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राजस्थान: प्रतिनिधिमंडल में नाम न होने के बाद भी पहुंचे ओपी महिंद्रा, सुरक्षाकर्मियों ने रोका

प्रतिनिधिमंडल में नेता प्रतिपक्ष गुलाबचंद कटारिया और उप नेता प्रतिपक्ष राजेंद्र राठौड़ के साथ ही 20 विधायक शामिल हुए.

राजस्थान: प्रतिनिधिमंडल में नाम न होने के बाद भी पहुंचे ओपी महिंद्रा, सुरक्षाकर्मियों ने रोका
ओपी महिंद्रा ने खुद का नाम राज्यपाल को ज्ञापन देने वाले प्रतिनिधिमंडल में शामिल होने का दावा किया.

जयपुर: गुलाब चंद कटारिया दलित अत्याचार के मामले में बीजेपी के 21 विधायकों के साथ राजभवन में राज्यपाल कल्याण सिंह से मुलाकात की. इसी दौरान बीजेपी अनुसूचित जाति मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष ओपी महिंद्रा अपनी राजनीति चमकाने की जुगत भिड़ाते नजर आए. प्रतिनिधिमंडल में अपना नाम शामिल नहीं होने के बावजूद ओपी महिंद्रा राजभवन पहुंचे. लेकिन ओपी महिंद्रा को सुरक्षाकर्मियों ने राजभवन के भीतर दाखिल होने से रोक दिया तो अपनी झेंप मिटाने के लिए ओपी महिंद्रा ने मीडिया के सामने दलित अत्याचार का मुद्दा उठाया. लेकिन अपने आपको दलितों का सच्चा प्रतिनिधि बताने बीजेपी एससी मोर्चा के प्रदेशाध्यक्ष खुद ऐसे मामले भी नहीं बता पाए जिन को आधार बनाकर बीजेपी ने यह ज्ञापन सौंपा.

कहते हैं राजनीति में आदमी कई बार सही गलत का भी ध्यान नहीं रखता. ऐसा ही वाकया मंगलवार को राजभवन के बाहर दिखा जब बीजेपी के विधायकों का प्रतिनिधिमंडल दलित अत्याचार के मामलों को लेकर राज्यपाल को ज्ञापन देने पहुंचा. अपने आपको दलित अधिकारों का पैरोकार बताने वाले बीजेपी एससी मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष ओपी महिंद्रा पहले तो प्रतिनिधिमंडल में नाम शामिल नहीं होने के बावजूद राज भवन पहुंच गए. देरी से पहुंचे ओपी महिंद्रा को सुरक्षाकर्मियों ने बाहर रोक दिया तो वह अपने आप को दलित हितैषी बताने लगे. महिंद्रा की पोल खुल गई जब वे दलितों पर हुए अत्याचार के हालिया 5 मामले भी नहीं गिना सके. उन्होंने जगहों के नाम तो गिनाए, लेकिन मुकदमा दर्ज हुआ या नहीं? इसमें कोई गिरफ्तारी हुई या नहीं? इस बारे में उनकी जानकारी हवा हवाई ही दिखी. ओपी महिंद्रा से जब इस बारे में पूछा गया कि सुरक्षा कर्मियों ने उन्हें गेट के बाहर ही क्यों रोक दिया तो वे इस बात का हवाला देने लगे कि ज्ञापन देने का काम पूरा हो चुका है.

ओपी महिंद्रा ने खुद का नाम राज्यपाल को ज्ञापन देने वाले प्रतिनिधिमंडल में शामिल होने का दावा तो किया, लेकिन बीजेपी की तरफ से दिया गया यह ज्ञापन खुद ही एससी मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष के दावे की पोल खोल रहा है. इस ज्ञापन के आखिर में साफ तौर पर लिखा है कि नेता प्रतिपक्ष और विधायक गण की तरफ से यह ज्ञापन दिया गया है. इसमें उन सभी विधायकों के दस्तखत भी हैं जो ज्ञापन देते वक्त मौजूद रहे. प्रतिनिधिमंडल में नेता प्रतिपक्ष गुलाबचंद कटारिया और उप नेता प्रतिपक्ष राजेंद्र राठौड़ के साथ ही विधायक वासुदेव देवनानी, कालीचरण सराफ, अशोक लाहोटी, मदन दिलावर, जोगेश्वर गर्ग, चंद्रकांता मेघवाल, अविनाश गहलोत, किरण माहेश्वरी, धर्मेंद्र मोची, सुभाष पूनिया, सतीश पूनिया, रामप्रताप कासनिया, फूल सिंह मीणा, हरेंद्र निनामा, बलवीर सिंह लूथरा, ज्ञानचंद पारख, नारायण सिंह, अभिनेष महर्षि बिहारीलाल विश्नोई और संजय शर्मा शामिल रहे. मीडिया में बयान देते हुए बड़बोले ओपी महिंद्रा ने तो यहां तक कह दिया कि उन्होंने अपने ज्ञापन में राज्य सरकार को बर्खास्त करने की मांग राज्यपाल से की है.

ओपी महिंद्रा ने मीडिया के कैमरों के सामने सरकार को बर्खास्त करने की मांग का जिक्र तो किया, लेकिन हकीकत यह थी कि ज्ञापन में ऐसी कोई मांग लिखी ही नहीं गई. ज्ञापन देने के बाद मीडिया से बात करते हुए नेता प्रतिपक्ष ने यह साफ़ भी कर दिया कि उनकी तरफ से सरकार को बर्खास्त करने की कोई मांग अभी नहीं की गई है

हालांकि ओपी महिंद्रा अपनी राजनीति चमकाने के लिए अलग-अलग तर्क देते रहे, लेकिन नेता प्रतिपक्ष गुलाबचंद कटारिया का कहना था कि ओपी महिंद्रा का नाम तो इस प्रतिनिधिमंडल में ही शामिल नहीं था. कटारिया ने बताया की सिर्फ विधायकों के नाम ही इस प्रतिनिधिमंडल में शामिल किए गए थे. ऐसे में सवाल ये उठता है कि क्या समाज के नाम पर सिर्फ अपनी राजनीति चमकाने की चाहत में नेताओं को कुछ भी कहने या करने की छूट होनी चाहिए?