भरतपुर: साइबेरियन क्रेन को उद्यान में वापस लाने की उम्मीद हुई धूमिल, यह है वजह...

अब करीब सात हजार किलोमीटर का सफर तय कर भरतपुर के विश्वविख्यात घना तक पहुंचने वाले साइबेरियन क्रेन का आना सपना सा बनकर रह गया है. 

भरतपुर: साइबेरियन क्रेन को उद्यान में वापस लाने की उम्मीद हुई धूमिल, यह है वजह...
साइबेरियन क्रेन को उद्यान में वापस लाने की उम्मीद हुई धूमिल.
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भरतपुर: भरतपुर के केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान की पहचान रहे साइबेरियन क्रेन को उद्यान में वापस लाने की उम्मीद धीरे-धीरे धूमिल हो चुकी है. करीब आठ पहले जिस प्रोजेक्ट को तत्कालीन राज्य सरकार ने स्वीकृति दी थी और प्रस्ताव को वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को भेजा गया था. लेकिन दिल्ली में जाकर यह प्रस्ताव फंस गया जो अभी फाइलों में दबा हुआ है.

अब करीब सात हजार किलोमीटर का सफर तय कर भरतपुर के विश्वविख्यात घना तक पहुंचने वाले साइबेरियन क्रेन का आना सपना सा बनकर रह गया है. अंतिम बार साईबेरियन साल 2001-02 में दिखाई दिए थे, तब एक जोड़ा आया था लेकिन उसके बाद वापस साईबेरियन उद्यान नहीं आए.

साईबेरियन क्रेन के नहीं आने की बड़ी वजह उस समय अफगानिस्तान में छिड़ा गृह युद्ध था. साईबेरियन क्रेन का रुट अफगानिस्तान होते हुए था. लेकिन रास्ते में बड़ी संख्या में शिकार होने से इनका तय रुट गड़बड़ा गया और बाद में धीरे-धीरे साईबेरियन के्रन का आना ही बंद हो गया.

घना की पहचान सैकड़ों मील का फासला तय कर आने वाले साईबेरियन क्रेनों से थी. लेकिन साल 2001-02 के बाद यह अंतिम बार घना में दिखे थे. साईबेरियन को वापस लाने के लिए साल 2012 में अंतरराष्ट्रीय स्तर के वन्यजीव पर्यावरण से जुड़े विशेषज्ञों की एक कार्यशाला सालिम अली सेंटर में हुई थी.

उसमें साईबेरियन के्रन को वापस लाने पर मंथन हुआ था. अंत में विशेषज्ञों ने फौरी तौर पर साईबेरियन के्रन का एक जोड़ा घना लाने की बात कही. इसके घना में बकायदा रिसर्च एंड ब्रीडिंग सेंट स्थापित करने पर विचार-विमर्श हुआ था. विशेषज्ञों ने उद्यान में सेमी कैप्टिव सेंटर स्थापित कर बेल्जियम स्थित ब्रीडिंग एवं कन्जरवेशन केन्द्र से साईबेयिरन क्रेन का जोड़ा लाकर उद्यान में रखने का सुझाव दिया था. जिस पर केन्द्र के विशेषज्ञ डॉ. गिरलिजिंग ने घना को क्रेन का जोड़ा देने पर सहमति भी दी थी.

उस समय राज्य सरकार ने 1.10 करोड़ रुपए की स्वीकृति जारी की थी. सरकार ने केंद्र सरकार के वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के पास प्रोजेक्ट को भेजा. जून 2012 में प्रोजेक्ट राष्ट्रीय जन्तुयालय नई दिल्ली को दिया गया. इससे पहले जनवरी 2012 को तत्कालीन पर्यटन मंत्री बीना काक ने वन विभाग के अधिकारियों के साथ इस योजना को स्वीकृति दी थी। शुरुआत में केन्द्र स्तर पर थोड़े प्रयास हुए लेकिन बाद में मामला ठण्डे बस्ते चला गया.

साल 1964 में पहुंचे थे 200 क्रेन
केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान में साल 1964-65 में सर्वाधिक साइबेरियन के्रन करीब 200 नजर आए थे. इसके बाद 1969-70 में 76, वर्ष 1974-75 में 63, वर्ष 1975-76 में 61, वर्ष 1976-77 में 57, वर्ष 1977-78 में 55, 1978-79 में 43, 1979-80 में 33 तथा वर्ष 1980-81 में 33 ही रह गए. इसके बाद वर्ष 1984-85 में 41 क्रेन दिखे. लेकिन इसके बाद कमी आती चली गई. 1990-91 में 10 ही रह गए। यह अफगानिस्तान गृहयुद्ध का समय था.

वर्ष 1991-92 में 6 आर वर्ष 1992-93 में 5 ही रह गए. जबकि 1993-94 में नजर नहीं आए. इसके बाद 1995-96 और 1996-97 में 3-3 दिखे. इसके बाद वर्ष 1997-98 से 2001-02 तक केवल 2 ही क्रेन रिकॉर्ड हुई. उसके बाद के्रन नहीं आई.

1985 में मिला था विश्व विरासत का तमगा
प्रदेश से ज्यादा केवलादेव की शौहरत देश और विदेश में है. घना में हर साल लाखों की संख्या देशी-विदेशी सैलानी भ्रमण करने पहुंचते हैं. घना पहले रिसायत काल के समय राजा-महाराजाओं के लिए शिकारगाह होता था और यहां पर राजस्थान समेत देशभर के रिसायतों के राजा और बड़े अधिकारी शिकार करने आते थे. आजादी के बाद घना को केन्द्र सरकार ने 1982 में राष्ट्रीय उद्यान और बाद में इसकी प्रसिद्धि को देखते हुए यूनेस्को (UNESCO) ने वर्ष 1985 में घना को विश्व विरासत की सूची में शामिल किया था.