परंपरा को जीवित रखने की पहल, हाड़ कंपाती ठंड़ में हरबोला कर रहे कुछ ऐसा...

मधुर वाणी में गाने की आवाज सुन आस-पड़ोस के निवासी जाग गए और जाकर देखा तो हर कोई आश्चर्यचकित रह गया. 

परंपरा को जीवित रखने की पहल, हाड़ कंपाती ठंड़ में हरबोला कर रहे कुछ ऐसा...
हाड़ कंपाती ठंड़ में हरबोला पेड पर बैठकर गाना गा रहे हैं. (प्रतीकात्मक तस्वीर)

महेश परिहार/झालावाड़: राजस्थान के झालावाड जिले मे इन दिनों हाड़ कंपाने वाली सर्दी ने लोगों को घर में दुबकने को मजबूर कर दिया है. सार्वजिनक स्थानों पर लोग अलाव के सहारे अपनी जिंदगी को व्यतीत करने को मजबूर हैं. वहीं, दूसरी ओर ऐसी सर्दी में सुबह 5 बजे से झालावाड़ जिले के पिड़ावा कस्बे के माता चौकी स्थित एक पेड़ की ऊंची डाल पर एक हरबोला बैठ गया और भजन तथा क्षेत्र की वीरगाथाओ के गीत गाने लगा.

मधुर वाणी में गाने की आवाज सुन आस-पड़ोस के निवासी जाग गए और जाकर देखा तो हर कोई आश्चर्यचकित रह गया. क्योंकि कड़ाके की ठंड में जहां सभी रजाई में दुबके थे. उस दौरान परंपरा को जीवित रखने के लिए एक हरबोला कड़ाके की ठंड में एक पेड़ की ऊंची डाल पर बैठ कर लोकगीतों से स्थानीय लोगों को जगाने का प्रयास कर रहा था. देखते ही देखते मधुर वाणी सुनकर कड़ाके की ठंड में लोगों की भीड़ जमा हो गई और हरबोले को नीचे उतारने का प्रयास शुरू किया गया.

काफी मशक्कत के बाद कस्बे के प्रतिष्ठित व्यक्तियों ने मान-मनुहार कर हरबोला राजकुमार रणे को नीचे उतारा और सम्मानजनक राशि देकर उसके द्वारा परंपरा निर्वहन का आभार जताया. दरअसल, मध्य प्रदेश के निमाड़ क्षेत्र खंडवा से आए हरबोला राजकुमार रणे ने बताया कि निमाड़ व बुंदेलखंड से दर्जनो हरबोले क्षेत्र में आए हुए हैं, जो झांसी की रानी, क्षेत्रीय किवदंतियों, लोक भजनों और वीर गाथाओ को कहीं पेड़ पर, तो कही ऊंची मुंडेर पर बैठकर सुनाते है. फिर उसी क्षेत्र के प्रभावशाली व्यक्ति या जनता उन्हें प्रोत्साहन राशि देकर नीचे उतारती है. यही हरबोलों की आजीविका का एक मात्र साधन भी है. पीढ़ी दर पीढ़ी ये लोग इस पंरपरा को निभा रहे हैं और आगे भी निभाते रहेंगे.