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Shakambari Mata Temple: मान्यता है कि देवी शाकंभरी स्वयं पहाड़ से प्रकट हुईं और उनके आशीर्वाद से सांभर झील का निर्माण हुआ. स्थानीय लोककथाओं के अनुसार, छठी शताब्दी में चौहान वंश के राजा वासुदेव की भक्ति से प्रसन्न होकर माता ने उन्हें वरदान दिया. राजा ने धन-धान्य की कामना की, जिस पर देवी ने कहा कि वह जितनी दूर तक घोड़ा दौड़ाएंगे, वहां तक चांदी की खान बन जाएगी. शर्त यह थी कि पीछे मुड़कर नहीं देखना है. राजा ने घोड़ा दौड़ाया और पूरा इलाका चांदी की खान में बदल गया लेकिन पीछे देखने पर यह प्रक्रिया रुक गई.
बाद में जब उनकी माता ने समझाया कि इतनी संपदा के लिए लड़ाई-झगड़े होंगे, तो राजा ने फिर देवी से प्रार्थना की. इसके बाद देवी ने पूरी चांदी की खान को नमक में बदल दिया. तभी से नमक को 'कच्ची चांदी' कहा जाता है.
जहांगीर भी झुका माता के आगे
कहा जाता है कि मुगल सम्राट जहांगीर की सेना एक बार मंदिर को ध्वस्त करने आई, लेकिन मधुमक्खियों के झुंड ने हमला कर सेना को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया. बाद में जहांगीर खुद मंदिर आया और देवी की शक्ति को परखने के लिए गर्भगृह की ज्योत पर लोहे के सात तवे रखवा दिए. चमत्कार यह हुआ कि ज्योत उनके आर-पार होकर जलती रही. यह देखकर जहांगीर नतमस्तक हो गया और झील के बीच की पहाड़ी पर एक छतरी बनवाई, जिसे आज भी 'जहांगीर की छतरी' कहा जाता है.
कांच का गर्भगृह
मंदिर का गर्भगृह कांच की बारीक कारीगरी से सुसज्जित है. मंदिर परिसर का समय-समय पर पुनर्निर्माण हुआ है. जयपुर और जोधपुर के राजपरिवारों ने भी इसमें योगदान दिया. वर्तमान में मंदिर परिसर की सुरक्षा के लिए 18 सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं.
मेलों की परंपरा
माता शाकंभरी को वनस्पति और प्रकृति की देवी माना जाता है. यहां माता को हरी सब्जियों और फलों का भोग लगाया जाता है. भक्त नारियल, मावा, मिठाई और फल भी अर्पित करते हैं. मंदिर में हरी सब्जियां और फल चढ़ाने का अर्थ है कि माता को उनके प्रिय भोग अर्पित करना. श्रद्धालु मानते हैं कि इससे मां प्रसन्न होकर अन्न-धान्य और समृद्धि का आशीर्वाद देती हैं. मान्यता है कि जो भक्त सच्चे मन से माता को हरी सब्जियां चढ़ाते हैं, उनके घर में कभी अन्न की कमी नहीं होती और परिवार का स्वास्थ्य अच्छा बना रहता है. भाद्रपद शुक्ल अष्टमी को यहां विशाल मेला भरता है. पौष पूर्णिमा को माता का जन्मोत्सव मनाया जाता है. इन अवसरों पर हजारों भक्त मंदिर पहुंचते हैं. चौहान वंश सहित कई समाज माता शाकंभरी को अपनी कुलदेवी के रूप में पूजते हैं.
भैरवनाथ के दर्शन के बिना अधूरे माने जाते हैं पूजन
माता शाकंभरी के मंदिर के ठीक सामने स्थित है लाखड़िया भैरव बाबा का मंदिर. मान्यता है कि माता के दर्शन तब तक अधूरे हैं जब तक भक्त भैरव बाबा के दर्शन न करें. हाल ही में इस मंदिर का भी पुनर्निर्माण हुआ है. यहां तक पहुंचने के लिए रास्ता झील के बीच से होकर गुजरता है, जो भक्तों के लिए एक अद्भुत अनुभव बन जाता है.
ये लेख सामान्य जानकारी है, जो स्थानीय परंपराओं और मान्यताओं पर आधारित है, जिसकी जी मीडिया पुष्टि नहीं करता है.
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