जयपुर लिट्रेचर फेस्टिवल: जावेद अख्तर, शबाना आजमी ने बेबाकी से रखी अपनी राय

इस दौरान जावेद अख्तर ने कहा कि भाषा एक गाड़ी है, जो आपकी एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को जोड़ती है.

जयपुर लिट्रेचर फेस्टिवल: जावेद अख्तर, शबाना आजमी ने बेबाकी से रखी अपनी राय
जावेद अख्तर, शबाना आजमी ने साहित्य, फिल्म, उर्दू, धर्म पर अपनी राय रखी. (फोटो साभार:INDIA)

आशीष चौहान, जयपुर: जी जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के दूसरे दिन फ्रंट लॉन में जान निसार एंड कैफी सेशन हुआ. इस सेशन के दौरान प्रख्यात शायर और लेखक जावेद अख्तर, उनकी पत्नी शबाना आजमी और लैंग्वेज ट्रांसलेटर पवन के. वर्मा ने हिस्सा लिया. 

इस दौरान भाषा और साहित्य पर बेबाकी से बोलते हुए जावेद अख्तर ने कहा कि भाषा एक गाड़ी है, जो आपको एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी से जोड़ती है. आप एक जुबान को मार दीजिए आप जमीन से कट जाएंगे. आप एक जुबान से कट गए तो समझो जमीन से कट गए. इसकी बानगी आपको समाज में आज के दौर में साफ दिखाई दे रहा है.

सरकार की प्राथमिकता में शिक्षा में नहीं रहा साहित्य

उन्होंने यह भी कहा कि ऐसा सिर्फ हिंदी और उर्दू में नहीं बल्कि हर भाषा में नजर आ रहा है. पिछले 50 सालों से हमारी प्राथमिकताओं में शिक्षा में साहित्य नहीं रहा. ये सब इसलिए हुआ कि पिछले कई सालों में सोच यह बदल गई है कि वो चीज जिससे आप पैसा कमा सकें वो शिक्षा और ज्ञान जरुरी है बाकी सब बेकार है. इससे भाषा का नुकसान हुआ है. इसलिए आज की पीढ़ी अपनी जड़ों को ढूंढ रही है. 

वहीं, भाषा के हुआ नुकसान आज के दौर की फिल्मों, गानों व इनकी धुनों में भी नजर आ रहा है. किसी को कोई तकलीफ का अहसास नहीं हो रहा है. ये बड़े ही दुख की बात है. लेकिन अब युवा पीढ़ी में बदलाव आ रहा है. वे शायरी, भाषा, जुबान और अपनी जड़ों में इंटरेस्टेड हो रहे हैं. अब हिंदी फिल्में भी ऐसी बन रही हैं. 

भाषा का धर्म से कोई लेना देना नहीं

कार्यक्रम में मशहुर अभिनेत्री शबाना आजमी ने कहा कि फिल्मों में जान बूझकर ये गलतफहमी पैदा की गई है कि उर्दू मुसलमानों की भाषा और हिंदी हिंदुओं की भाषा है. क्योंकि जुबान किसी धर्म से नहीं जुड़ी होती, बल्कि क्षेत्र से जुड़ी होती थी और इसके साथ बहुत ज्यादती हुई है. हिंदी फिल्मों में बहुत देर तक ऐसा देखा गया है. जबकि पहले ऐसा नहीं था. कोई भी भाषा अपने तक सीमित हो जाए तो भाषा और लोगों का नुकसान है. 

कैफी आजमी और जान निसार पर ट्रांसलेशन का काम कर रहे पवन कुमार वर्मा ने कहा कि कोई भी भाषा अपने तक सीमित हो जाए तो भाषा और लोगों का नुकसान है. यदि आप भाषा का अच्छा ट्रांसलेशन नहीं करते हैं. तो कैसे आप भाषा और उसके अर्थ और उसके मायनों को समझेंगे.

शबाना ने पढ़ी कैफी की लिखी नज्म

इस दौरान शबाना आजमी ने कैफी आजमी की 70 साल पहले लिखी नज्म औरत "जिंदगी जेहद में है, सब्र के काबू में नहीं" पढ़ी. जबकि इसका ट्रांसलेशन पवन कुमार वर्मा ने पढ़ा. शबाना ने कहा, जान निसार अख्तर एकमात्र शायर थे जिन्होंने अपनी बीवी के हर एक्शन को शायरी में ढ़ाला था.