आदिवासी-गैर आदिवासी की खाई को है पाटने की जरूरत: Kalraj Mishra

राज्यपाल मिश्र ने कहा कि वागड़ अंचल का जनजाति क्षेत्र औषधीय, वनस्पति और जैविक संपदा के लिए देशभर में अपनी पहचान रखता है. 

आदिवासी-गैर आदिवासी की खाई को है पाटने की जरूरत: Kalraj Mishra
कार्यक्रम के आरम्भ में राज्यपाल ने संविधान की उद्देश्यिका तथा मूल कर्तव्यों का वाचन करवाया.

Jaipur: राज्यपाल कलराज मिश्र (Kalraj Mishra) ने कहा है कि आदिवासी और गैर आदिवासी के बीच पनपी भेद की खाई को मिलकर पाटने की जरूरत है. उन्होंने कहा कि इसके लिए आदिवासी समाज को उनकी भाषा, संस्कृति, परम्पराओं और विशिष्टताओं को बचाए रखते हुए विकास की मुख्य धारा में जोड़ना होगा.

यह भी पढ़ें- Governor के सुझाव पर हरकत में सरकार, आदिवासी क्षेत्रों में बनेंगे स्मार्ट विलेज

 

राज्यपाल मिश्र राजभवन में मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय (Mohanlal Sukhadia University), उदयपुर की ओर से आयोजित ‘वागड़ अंचल का लोक साहित्य एवं संस्कृति’ विषय पर अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन एवं विश्वविद्यालय परिसर के 6 भवनों के शिलान्यास समारोह को ऑनलाइन संबोधित कर रहे थे. उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज की अपनी अलग सांस्कृतिक पहचान है, जिसे सहेजा जाना बहुत जरूरी है.

यह भी पढ़ें- ब्राह्मण समाज राष्ट्र के विकास में अपनी भूमिका निभाए : Governor Kalraj Mishra

 

राज्यपाल मिश्र ने कहा कि वागड़ अंचल का जनजाति क्षेत्र औषधीय, वनस्पति और जैविक संपदा के लिए देशभर में अपनी पहचान रखता है. यहां की प्रकृति पूजा और औषधि विज्ञान की जनजातीय समाज की मौखिक रूप में संरक्षित परम्पराओं को सहजने के लिए विश्वविद्यालय द्वारा पाठ्यक्रम लागू करने की पहल सराहनीय है. राज्यपाल मिश्र ने सुझाव दिया कि आदिवासी क्षेत्र के युवाओं के माध्यम से इस समुदाय के रीति-रिवाज, उत्सव, परम्पराओं, लोककथाओं और लोकगीतों सहित उपलब्ध ज्ञान को एकत्रित कर इसका डिजिटलाईजेशन किया जाना चाहिए ताकि भावी पीढ़़ी भी इससे रूबरू हो सके.

सदियों से संचार का माध्यम रहीं में प्रचलित बोलियां
विधानसभा अध्यक्ष डॉ. सी.पी. जोशी ने कहा कि देश के विभिन्न क्षेत्रों में प्रचलित बोलियां न सिर्फ सदियों से संचार का माध्यम रही हैं बल्कि स्थानीय ज्ञान-विज्ञान, कला-संस्कृति और लोक परम्पराओं की वाहक भी हैं. उन्होंने कहा कि इस रूप में वागड़ अंचल की वाचिक परम्परा को सहेजने की यह पहल यहां की लोक संस्कृति को अक्षुण्ण रखने की दिशा में दूरगामी साबित होगी. उन्होंने कहा कि जनजातीय क्षेत्रों का अनुभवजन्य प्राकृतिक ज्ञान उनकी अनूठी विरासत है. प्रकृति से इस निकटता के कारण  ही इन क्षेत्रों के निवासियों पर कोविड-19 महामारी का प्रभाव भी अपेक्षाकृत कम देखने को मिला.

क्या बोले गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के कुलपति 
गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय, ग्रेटर नोएडा के कुलपति प्रो. बी.पी. शर्मा ने कहा कि जनजातीय क्षेत्र की परम्पराओं में उन्नत विज्ञान के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण के भाव परिलक्षित होते हैं. आदिवासी वाचिक परम्परा पर अनुसंधान कर इसे लिपिबद्ध करने की आवश्यकता है. राज्यपाल ने इस अवसर पर विश्वविद्यालय परिसर में कॉलेज ऑफ़ आर्किटेक्चर, जनजाति फैमिली हॉस्टल, वाणिज्य महाविद्यालय के पुस्तकालय एवं सेमिनार हॉल के भवनों, कर्मचारी भवन, मेवाड़ पीठ भवन का शिलान्यास किया. उन्होंने वागड़ क्षेत्र के लोक एवं आदिवासी साहित्य, परम्पराओं और संस्कृति से जुड़े़ महत्वपूर्ण पहलुओं को सम्मिलित करते हुए तैयार ई-पुस्तक ‘फोकलोर ऑफ़ वागड़’  का विमोचन भी किया. कार्यक्रम के आरम्भ में राज्यपाल ने संविधान की उद्देश्यिका तथा मूल कर्तव्यों का वाचन करवाया.

मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. अमरिका सिंह, प्रख्यात गुजराती लोक संस्कृति विशेषज्ञ पद्मश्री जोरावर सिंह जाधव, राजस्थान लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष डॉ. श्री भूपेंद्र सिंह, गोविंद गुरु जनजातीय विश्वविद्यालय, बांसवाड़ा के कुलपति प्रो. आई.वी. त्रिवेदी, निदेशक कॉलेज शिक्षा संदेश नायक ने भी सम्मेलन को संबोधित किया.