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Rajasthan News: पहले प्रधान, फिर विधायक, 2018 में शिक्षा राज्यमंत्री और उसके बाद 2020 में प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष, गोविंद डोटासरा के सियासी सफर ने एक बार रफ्तार पकड़ी तो फिर रूकने का नाम ही नहीं लिया. जुलाई 2020 में सचिन पायलट गुट की बगावत के चलते तत्कालीन अशोक गहलोत सरकार खतरे में आ गई थी. ऐसे संवेदनशील समय में गोविंद सिंह डोटासरा को पार्टी ने अचानक प्रदेश अध्यक्ष बना दिया, तब से अब तक उन्होंने न सिर्फ पार्टी संगठन को खड़ा किया. बल्कि कई चुनावी संघर्षों का भी सामना किया. गुटबाजी, आरोप, विवाद और सियासी उठापटक के बीच डोटासरा ने कई मोर्चों पर मजबूती साबित की तो कई मोर्चे पर उन्हें चुनौतियों का सामना करना पड़ा. एक तरफ पायलट का खेमा, दूसरी तरफ गहलोत, डोटासरा ने दोनों के बीच संतुलन साधते हुए संगठन की मजबूती पर फोकस किया. पार्टी आलाकमान की उम्मीदों पर खरा उतरने की कोशिश की.
प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद डोटासरा ने संगठन के पुनर्निर्माण का काम शुरू किया. जब गोविंद सिंह डोटासरा पीसीसी चीफ बने थे, तब अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने राजस्थान कांग्रेस का पूरा संगठन ही भंग कर दिया था. भारी गुटबाजी, सरकार की अस्थिरता से कांग्रेस कार्यकर्ताओं का मनोबल भी टूटा हुआ था. डोटासरा ने सबसे पहले संगठन को बूथ स्तर तक खड़ा किया, फिर प्रदेश कार्यकारिणी को नये सिरे से तैयार किया. उन्होंने नई नियुक्तियां की, मंडल और नगर अध्यक्षों की पहली बार नियुक्ति की, बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं से संवाद का नया प्रयोग किया और संगठन को फिर से खड़ा करने के लिए कई अहम फैसले लिए.
डोटासरा के कार्यकाल में आज 52,000 बूथों पर कमेटियां बनाई जा रही हैं. राहुल गांधी के नेतृत्व में निकली भारत जोड़ो यात्रा का उन्होंने सफल आयोजन कराया, संविधान बचाओ रैलियों के जरिये आम जनता तक पार्टी की सीधी पहुंच बढाई राष्ट्रीय स्तर का वॉर रूम जयपुर में स्थापित करना और अब प्रदेश कांग्रेस का नया भवन,गोविंद डोटासरा की बड़ी उपलब्धियां मानी जा रही हैं. जब कांग्रेस सरकार में थी, तब कांग्रेस चुनाव जीत रही थी. लेकिन दो हजार तेबीस के चुनाव में कांग्रेस के सत्ता से बाहर होते ही पार्टी की जीत का सिलसिला भी टूट गया.
जैसे ही पार्टी विपक्ष में आई, हालात बदल गए. लोकसभा चुनाव के बाद हुए सात विधानसभा उपचुनावों में कांग्रेस को छह में हार का सामना करना पड़ा और सिर्फ दौसा सीट ही पार्टी के खाते में आ सकी. झुंझुनू, देवली-उनियारा, सलूंबर, चौरासी, रामगढ़ और खींवसर में पार्टी हार गई. हालांकि, लोकसभा चुनाव में डोटासरा ने भाजपा के मिशन 25 को रोक दिया. 2014 और 2019 में जहां पार्टी का खाता भी नहीं खुला था, वहीं 2024 में कांग्रेस गठबंधन को 11 सीटें मिलीं, जिनमें 8 कांग्रेस और 3 गठबंधन की थी. यह डोटासरा के लिए बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है, पर पार्टी हारे या जीते डोटासरा इसकी चिंता छोड़ आने वाले चुनावों पर फोकस कर रहे हैं. उनका असली ध्यान स्थानीय निकाय और पंचायत राज चुनाव पर है. इन चुनावों को लेकर हो रही देरी पर वो सरकार की जमकर आलोचना कर रहे हैं. सड़क हो या सदन डोटासरा ने पिछले पांच साल में अपने आप को हर मोर्चे पर अपनी पहचान छोड़ने की कोशिश की है. न अंदाज बदला, न किसी के दबाव में आते दिखाई दिए, सरकार के खिलाफ आज वो विपक्ष की सबसे बुलंद आवाजों में शुमार हैं.
कभी गमछा डांस तो कभी तेजल सुपर डुपर पर उनके वायरल होते वीडियो, वो जहां भी जाते हैं कार्यकर्ताओं में नये जोश और नई ऊर्जा का संचार करने की कोशिश करते हैं. पार्टी को ग्रास रूट पर मजबूत बनाने के लिए उन्होंने दिन रात एक किए हैं. बीजेपी की तर्ज पर संगठन में जान फूंकने के लिए उनसे जो भी संभव बन पड़ रहा है, वो सब कदम वो उठाते चले जा रहे हैं, पर डोटासरा के लिए आगे अग्निपरीक्षा का दौर है, जहां पायलट और गहलोत खेमा पार्टी में उनके बढते कद को लेकर जरूर परेशान हो रहा होगा.
रिपोर्टर- बाबूलाल धायल
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