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Rajasthan News: जयपुर का महिला चिकित्सालय एक बार फिर लापरवाही और असंवेदनशीलता का अड्डा बन गया है. यहां एक गर्भवती महिला की जिंदगी डॉक्टरों और स्टाफ की बेरुखी की भेंट चढ़ गई. महिला की हालत बिगड़ने के बाद भी इलाज में देरी की गई और आखिरकार वह मौत से जंग हार गई.
जानकारी के मुताबिक 18 अगस्त की रात एक गर्भवती महिला को भर्ती कराया गया. महिला खुद पैदल चलकर अस्पताल आई थी. अगले दिन दोपहर 12 बजे डिलीवरी हुई, लेकिन देर रात उसकी तबीयत अचानक बिगड़ गई. परिजनों का आरोप है कि महिला घंटों तक दर्द से तड़पती रही, खून बहता रहा, लेकिन न कोई डॉक्टर आया, न ही स्टाफ ने ध्यान दिया. गार्ड ने पति को रोक दिया और कहा – “आप मर्द हैं, अंदर मत जाइए.”
पति विनोद ने बताया कि मेरी पत्नी फर्श पर ही पड़ी रही. मैंने बार-बार स्टाफ को बुलाया, लेकिन किसी ने ध्यान नहीं दिया. जब हालत ज्यादा बिगड़ गई तब जाकर सुबह डॉक्टर पहुंचे, तब तक बहुत देर हो चुकी थी.
ब्लीडिंग इतनी ज्यादा हुई कि ऑपरेशन थिएटर में पहुंचते-पहुंचते महिला को 20 यूनिट ब्लड चढ़ाना पड़ा. बच्चेदानी निकाल दी गई और बाहर की प्राइवेट लैब से जांच करवाई गई, लेकिन महिला को नहीं बचाया जा सका.
हद तो तब हुई जब मौत के बाद डॉक्टरों ने पुलिस बुला ली और शव को SMS अस्पताल की मोर्चरी में भिजवा दिया. परिजनों का आरोप है कि उन्हें धमकाकर चुप कराया गया और निजी अस्पताल न जाने पर ताने भी दिए गए.
अस्पताल अधीक्षक आशा वर्मा का सफाई देते हुए कहना था कि बहुत मरीज होते हैं, सबको नहीं बचा सकते. वहीं गायनी एक्सपर्ट का कहना है कि डिलीवरी के बाद ब्लीडिंग होने पर 2-3 घंटे के भीतर इलाज मिलना जरूरी है, वरना मरीज DIC में चला जाता है और मौत लगभग तय हो जाती है.
इस घटना ने सरकारी अस्पतालों की संवेदनहीनता और लापरवाही पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है. सवाल यह है कि क्या सरकारी अस्पतालों में इलाज मिलना किस्मत पर निर्भर रह गया है?
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