में रहने के दौरान उनके नेताओं और सरकार के मुखिया ने किसानों की गिनती क्यों नहीं कराई? इधर अपनी खामी को मानते हुए सहकारिता मन्त्री उदयलाल आंजना कहते हैं कि उनकी सरकार के सामने अब यह मुद्दा आया है तो वे किसानों की जनसंख्या की अलग से गिनती पर भी काम आगे बढ़ाएंगे.

प्रदेश में किसानों की गिनती की बात करने वाली सरकार इस काम को शुरू कब कराएगी इस बारे में न तो अभी कोई तारीख़ तय की है, न ही दावे से कुछ कहा जा सकता है. सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि अगर किसानों की संख्या का ही अता-पता नहीं है तो सरकार के पास किसानों की कर्ज माफी का आंकड़ा कहां से आया और विपक्ष अब तक कर्ज माफी से वंचित रहे किसानों का आंकड़ा कहां से लाया? सवाल यह भी कि वाकई किसानों का भला कोई चाहता भी है या सरकार और विपक्ष में चाहे जो भी पार्टी हो बस किसानों के नाम पर यह नूरा कुश्ती यूं ही चलती रहेगी?