जयपुर: पंचायत चुनाव में बैकफुट पर महिला प्रत्याशी, बैनर्स में भी पति का नाम पहले

सबसे दिलचस्प तस्वीरें महिला आरक्षित सीटों पर देखने को मिल रही है, जहां महिला प्रत्याशी अपनी खुद की पहचान के बजाए जीत के लिए अपने पति या ससुर के नाम पर वोट मांग रही है.

जयपुर: पंचायत चुनाव में बैकफुट पर महिला प्रत्याशी, बैनर्स में भी पति का नाम पहले
राजस्थान में पंचायत चुनाव में अजीबो गरीब स्थिति देखने को मिल रही है.

जयपुर: राजस्थान में तीन चरणों में हो रहे पंचायत के वार्डपंच और सरंपचों के चुनाव में अलग-अलग तस्वीरें देखने को मिल रही है. प्रत्याशियों प्रचार प्रसार के साथ वोट मांगने का अलग-अलग तरीका देखने को मिल रहा है. सबसे दिलचस्प तस्वीरें महिला आरक्षित सीटों पर देखने को मिल रही है, जहां महिला प्रत्याशी अपनी खुद की पहचान के बजाए जीत के लिए अपने पति या ससुर के नाम पर वोट मांग रही है. पोस्टरों और पर्चों में महिला सरपंच प्रत्याशी के साथ-साथ पति और ससुर की तस्वीर और उनका नाम लिखा हुआ है.

राजस्थान में पंचायत चुनाव में अजीबो गरीब स्थिति देखने को मिल रही है. लोगों ने अपनी पत्नी, भाभी या बहू को चुनावी मैदान में तो उतार दिया. सभी प्रचार के नए-नए तरीके अपना रहे हैं. इसी बीच यहां की महिला प्रत्याक्षियों को प्रचार का नया मुद्दा मिल गया है. ये सभी अपने पति और ससुर के नाम पर लोगों से वोट की अपील कर रही है. 

ग्राम पंचायत चुनाव प्रचार के दौरान कई मामलों में पाया गया है कि पोस्टरों और पर्चों में महिला सरपंच प्रत्याशी के साथ-साथ पति और ससुर की तस्वीर और उनका नाम लिखा हुआ है. जब गांव के लोगों से पूछा गया कि उनका सरपंच प्रत्याशी कौन है तो उन्होंने जवाब में महिला प्रत्याशी के बजाय उनके पति का नाम लिया. सरपंची की दावेदारी कर रही महिलाओं से इस बारे में पूछा तो उनका भी यही कहना था कि हमारी पहचान तो हमारे ससुर और पति के पीछे है इसलिए जब हम घर में वोट मांगने जाते हैं तो ससुर का और पति का नाम लेकर अपने पक्ष में वोट मांगने की अपील कर रहे हैं.

इतना ही नहीं ऐसे लोगों ने बैनर-पोस्टर पर महिला प्रत्याशियों के साथ खुद का फोटो भी लगाया है. साथ ही, निवेदक भी परिवार के पुरुष ही बने हैं. महिला सीट के बावजूद प्रचार के लिए घर के पुरुषों द्वारा मोर्चा संभालने से कई वार्डों में तो स्थिति यह है कि मतदाताओं ने अब तक महिला प्रत्याशियों के दर्शन ही नहीं किए हैं.राजनीति में महिलाओं को आगे लाने के लिए सभी राजनीतिक दल दावे तो करते हैं, लेकिन ज्यादातर दलों में महिला नेताओं की गिनती मुट्ठी भर ही है. इस बार पंचायत चुनाव इसकी बानगी भी दिख रहा है कि राजनीति में महिलाएं किस प्रकार से मजबूत हैं. चुनाव प्रचार के दौरान भी महिलाएं घूंघट निकालकर मतदाताओं से अपने पति और ससुर के नाम पर वोट मांग रही हैं. वह मतदाताओं से बोल रही है कि चुनाव में उनके पति या ससुर ने क्षेत्र के लिए इतने विकास कार्य कराए वे आगे भी कराएंगे.

इतना ही नहीं गांवों में उनकी पहचान कम होने के कारण पति और ससुर का नाम लेकर वोटर्स के बीच जाकर कह रहीं हैं की मैं फलां की बहू हूं और सरपंच के लिए चुनाव लड़ रही हूं. ध्यान राखजो वोट दीजो. बड़ी संख्या में महिला प्रत्याशी ऐसी हैं जो प्रचार तक के लिए अपने घर ये भी कम ही निकल रही हैं. उनके घरों के पुरुष सदस्य उनके लिए प्रचार रहे हैं. 

उधर, सरपंच पद के उम्मीदवार गांवों में जहां कहीं भी निजी समारोह होते है वहां पहुंचकर हर एक मतदाता तक अपनी बात पहुंचाने का प्रयास करते हुए देखे गए कि 'भाया ध्योन राखजों, हमके म्हारें हेमो लमणों देजों' तो कई प्रत्याशियों ने अपने चुनाव घोषणा पत्र का पेम्पलेट छपवाकर अपनी योजनाएं जनता के बीच रखी. कई उम्मीदवारों ने ग्राम पंचायत को हाईटैक बनाने की भी घोषणा पत्र में बात कही तो कईयों ने मनरेगा में रोजगार दिलाने, बिजली, पानी, सड़क की व्यवस्था करवाने, विभिन्न लाभकारी योजनाओं से जोडऩे एवं हर समय पंचायत भवन में उपस्थित रहने के वादे भी किए है.

बहरहाल, महिलाओं को पंचायत चुनाव में 50 फीसदी आरक्षण देकर चुनाव में कोटा तो फिक्स कर दिया, लेकिन राजनीति में महिलाओं की दखलंदाजी पहले जैसी ही है. यानी परिवार के पुरुष ही महिलाओं के चुनाव एजेंट के तौर पर काम करते हैं. पुरुषों के कंधों पर बैठकर चुनाव जीतने वाली महिलाएं फिर रबर स्टेंप के तौर पर काम करेंगी.