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जयपुर: जेल प्रशासन की पहल, कैदी बनाएंगे साबुन और डिटर्जेंट पाउडर

प्रदेश की सेंट्रल जेलों में लगी उद्योगशालाओं में कैदियों से अब साबुन-डिटरजेंट पाउडर बनवाया जाएगा. इससे न केवल कैदियों को रोजगार मिलेगा, बल्कि जेलों को भी आर्थिक फायदा भी होगा. 

जयपुर: जेल प्रशासन की पहल, कैदी बनाएंगे साबुन और डिटर्जेंट पाउडर
शुरूआती संसाधन जुटाने में जेल प्रबंधन बड़ी राशि खर्च भी कर रहा है

विष्णु शर्मा/जयपुर: जुर्म की कालिख से रंगे हाथ अब कौशल से निखरेंगे. जेल महकमा कैदियों को सजा के बाद मुख्यधारा में लौटने के लिए उद्यमिता की ओर अग्रसर कर रहा हैं. जेल प्रशासन का यह कदम कैदियों की मानसिकता में बदलाव के साथ उनकी आमदनी भी करवाएगा. जी हां, गुनाह के बाद सलाखों के पीछे बंद हाथ अब नहाने-धोने के साबुन और डिटर्जेंट पाउडर बनाएंगे. इसके उपकरण लगाने के लिए राज्य सरकार की मंजूरी भी मिल गई है. 

प्रदेश की सेंट्रल जेलों में लगी उद्योगशालाओं में कैदियों से अब साबुन-डिटर्जेंट पाउडर बनवाया जाएगा. इससे न केवल कैदियों को रोजगार मिलेगा, बल्कि जेलों को भी आर्थिक फायदा भी होगा. इसके अलावा जेल से रिहाई के बाद अपने इस हुनर के दम पर कैदी खुद का और परिवार का पेट पाल सकेंगे. इसके लिए शुरूआती संसाधन जुटाने में जेल प्रबंधन बड़ी राशि खर्च भी कर रहा है. प्रदेश में अभी 9 सेंट्रल जेल, 1 हाई सिक्योरिटी जेल, 3 महिला बंदी सुधार गृह, 2 ए श्रेणी जिला जेल, 24 बी श्रेणी जिला जेल, 60 सबजेल तथा 36 खुली जेले हैं.

इन सभी जेलों में  21 हजार 500 से अधिक दंडित विचाराधीन एवं महिला बंदी बंद है. इन सभी कैदियों को हर रोज नहाने, कपड़े धोने का साबुन, कम्बल धोने का डिटर्जेंट पाउडर, शरीर पर लगाने के लिए सरसों का तेल, भोजन निर्माण के लिए खाद्य तेल दिए जाता है. इन सब पर हर साल  35 हजार 500 किलो नहाने का साबुन, 35 हजार 500 किलो कपड़े धोने का साबुन, नाश्ता एवं भोजन निर्माण के लिए 3 लाख 5000 हजार किलोग्राम सरसों के तेल खर्च होता है. 

35 लाख में लगेेंगे उपकरण
जेलों में भारी मात्रा में हो रहे साबुन तेल के खर्चे को ध्यान में रखने के बाद जेल महानिदेशालय से राज्य सरकार के पास जेलों में ही साबुन-तेल निर्माण करने का प्रस्ताव भेजा गया. एक बारगी तो सरकार ने प्रस्ताव लौटा, दिया, लेकिन जेल महानिदेशक एनआरके रेड्डी ने एसीएस गृह राजीव स्वरूप से मिलकर अपनी बात रखी कि कोर्ट की सजा के आधार पर कैदियों को श्रम आवंटित किया जाना आवश्यक होता है. जेलों में इस तरह की सामग्री पर बड़ी मात्रा में धनराशी खर्च होती है. ऐसे में यदि खुद बंदी ही इनका निर्माण करें तो न सिर्फ कोर्ट निर्णय की पालना बल्कि श्रम कार्य भी उपलब्ध होगा. इसके बाद राज्य सरकार ने जेलों में साबुन-तेल निर्माण के उपकरण लगाने के लिए बंदी कल्याण कोष से 35 लाख रुपए खर्च की मंजूरी दे दी. जेल महानिदेशक रेड्डी का कहना है कि अगले एक महीने में जेलों में साबुन-तेल व अन्य सामग्री का निर्माण शुरू कर दिया जाएगा. 

कैदियों को रोजगार से मिलेगा फायदा
जेलों की उद्योगशालाओं में लगाने के लिए मशीनें-उपकरण खरीदे जाएंगे. इनमें नहाने- कपड़े धोने के साबुन निर्माण की मशीन लगाई जाएगी. इसमें प्रतिघंटा के हिसाब से 100 किलोग्राम साबुन तैयार होगा. मशीन की लागत -10-10 लाख होगी और 25-25 कैदियों को रोजगार मिलेगा वहीं सरसों का तेल निकालने की मशीन 250 किलो प्रतिघंटा के हिसाब से तेल निकालेगी. मशीन पर 12 लाख का खर्च आएगा और 30 बंदी श्रमिक काम करेंगे. स्थानीय बाजार से वाशिंग सोप 35 हजार 500 किलो पर 16 लाख 86 हजार 250 रुपए, टोइलेट सोप 35 हजार 500 किलो के 39 लाख 85 हजार 585 रुपए खर्च किए जा रहे हैं. वहीं राज्य सरकार सरसों की तेल तीन लाख किलो पर 3 करोड़ 12 लाख रुपए खर्च कर रही है. वहीं दूसरी ओर साबून निर्माण प्लांट पर प्लांट पर 32 से 35 लाख रुपए खर्च होने की संभावना है. इसका भी पुनर्भरण सालभर में हो जाएगा.