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जयपुर: पांच दशक बाद कुछ इस तरह बदली राजस्थान यूनिवर्सिटी की छात्र राजनीति

छात्र राजनीति से निकले हुए दर्जनों छात्र नेताओं ने मुख्य राजनीति में ना सिर्फ अपना नाम रौशन किया बल्कि देश के विकास के मुख्य सूत्रधार भी बने.

जयपुर: पांच दशक बाद कुछ इस तरह बदली राजस्थान यूनिवर्सिटी की छात्र राजनीति
राजस्थान विश्वविद्यालय में पहले छात्र संघ चुनाव 1967-68 में हुए थे.

जयपुर: राजस्थान यूनिवर्सिटी में छात्र राजनीति की शुरूआत 1967 से हुई. उसके बाद से ही छात्र राजनीति में लगातार बदलाव और विकास देखने को मिला. छात्र राजनीति से निकले हुए दर्जनों छात्र नेताओं ने मुख्य राजनीति में ना सिर्फ अपना नाम रौशन किया. साथ ही देश के विकास के मुख्य सूत्रधार भी बने, लेकिन पहले और अब की छात्र राजनीति में काफी बदला आ चुका है. पहले जहां स्वच्छ प्रतिस्पर्धा की छात्र राजनीति हुई करती थी वहीं अब छल, कपट, जाति, धनबल, बाहुबल राजनीति में जगह लेती जा रही है. पूर्व छात्र नेता और छात्र संघ अध्यक्ष भी पूर्व की छात्र राजनीति को अब की छात्र राजनीति से काफी बेहतर करार देते हुए नजर आए.

राजस्थान विश्वविद्यालय में पहले छात्रसंघ चुनाव 1967-68 में हुए थे. उस समय अपने राजनीति कौशल को शुरूआत दौर में ही निखारने और भविष्य की संभावनाओं को तलाशने के लिए छात्र नेता छात्र राजनीति में भाग्य आजमाते थे. लेकिन वक्त बदला और छात्र राजनीति में भी बदलाव आया. छात्र राजनीति से मुख्य राजनीति में अपना भविष्य तलाश रहे छात्र नेता अब एन-केन-प्रकारेण सिर्फ जीत हासिल करना चाहते हैं. वहीं पहले की छात्र राजनीति में हार को भी सबक के रुप में लिया जाता था.

राजस्थान विश्वविद्यालय में अध्यक्ष रहे पूर्व छात्र नेताओं ने भी इस बात को स्वीकार करने में कोई गुरेज नहीं किया कि पहले की राजनीति स्वच्छ प्रतिस्पर्धा की होती थी. इसमें छात्र नेताओं के बची कभी मनमुटाव या आपसी मतभेद नहीं हुआ करते थे. लेकिन आज की राजनीति में प्रेम भावना खत्म हो गई है. एनएसयूआई के पूर्व छात्र संघ अध्यक्ष अनिल चौपड़ और सतवीर चौधरी ने भी पहले और आज की छात्र राजनीति में काफी बदलाव होना स्वीकार किया.

दूसरी ओर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद भी इस बात को स्वीकार करने में कोई गुरेज नहीं करती है. अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के वरिष्ठ छात्र नेता शंकर गोरा और पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष राजेश मीणा का कहना है कि लम्बे समय की बात नहीं करके अगर पिछले 10 सालों की ही बात की जाए तो छात्र राजनीति में काफी बदलाव आ गया है. अब जातिगत राजनीति ज्यादा सक्रिय होती जा रही है, जबकि पहले छात्र नेता के कार्य और उसकी योग्यता देखी जाती थी.

बहरहाल, अब छात्र राजनीति में आए हुए इन बदलाव के लिए कहीं ना कहीं छात्र संगठनों का भी बहुत बड़ा हाथ माना जा सकता है. ये छात्र नेता ही हैं जिनका छात्र राजनीति में धनबल, बाहुबल और जातिगत समीकरणों को हावी करने के समय-समय पर हावी करने के आरोप लगते आए हैं.