जयपुर: सतीश पूनिया की हिदायत का हुआ असर, निलंबित होने से बचे BJP के तीन जिलाध्यक्ष

बीजेपी ने सरकार की पहली सालगिरह पर विरोध जताने के लिए गांधी सर्किल पर सांकेतिक उपवास रखा और धरना दिया. 

जयपुर: सतीश पूनिया की हिदायत का हुआ असर, निलंबित होने से बचे BJP के तीन जिलाध्यक्ष
बीजेपी प्रदेशाध्यक्ष सतीश पूनिया

शशि मोहन/जयपुर: बीजेपी ने सरकार की पहली सालगिरह पर विरोध जताने के लिए गांधी सर्किल पर सांकेतिक उपवास रखा और धरना दिया. राष्ट्रपिता की प्रतिमा के सामने बीजेपी ने धरने का फ़ैसला लिया तो यह बीजेपी कार्यकर्ताओं के लिए नया अनुभव था. लेकिन कहा जाता है कि राजनीतिक में कोई भी काम बिना कारण नहीं होता. इस फ़ैसले के पीछे भी कुछ महत्वपूर्ण कारण थे. इस धरने में एक खास बात बीजेपी प्रदेशाध्यक्ष सतीश पूनिया का बड़े असर की भी थी. पूनिया कि हिदायत के बाद इस धरने में जो कार्यकर्ता पहुंचे उनकी संख्या पिछले दो धरनों में आए कुल कार्यकर्ताओं से ज्यादा थी.

पूनिया की हिदायत का असर
दरअसल, अपनी सॉफ्ट छवि के लिए अलग पहचान रखने वाले सतीश पूनिया कार्यकर्ताओं के अध्यक्ष माने जाते हैं. लेकिन पिछले कुछ प्रदर्शनों के दौरान पूनिया की इसी सॉफ्ट छवि के चलते उन्हें हल्के में लेता देखा गया. बीजेपी ही नेताओं की कोशिशों के बाद भी धरनों में भीड़ नहीं जुट रही थी. यहां तक की ज़िला स्तर के विरोध प्रदर्शन में जयपुर से बीजेपी के तीन संगठन ज़िलों की ताकत झोंकने के बाद भी कार्यकर्ताओं की संख्या कम रह जाती. इसके चलते पिछले दो धरनों में तो सतीश पूनियां ने कार्यकर्ताओं के इंतजार के बीच अपना कार्यक्रम ही बदल लिया।.

यहां तक कि राफेल मामले पर देश और मोदी से माफी मांगे जाने जैसे मुद्दे पर भी बीजेपी के विरोध प्रदर्शन में महज 81 कार्यकर्ता ही पहुंचे तो पूनियां ने आखिरी वक्त पर धरने पर पहुंचने का अपना कार्यक्रम स्थगित कर दिया. इससे पहले एक नवम्बर के दिन स्टेट हाईवे पर निजी वाहनों से टोल वसूली के खिलाफ़ दिए धरने में भी ऐसा ही हुआ.

लगातार दो विरोध प्रदर्शन में कम भीड़ जुटने से नाराज़ सतीश पूनिया ने इस बार जयपुर के दो ज़िलाध्यक्षों और शहर अध्यक्ष की गैर मौजूदगी में उनके प्रतिनिधि और शहर महामन्त्री को दो टूक हिदायत देते हुए कहा कि अबकी बार धरने में कार्यकर्ताओं का आंकड़ा 81 तक ही रहा तो ज़िलाअध्यक्ष अपना निलम्बन तय समझें. शनिवार को दी गई पूनिया की इस हिदायत के बाद ज़िलाध्यक्षों ने अपनी ताकत भी लगाई और इस बार गांधी सर्किल पर हुए धरने पर बीजेपी के कार्यकर्ताओं की संख्या भी पहुंची।

शहर अध्यक्ष निजी काम में व्यस्त
बीजेपी के इस प्रदर्शन के दौरान जयपुर देहात उत्तर और दक्षिण के ज़िलाध्यक्ष तो दिखाई दिए लेकिन शहर अध्यक्ष मोहनलाल गुप्ता नदारद रहे. बताया गया कि अपने किसी रिश्तेदार के यहां पारिवारिक कार्यक्रम के सिलसिले में मोहनलाल गुप्ता दुबई गए हैं. इसके चलते भी बीजेपी का धरना कलेक्ट्रेट से गांधी सर्किल पर शिफ्ट हुआ. दरअसल, पार्टी के विरोध प्रदर्शनों और दूसरे कार्यक्रमों में भीड़ खींचने के मामले में बीजेपी नेता पूर्व मन्त्री और मालवीय नगर विधायक कालीचरण सराफ का लौहा मानते हैं. संभवतया यही कारण रहा कि बीजेपी ने इस उपवास को मालवीय नगर विधानसभा क्षेत्र में शिफ्ट किया. अपनी इस परीक्षा में कालीचरण काफ़ी हद तक कामयाब भी दिखे. लेकिन इस भीड़ से अपने समर्थन में लगे नारों के बीच सतीश पूनिया ने आमेर विधानसभा क्षेत्र से भी अच्छी भीड़ आने का प्रमाण पत्र पार्टी कार्यकर्ताओं को दे दिया.

बीजेपी के इस धरने में भीड़ जुटाने के लिए जयपुर देहात उत्तर के ज़िलाध्यक्ष रामलाल शर्मा और देहात दक्षिण के रामानन्द गुर्जर ने अपनी ताकत लगाई. शहर के नज़रिये से देखा जाए तो सबसे ज्यादा भीड़ कालीचरण सराफ के मालवीय नगर विधानसभा क्षेत्र से ही आई. सरकार के एक साल के कामकाज के खिलाफ़ बीजेपी के सांकेतिक उपवास और धरने में आए लोगों की संख्या से सतीश पूनिया संतुष्ट तो दिखे. लेकिन संगठन के जानकार कहते हैं कि सरकार के खिलाफ़ प्रदर्शन में भीड़ जुटाने का तरीका इतना बेरूखी भरा है कि कार्यकर्ता आना ही नहीं चाहता.

वहीं, बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता ने बताया कि आमतौर पर ज़िलाध्यक्ष या उनकी तरफ़ से तय प्रतिनिधि व्हाट्सएप्प पर मैसेज डालकर सूचना भेजे जाने की इतिश्री मान लेते हैं. बीजेपी नेता ने कहा कि इस तरह की सूचना को कौन कितनी गम्भीरता से लेता है और कितनी नहीं यह मैसेज भेजे जाने वाले कार्यकर्ता के स्तर और उसकी गम्भीरत पर भी निर्भर करता है.
 
बीजेपी के वरिष्ठ नेता बताते हैं कि अगर किसी प्रदर्शन में वाकई में भीड़ लाने की मंशा ही हो तो एक-एक मण्डल में 200 से ज्यादा मण्डल पदाधिकारी होते हैं. उन पदाधिकारियों को बुला लिया जाए तो ही भीड़ की स्थिति संतोषजनक हो सकती है. लेकिन इस पर कोई गम्भीरता से काम ही नहीं करता. इसके साथ ही पार्टी के ही लोग बताते हैं कि राजस्थान में विपक्ष में आने के बाद पहले ही साल में पार्टी इतने ज्यादा कार्यक्रम कर रही है कि कार्यकर्ताओं को अपने काम-धंधे की कीमत पर ऐसे विरोध प्रदर्शनों में लाना बड़ी चुनौती है. लेकिन सवाल तो यह भी है कि इन तमाम मुश्किलों के बाद भी अगर पार्टी के कार्यक्रमों में लोगों की संख्या बढ़ानी हो तो क्या हर बार ज़िलाध्यक्षों को निलम्बन की हुड़की ही देनी होगी.