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जयपुर: संसद में राजस्थान से कांग्रेस का खाता खुलने के बाद राजनीतिक हलचलें तेज

राजस्थान के 35 सांसदों में से अब एक सांसद कांग्रेस का भी हो गया है. कांग्रेस के लिए प्रदेश से यह खाता डॉ मनमोहन सिंह के नाम से खुला है. 

जयपुर: संसद में राजस्थान से कांग्रेस का खाता खुलने के बाद राजनीतिक हलचलें तेज
बीते बीस साल में राजस्थान का राजनीतिक नेतृत्व मजबूत हुआ है.

जयपुर: संसद में राजस्थान से कांग्रेस का खाता खुल गया है. पूर्व प्रधानमन्त्री डॉ मनमोहन सिंह के चुने जाने के साथ भले ही राज्य सभा में राजस्थान से कांग्रेस का झण्डा उठाने वाला एक चेहरा दिखने लगेगा. लेकिन मनमोहन सिंह के पद और उनकी योग्यता के प्रति सम्मान देने वाले नेता भी इस बात की चर्चा तो कर ही रहे हैं कि क्या इस जगह राजस्थान मूल का ही कोई दूसरा नेता नहीं हो सकता था? यह सवाल इसलिए भी क्योंकि पिछले बीस साल में कांग्रेस हो या बीजेपी दोनों ही पार्टियों ने बाहरी नेताओं को राजस्थान से उच्च सदन में भेजने में ज़रा भी संकोच नहीं किया. 

राजस्थान के 35 सांसदों में से अब एक सांसद कांग्रेस का भी हो गया है. कांग्रेस के लिए प्रदेश से यह खाता डॉ मनमोहन सिंह के नाम से खुला है. दो बार देश के प्रधानमन्त्री रहे डॉ मनमोहन सिंह राजस्थान से निर्विरोध चुनकर राज्यसभा पहुंचे हैं. डॉ मनमोहन सिंह का निर्विरोध चुनाव पहले से तय था और ऐसा इसलिए क्योंकि यहां कांग्रेस के पास पर्याप्त बहुमत था. इस चुनाव के बाद राजनीतिक हलकों में सवाल इस बात को लेकर उठ रहे हैं कि आखिर पार्टियां राजस्थान से बाहर के लोगों को राज्यसभा भेजने में तरजीह क्यों दे रही हैं? बीजेपी का कहना है कि एक से अधिक सीट होती तो कोई सवाल नहीं थे लेकिन एक सीट पर ही चुनाव हुए. ऐसी स्थिति में राज्य के ही मूल निवासी किसी नेता को राज्यसभा भेजा जाता तो वह प्रदेश की आवाज़ को ज्यादा बेहतर तरीके से उठा पाता.

उधर कांग्रेस पार्टी डॉ मनमोहन सिंह की योग्यता और उनके कद के आगे इतनी झुकी हुई है कि पार्टी को वे ही इस सीट के लिए सबसे ज्यादा उपयुक्त प्रत्याशी लगते हैं पीसीसी उपाध्यक्ष अर्चना शर्मा कहती हैं कि विपक्षी पार्टियों को सवाल उठाने का अधिकार इसलिए नहीं है क्योंकि बीजेपी ने बाहर के नेताओं को ज्यादा संख्या में राज्य सभा भेजा है. वह कहती हैं कि वैसे भी बीजेपी के पास पर्याप्त वोट नहीं हैं. 

भले ही कांग्रेस और बीजेपी गैर राजस्थानी मूल के नेताओं को प्रदेश की राज्यसभा सीट पर भेजे जाने को लेकर एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप कर रहे हों. लेकिन इस मामले में दोनों ही पार्टियों का ट्रेक रिकॉर्ड ज्यादा अच्छा नहीं है. राजस्थान में कांग्रेस के एकछत्र राज का दौर खत्म होने के बाद की बात करें तो साल 1998 से पहले ज्यादातर नेता राजस्थान मूल के ही रहे जो यहां से राज्यसभा भेजे गए. वर्ष 1998 के बाद आठ चेहरे ऐसे रहे जो राजस्थान से बाहर के थे, लेकिन बड़े आराम से राज्यसभा पहुंचे. 

इस लिस्ट में सबसे पहले कोलकाता मूल के उद्योगपति आरपी गोयनका का नाम आता है. गोयनका 4 अप्रेल 2000 से 3 अप्रेल 2006 तक राज्य सभा सदस्य रहे. पूर्व विदेश मन्त्री आनन्द शर्मा को भी कांग्रेस ने राजस्थान से राज्य सभा में भेजा. आनन्द शर्मा को कांग्रेस आलाकमान के आशिर्वाद के साथ ही मुख्यमन्त्री से पुरानी दोस्ती का फायदा भी मिला. जबकि इस बार डॉक्टर मनमोहन सिंह का कार्यकाल खत्म होने के बाद कांग्रेस ने उन्हें फिर से राज्यसभा भेजने का मानस बनाया तो पार्टी को राजस्थान ही सबसे ज्यादा सुरक्षित दिखा. मुख्यमन्त्री अशोक गहलोत ने भी मनमोहन सिंह की जीत का भरोसा दिलाया तो कांग्रेस आलाकमान ने भी हरी झण्डी दे दी. 

कांग्रेस ने पिछले बीस साल में राजस्थान से बाहर के तीन नेताओं को प्रदेश से राज्य सभा की कुर्सी पर बिठाया. वहीं बीजेपी भी इस मामले में कमज़ोर नहीं दिखी. बीजेपी ने इसी अवधि में पांच गैर राजस्थानी नेताओं को सर्वोच्च सदन में भेजा. बीजेपी ने राज्यसभा की उप-सभापति रही नजमा हेपतुल्ला, पूर्व केन्द्रीय मन्त्री और मौजूदा उप-राष्ट्रपति वैकेया नायडू, पूर्व मन्त्री राम जेठमलानी, विजय गोयल और केजे अल्फोन्स को राज्यसभा में लैण्डिंग के लिए जगह दी. राजस्थान से राज्य सभा सदस्य से बनने के पहले सुप्रीम कोर्ट में पैरवी करने वाले वकील राम जेठमलानी कर्नाटक और महाराष्ट्र से भी कुल चार बार सांसद रहे. 
 
ऐसा नहीं है कि इन आठ चेहरों से पहले किसी गैर राजस्थानी को प्रदेश से राज्यसभा में नहीं भेजा गया हो, लेकिन बीते बीस साल में राजस्थान का राजनीतिक नेतृत्व मजबूत हुआ है. कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही पार्टियों में राजस्थान से आने वाले नेताओं की तवज्जो बढ़ी है और संभव है कि केन्द्र से बढ़ी यह नज़दीकी भी एक बड़ा कारण है कि केन्द्रीय संगठन. अपनी पार्टी के प्रादेशिक नेताओं को कुछ सीटें केन्द्र के खाते में छोड़ने के लिए तैयार कर पाने में कामयाब रहे.