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राजस्थान में प्रशासनिक लापरवाही का शिकार हो रहे तृतीय श्रेणी के सैंकड़ो शिक्षक

संशोधित परिणाम में चयनित करीब 567 शिक्षक ऐसे हैं जिनको 4 साल बीत जाने के बाद भी ना तो वेतन नियमितीकरण का लाभ मिला और ना ही उनके स्थाईकरण के आदेश जारी हुए. 

राजस्थान में प्रशासनिक लापरवाही का शिकार हो रहे तृतीय श्रेणी के सैंकड़ो शिक्षक
शिक्षक अपनी समस्याओं के समाधान के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं.

टोंक: प्रदेश में सरकारी नौकरी करने का सपना देखने वाले बेरोजगारों के लिए ये लक्ष्य प्राप्त करना किसी युद्ध जीतने से कम नहीं है. प्रशासनिक लापरवाही और विभागीय अधिकारियों की लेट-लतीफी किसी भर्ती को पूरा करने में सालों का समय लगा देती है. अगर सब मुश्किलों से पार पाने के बाद सरकारी नौकरी मिल भी जाती है, तो उसके बाद भी समस्याएं कम होने का नाम नहीं लेती है.

कुछ ऐसे ही हालातों से गुजर रहे हैं प्रदेश के 567 तृतीय श्रेणी शिक्षक. साल 2013 में करीब 21 हजार पदों पर निकाली गई तृतीय श्रेणी शिक्षक भर्ती सभी मुश्किलों को पार करने के बाद 2015 में पूरी हुई. जिनका परिवीक्षा काल 2017 में पूरा हुआ, लेकिन संशोधित परिणाम में चयनित करीब 567 शिक्षक ऐसे हैं जिनको 4 साल बीत जाने के बाद भी ना तो वेतन नियमितीकरण का लाभ मिला और ना ही उनके स्थाईकरण के आदेश जारी हुए. अब ये शिक्षक अपनी समस्याओं के समाधान के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं.

तृतीय श्रेणी शिक्षक भर्ती 2013 में करीब 21 हजार पदों पर भर्ती निकाली गई थी. 2015 में इन पदों पर नियुक्ति दी गई. इनमें से 11 जिलों के 567 शिक्षक ऐसे थे जिनको संशोधित परिणाम के बाद नियुक्ति दी गई. संशोधित परिणाम में लगाए गए इन शिक्षकों के लिए विभाग का दोहरा रवैया लगातार बरकरार है. 4 साल बीत जाने के बाद भी ये शिक्षक प्रोबेशन काल में मिलने वाले 21 हजार रुपये के वेतन पर ही काम करने को मजबूर हैं. 

वहीं विभाग की ओर से ना तो इन शिक्षकों के स्थाई करण आदेश जारी किए गए और ना ही इन शिक्षकों का वेतन नियमितीकरण किया गया. शिक्षक दानिश अख्तर ने बताया की पिछले 2 सालों से लगातार विभाग के चक्कर काटे जा रहे हैं. वर्ष 2017 में शेष शिक्षकों के स्थाईकरण आदेश भी जारी कर दिए गए तो वहीं उनका वेतन नियमितीकरण भी कर दिया गया, लेकिन 11 जिलों के 567 शिक्षकों के साथ ही दोगला व्यवहार किया जा रहा है. 

संशोधित परिणाम में लगे शिक्षकों में से 567 ऐसे शिक्षक हैं जिनको अभी तक स्थाईकरण और वेतन नियमितीकरण का लाभ नहीं मिला. ऐसे में इन शिक्षकों द्वारा जोधपुर हाईकोर्ट और हाईकोर्ट जयपुर खण्ड पीठ में भी याचिका लगाई गई. जिस पर हाईकोर्ट जयपुर खण्डपीठ ने 10 जनवरी 2018 को इन शिक्षकों के पक्ष में आदेश जारी किए. वहीं दूसरी ओर जोधपुर हाईकोर्ट पीठ ने भी 9 मई 2018 को पीड़ित शिक्षकों के पक्ष में आदेश जारी कर दो माह में इनके स्थाईकरण और वेतन नियमितीकरण के आदेश दिए, लेकिन शिक्षा विभाग ने अदालती आदेशों की अवेहलना करते हुए एक साल बीत जाने के बाद भी ना तो स्थाईकरण के आदेश जारी किए ना ही वेतन नियमितीकरण के आदेश.

ऐसे में बीते चार सालों से संघर्ष कर रहे इन शिक्षकों के अब आर्थिक हालात भी खराब होते जा रहे है. शिक्षिका निशा शर्मा ने बताया की अपने घर से दूर रहकर शिक्षक कार्य में लगे हुए हैं, लेकिन विभाग की ओर से महज 21 हजार रुपये का वेतन दिया जा रहा है. जबकि हमारे साथ ही लगे शिक्षक स्थाई भी हो चुके हैं साथ ही वेतन नियमितीकरण के बाद करीब 37 हजार से 40 हजार रुपये का वेतन भुगतान हो रहा है.

बहरहाल, जोधपुर, टोंक, भीलवाड़ा, बारां, झालावाड़, कोटा, सीकर सहित 11 ऐसे जिले हैं जहां के 567 तृतीय श्रेणी शिक्षक अपनी समस्या समाधान के लिए हर दर के चक्कर काट रहे हैं. दूसरी ओर शिक्षा विभाग इतना बड़ा हो गया है कि अब उसे अदालती आदेशों की भी कोई परवाह नहीं है.