युवाओं के लिए मुश्किल हुआ EWS प्रमाण पत्र बनवाना, कोटा में बाबूओं की लापरवाही पड़ रही है महंगी

केंद्र सरकार द्वारा सवर्णों को आर्थिक आधार पर दस फीसदी आरक्षण देने के बाद राज्य सरकार द्वारा आठ लाख की सीमा की पात्रता पर आरक्षण देने के आदेश के बावजूद पात्र लोगों को आरक्षण का लाभ नहीं मिल पा रहा है.

युवाओं के लिए मुश्किल हुआ EWS प्रमाण पत्र बनवाना, कोटा में बाबूओं की लापरवाही पड़ रही है महंगी

कोटा: जनरल केटेगरी के लिए प्रदेश सरकार ने बड़ी राहत दी है. स्थाई सम्पत्ति सम्बंधी अनिवार्यता में छूट के प्रावधान किए और सामान्य वर्ग को बड़ी राहत मिली लेकिन कोटा उपखड कार्यलय में आज भी EWS सर्टिफ़िकेट के लिए युवा दर दर भटकने पर मजबूर हैं. वजह यह है कि दफ्तर में बाबूगिरी की इतनी भेंट चढ़ा हुआ है कि इन्हें EWS को लेकर सरकार के जारी नए नियम नजर नहीं आते. यहां नज़र आती है तो बस बाबुओं की वो जिद जिसके आगे बेरोजगार युवा न केवल लाचार हैं बल्कि इन दफ्तरों के चक्कर काट काट परेशान हैं.

केंद्र सरकार द्वारा सवर्णों को आर्थिक आधार पर दस फीसदी आरक्षण देने के बाद राज्य सरकार द्वारा आठ लाख की सीमा की पात्रता पर आरक्षण देने के आदेश के बावजूद पात्र लोगों को आरक्षण का लाभ नहीं मिल पा रहा है. प्रदेश सरकार ने जनरल केटेगरी के लिए स्थाई सम्पत्ति सम्बंधी अनिवार्यता में छूट के प्रावधान किए और सामान्य वर्ग को बड़ी राहत दी और आदेश जारी किए लेकिन कोटा में सरकारी कारिंदो को सरकार के नियम और आदेश नहीं अपने खुद के नियम और आदेशों से मतलब है क्योंकि यहां के उपखंड कार्यालय के बाबुओं ने अपनी ज़िद की बदौलत बेरोज़गार युवाओं और पात्र लोगों को चक्कर काटने पर मजबूर कर दिया है. 

कोटा शहर में आरक्षण के पात्र लोगों को EWS सर्टिफ़िकेट बनवाने के लिए दर दर भटकना पड़ता है. उन्हें कभी ज़िला प्रशासन तो कभी नगर निगम तो कभी अन्य सरकारी दफ़्तरो के चक्कर बार बार कटवाए जाते हैं. उधर परिक्षाएं सिर पर हैं जिसके चलते यदि प्रमाण पत्र शीघ्र नहीं बनाए गए तो पात्र लोगों को प्रतियोगी परीक्षाओं में प्रमाण पत्र नहीं लग पाने के कारण नौकरियों से वंचित रहना पड़ेगा लेकिन सरकारी बाबू अपनी बाबूगिरी के ज़िद के आगे किसी भी क़ीमत पर मानने को तैयार नहीं हैं न सरकार का आदेश तो न ही जारी हुए नए नियम.

केस स्टडी
ये हर्षित खंडेलवाल हैं जिसे EWS सर्टिफ़िकेट का फार्म आवेदन किए हुए एक महीने से ज़्यादा का वक़्त हो गया है लेकिन नियमों से परे यहां के बाबुओं की बदौलत हर्षित सरकारी दफ़्तरो के चक्कर काट रहा है. सभी नियमों की पालना और दस्तावेज़ो के बाद भी हर बार बाबुओ का कोई न कोई ओबजेक्शन होता है. जिसके बाद हर्षित अब निराशा है और इन बाबुओं की जिद के आगे हताश भी है. 

वहीं हमने यहां जो साहब तैनात हैं उनसे भी बात की तो उन्हें बस इतना पता है कि नए नियम प्रदेश सरकार के संशोधन के बाद आ गए हैं लेकिन वो इन्हें नहीं पता उसकी जानकारी इन्हें नहीं है. एक तरफ़ दफ़्तर में समय से देर से पहुंचना और फिर अपने ही बनाए नियमों के साथ लोगों को सरकारी सिस्टम में उलझा कर लोगों को सरकारी दफ़्तरो के बार बार चक्कर कटवाना ऐसे में सरकार की लोगों को राहत देने की मंशा कैसे सफल होगी?