30 लाख प्रीमैच्योर बच्चों को नई उम्मीद! जानें कैसे NICU टेक्नोलॉजी बदल रही जिंदगियां

Rajasthan News: प्री-मैच्योरिटी अब बड़ी समस्या नहीं रही. जयपुर में 23–26 हफ्ते में जन्मे कई बच्चे उन्नत NICU देखभाल से स्वस्थ जीवन जी रहे हैं. भारत में हर साल 30–35 लाख प्रीमैच्योर बच्चे जन्म लेते हैं, लेकिन आधुनिक तकनीक से सर्वाइवल रेट तेजी से बढ़ा है.

30 लाख प्रीमैच्योर बच्चों को नई उम्मीद! जानें कैसे NICU टेक्नोलॉजी बदल रही जिंदगियां

Jaipur News: जयपुर में रविवार को टोंक रोड स्थित एक निजी अस्पताल में प्री-मैच्योरिटी डे का आयोजन किया गया, जिसमें हॉस्पिटल में जन्मे लगभग 32 प्रीमिच्योर शिशुओं और उनके माता-पिता ने हिस्सा लिया. इस कार्यक्रम का उद्देश्य इन बच्चों की शुरुआती संघर्षपूर्ण यात्रा को सम्मान देना और माता-पिता को एक सकारात्मक मंच प्रदान करना था.

कार्यक्रम के दौरान नीओनेटलॉजी विभाग के विशेषज्ञ डॉ. आकाश शर्मा और डॉ. राकेश कुमावत ने शिशुओं की देखभाल और उन्नत एनआईसीयू सुविधाओं के महत्व पर चर्चा की. डॉ. आकाश शर्मा ने कहा, “23–26 सप्ताह में जन्मे कई प्रीमिच्योर शिशुओं ने सूर्या हॉस्पिटल में बेहतर देखभाल हासिल है और आज वे सामान्य और स्वस्थ जीवन जी रहे हैं.” डॉ. राकेश कुमावत ने बताया कि,जयपुर में अत्याधुनिक उपकरण, उन्नत सुविधाएँ और नवजात शिशुओं के लिए प्रशिक्षित नर्सिंग स्टाफ एवं अनुभवी डॉक्टर उपलब्ध हैं, जिससे हर प्रीमिच्योर शिशु को अब बेस्ट ट्रीटमेंट मिलता है.”

भारत में प्रीमैच्योर यानी समय से पहले जन्म लेने वाले बच्चों को बचाने की संभावनाएं अब लगातार बढ़ रही हैं. आधुनिक तकनीक, बेहतर नवजात गहन चिकित्सा इकाइयों (NICU) और प्रशिक्षित विशेषज्ञ डॉक्टरों की बदौलत देश में प्रीमैच्योर शिशुओं की सर्वाइवल रेट पहले की तुलना में काफी सुधरी है. भारत में हर साल करीब 30–35 लाख बच्चे प्रीमैच्योर पैदा होते हैं , यानी गर्भावस्था के 37 सप्ताह पूरे होने से पहले. यह दुनिया में सबसे अधिक संख्या है. समय से पहले जन्म लेने वाले बच्चों में सांस की दिक्कत, संक्रमण, वजन कम होना और ऑर्गन डेवलपमेंट से जुड़ी समस्याएं आम होती हैं.

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पिछले कुछ वर्षों में भारत में मेडिकल इंस्ट्रूमेंट्स और विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता बढ़ी है. कई राज्यों के सरकारी अस्पतालों में भी लेवल-3 NICU यूनिट्स स्थापित की गई हैं, जहां 28 हफ्ते से पहले जन्मे बेहद कम वजन वाले बच्चों को भी जिंदा रखा जा रहा है. नवजात विशेषज्ञों का कहना है कि अगर प्रीमैच्योर बच्चे को जन्म के पहले घंटे में सही इलाज मिल जाए, तो उसकी जान बचने की संभावना काफी बढ़ जाती है. डॉक्टर बताते हैं कि जागरूकता और समय पर रेफरल भी अब काफी सुधरा है, जिससे गंभीर बच्चे भी बेहतर तरीके से संभाले जा रहे हैं.

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