&w=896&h=504&format=webp&quality=medium)
Rajasthan Aravalli: अरावली जब दुनिया लिखी भी नहीं जाती थी तब अरावली खड़ा था, जब शहर का मतलब मिट्टी और घर होता था. जब राजा महाराजा पानी के लिए किसी पहाड़ की तरफ देखते थे. डेजर्ट को रोकने के लिए कोई वॉल नहीं थी और सिर्फ अरावली था. ये दुनिया के सबसे पुराने पर्वतमालाओं में से एक है और आज उस पहाड़ से पूछ रहे है तुम सौ मीटर के हो गया नहीं. हिस्ट्री कहता है अरावली ने डेजर्ट रोका.
साइंस कहता है ये ग्राउंड वाटर का गार्जन है और इसी बीच हर वो बच्चा आज पूछता है, जो इतना पुराना है क्या इसे बचाना जरूरी नहीं होता. अरावली सिर्फ पहाड नहीं, ये दीवार है. ये दीवारी गिरी तो हम भी गिर जाएंगे. सोशल मीडिया पर अरावली को बचाने के लिए कुछ इसी तरह की भावनाओं का पहाड़ बिछा है. 1.7 करोड़ साल पुरानी अरावली पर्वतमाला के भविष्य पर चिंताओं का ज्वार फैला है.
अलवर से बांसवाड़ा 14 जिलों में अरावली
1.7 करोड़ साल पुरानी अरावली पर्वतमाला सबसे प्राचीनतम पर्वतमालाओं में से एक है. हरियाणा से शुरू हुई अरावली का 90 प्रतिशत हिस्सा राजस्थान में है, जो 14 जिलों में फैली हुई है. अलवर से बांसवाड़ा तक 93 प्रतिशत अरावली की पहाड़ी 100 मीटर से कम है. राजस्थान के साथ-साथ हरियाणा, दिल्ली, गुजरात में भी अरावली की पर्वतमाला फैली हुई है.
800 किलोमीटर तक फैली ये पर्वतमाला राजस्थान में 660 किलोमीटर तक फैली है. यह खनिज जिसमें सीसा, तांबा, जस्ता, अभ्रक और जल स्रोतों का भंडार है, जो स्थानीय लोगों के लिए जीवन रेखा है. यह सरिस्का और माउंट आबू जैसे वन्यजीव अभयारण्यों का घर है. बाण,लूनी, साबरमती जैसी कई प्रमुख नदियों का उद्गम स्थल है. भूगर्भशास्त्री डॉ.एम.के पंडित का कहना है कि अरावली का संरक्षण बहुत जरूरी है. यदि अरावली नहीं हुई तो इसका सबसे ज्यादा प्रभाव राजस्थान पर पडेगा. पर्यावरणविद् केएन जोशी का कहना है कि अरावली नहीं होगी तो राजस्थान में रेगिस्तान और बढ़ेगा.
अरावली ना हो तो क्या होगा?
भू-गर्भशास्त्रों और पर्यावरणविद् की माने तो यदि अरावली ना हो तो राजस्थान में सबसे बड़ा संकट होगा. राजस्थान ग्राउंड वाटर पर निर्भर करता है. अरावली की पहाड़िया ग्राउंड वाटर को रिचार्ज करती है. अरावली नदियों का उद्गम स्थल है. ईस्ट में ज्यादा बारिश और वेस्ट में कम बारिश होता है. बनास और लूणी नदियों के अस्तित्व पर खतरा हो सकता है. रेगिस्तानी इलाके बढेंगे, जिससे पर्यावरण असंतुलित होगा. पानी, पर्यावरण के जीव जंतुओं के साथ साथ मनुष्य के जीवन पर भी संकट होगा.
राजस्थान के साथ-साथ इसका सीधा असर उन राज्यों में भी पड़ेगा, जहां अरावली की पहाड़ी है ही नहीं, तब अरावली पर्वतमालाएं होगी नहीं, तो रेगिस्तान की मिट्टी दूसरे राज्यों तक पहुंचेगी, जिसका सीधा असर ठंडे प्रदेश में जिसमें हिमाचल, उत्तराखंड तक पडेगा, जिससे बर्फ पिघलेगी. गंगा, जमुना में पानी ज्यादा बढ़ेगा, जिससे यूपी, बिहार में बाढ़ का खतरा होगा. अरावली का निर्माण टेक्टोनिक प्लेटों के टकराव से हुआ, जब भारतीय प्लेट यूरेशियन प्लेट से टकराई, जिससे पृथ्वी की परत मुड़कर ऊपर उठी.
अरावली ना होने के नुकसान
मरुस्थल का विस्तार
अरावली पर्वतमाला थार मरुस्थल की गर्म हवाओं और रेत को दिल्ली, हरियाणा और उत्तर प्रदेश जैसे मैदानी इलाकों में फैलने से रोकती है. इसके न होने पर, थार मरुस्थल तेज़ी से आगे बढ़कर पूरे उत्तर भारत को बंजर बना देगा.
बढ़ता प्रदूषण
यह पर्वतमाला प्रदूषित हवा को फिल्टर करती है. अरावली के कमजोर पड़ने या खत्म होने से दिल्ली-एनसीआर की हवा बेहद जहरीली हो जाएगी और धूल भरी आंधियां बढ़ेंगी.
जल संकट
अरावली की चट्टानें बारिश के पानी को जमीन में सोखकर भूजल को रिचार्ज करती हैं. राजस्थान और हरियाणा की 80% नदियां (जैसे चंबल, साबरमती) अरावली से निकलती हैं, ये नदियां और जल स्रोत सूख जाएंगे. इससे पूरे क्षेत्र में पानी की भारी कमी हो जाएगी और बोरवेल सूख जाएंगे.
जलवायु परिवर्तन और वर्षा में कमी
अरावली मानसून की नमी भरी हवाओं को रोककर बारिश कराती है. इसके न होने पर बारिश का पैटर्न बिगड़ेगा, गर्मी बढ़ेगी और सूखा आम हो जाएगा.
जैव विविधता का नुकसान
अरावली वन्यजीवों का घर है. खनन और कटाव से इनका प्राकृतिक आवास सिकुड़ जाएगा, जिससे वन्यजीव-मानव संघर्ष बढ़ेगा और कई प्रजातियां खतरे में पड़ जाएंगी.
आर्थिक और सामाजिक प्रभाव
पानी और हरियाली के अभाव में कृषि प्रभावित होगी, जिससे खाद्य सुरक्षा और लोगों की आजीविका पर बुरा असर पड़ेगा, जैसा कि आज पश्चिमी राजस्थान में हो रहा है.
राजस्थान की ताज़ा ख़बरों के लिए ज़ी न्यूज़ से जुड़े रहें! यहां पढ़ें Rajasthan News और पाएं Jaipur News हर पल की जानकारी. राजस्थान की हर खबर सबसे पहले आपके पास, क्योंकि हम रखते हैं आपको हर पल के लिए तैयार. जुड़े रहें हमारे साथ और बने रहें अपडेटेड!