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जयपुर: संस्कृत विद्यालय में शिक्षा हुई बदहाल, नामांकन को तरस रहा पदमपुरा स्कूल

झुंझुनूं जिले का पदमपुरा गांव के राजकीय उच्च प्राथमिक संस्कृत स्कूल में आलीशान भवन के साथ-साथ स्टाफ भी पूरा है. लेकिन दो सालों में यहां एक भी बच्चे ने एडमिशन नहीं लिया.

जयपुर: संस्कृत विद्यालय में शिक्षा हुई बदहाल, नामांकन को तरस रहा पदमपुरा स्कूल
पदमपुरा गांव के इस संस्कृत स्कूल में चार शिक्षक हैं.

संदीप केडिया/झुंझुनूं: एक ओर जहां माध्यमिक और प्रारंभिक शिक्षा स्कूलों में नामांकन की होड़ मची हुई है. वहीं दूसरी ओर संस्कृत स्कूल नामांकन को ही तरस रहे है. जी, हां हम बात कर रहे है झुंझुनूं  के ऐसे स्कूल की जहां पर एक भी बच्चा नहीं है, लेकिन फिर भी स्कूल में स्टाफ की लंबी-चौड़ी फौज कार्यरत है.

झुंझुनूं जिले का पदमपुरा गांव के राजकीय उच्च प्राथमिक संस्कृत स्कूल में आलीशान भवन के साथ-साथ स्टाफ भी पूरा है. प्रधानाध्यापिका है, साथ में चार टीचर है. इनमें भी दो पुरुष और दो महिला टीचर शामिल है. व्यवस्थाएं भी पूरी है. चाहे दरी पर बैठकर पढें या फिर टेबल कुर्सी पर, लेकिन नहीं है तो बच्चे. जी, हां इस स्कूल में बीते दो सालों में एक भी बच्चे ने एडमिशन नहीं लिया. वजह, शिक्षकों की आपसी राजनीति. स्कूल की प्रधानाध्यापिका तो खुले रूप से अपनी साथी शिक्षिकाओं पर आरोप लगा रही है कि वे आने वाले लोगों से अभद्रता करती है और उनकी अनुपस्थिति में सरपंच व अन्य ग्रामीणों से हाथापाई तक हो गई. इसके बाद ग्रामीणों ने स्कूल से मुंह मोड़ लिया है. प्रधानाध्यापिका ने अपने उच्चाधिकारियों पर भी आरोप लगाया है कि वे उनके पत्रों का जवाब नहीं देते. वहीं अपनी पीड़ा फोन पर बताती है तो उसके फोन भी को ब्लैक लिस्ट में डाल दिया.

पदमपुरा गांव का यह स्कूल किशोरपुरा पंचायत के अंतर्गत आता है. सरपंच रामनिवास और वार्ड पंच संजय झाझडिय़ा ने तो इस पूरी स्कूल को लेकर जो आरोप लगाए तो वो आपको भी चौंका देंगे. सरपंच और पंच का कहना है कि यह स्कूल नहीं, बल्कि तमाशा है और शिक्षक, पूरी शिक्षा पर धब्बा है. यहां के स्टाफ को लडऩे से फुर्सत मिले तो अभिभावकों से संपर्क कर बच्चे लाएं. उन्होंने बताया कि इस संदर्भ में पंचायत ने प्रस्ताव लेकर ज्वाइंट डायरेक्टर तक पत्र लिखा है. लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई. जबकि अब तो दो साल से स्कूल में एक बच्चा भी नहीं है. वहीं लाखों रुपए की तनख्वाह ये शिक्षक तमाशा कर ही ले जाते है.

इस संदर्भ में जब हमने संस्कृत शिक्षा विभाग के चूरू स्थित कार्यालय में सेवारत संभागीय प्रभारी राजेंद्रप्रसाद शर्मा से बातचीत की. तो वे भी कार्रवाई करने की बजाय बेबस नजर आए. उन्होंने कहा कि स्कूल को लेकर उनके पास भी पत्र आए हुए है. जिन्हें लेकर निदेशालय को भेजा गया है. कार्रवाई या फिर कोई भी कदम निदेशालय ही उठाता है. कुल मिलाकर चिट्ठियों के चक्कर में ही सरकार के के लाखों रुपए पानी में बह रहे है और विद्यार्थियों को भी शिक्षा नहीं मिल रही. 

झुंझुनूं जैसे शिक्षिक जिले में संस्कृत स्कूलों की इस दशा को देखकर आप भी चौंक गए होंगे. नामांकन में यहां की माध्यमिक और प्रारंभिक विभाग की स्कूलों ने पूरे प्रदेश में लोहा मनवाया है तो वहीं संस्कृत विभाग की स्कूलें पलीता लगाने में कसर नहीं छोड़ रही है. अब यह देखने वाली बात होगी कि आखिरकार ऐसे कब तक संस्कृत शिक्षा विभाग अध्यापकों को बैठे बिठाए लाखों रुपए हर महीने बहाता है. क्योंकि यह पैसा कहीं ना कहीं आम जनता की गाढी कमाई का ही एक हिस्सा है और वह पानी की तरह फिजूल में बहाई जा रही है. बताया यह भी जा रहा है कि पदमपुरा स्कूल में एक महिला शिक्षक के कारण सारा का सारा बंटाधार है. यह महिला शिक्षक पूर्व में भी जहां कार्यरत थी.उसे भी ताला लगाकर ही आई थी.