Rajasthan News: आरएसएस प्रमुख डॉ. मोहनराव भागवत ने जयपुर में प्रचारकों पर आधारित ग्रंथ ‘...और यह जीवन समर्पित’ का विमोचन करते हुए कहा कि संघ कार्य में स्वयंसेवक समर्पण ही सबसे बड़ी शक्ति है. उन्होंने प्रचारकों की जीवटता, त्याग और निस्वार्थ भाव को संघ की असली पहचान बताया.
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Mohan Bhagwat In Jaipur: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ मोहनराव भागवत ने कहा कि स्वयंसेवकों और प्रचारकों के लिए संघ कार्य ही सबसे महत्वपूर्ण है. संघ ने मुझे कहा कि सरसंघ चालक हो जाओ, मैं हो गया. कल संघ कहेगा उतरो झाडू लगाओ तो मैं झाडू लगाउंगा. संघ ने बताया वो कर रहा हूं, मेरी इच्छा या आकांक्षा कुछ नहीं है. संघ जो बताएगा वो सबसे महत्वपूर्ण कार्य है. संघ कार्यकर्ताओं में यही भाव प्रमुख है. डॉ भागवत ने राजस्थान के दिवंगत संघ प्रचारकों के कार्य प्रसंगों पर आधारित ग्रंथ '...और यह जीवन समर्पित' के विमोचन समारोह में ये बात कही.
राजस्थान के दिवंगत प्रचारकों की जीवन चर्चा और कार्य जुड़े प्रसंगों को लेकर ग्रंथ लिखा गया. इस ग्रंथ का रविवार को संघ के सरसंघचालक डॉ मोहनराव भागवत ने विमोचन किया. ग्रंथ में 24 प्रचारकों की जीवटता का उल्लेख किया गया है. मालवीय नगर पाथेयकण सभागार में हुए समारोह में प्रदेश के वरिष्ठ प्रचारक, प्रमुख कार्यकर्ता मौजूद रहे. समारोह के मुख्य वक्ता डॉ मोहनराव भागवत ने कहा कि संघ कार्य की अनुभूति ऐसी होती है कि विरोधी भी जाए ताे बदल जाता है. परिस्थित और भाग्य पर स्वयंसेवक का बस चलता तो संघ के सभी स्वयंसेवक प्रचारक निकल जाते. यह भाव संघ को आगे बढ़ा रहा है, संघ सौ साल से चल रहा है. बाहर की दुनिया में हजार प्रकार के प्रश्न आएंगे , सटीक उत्तर देने के बाद भी सवाल बचे ही रहेंगे.
संघ स्वयंसेवक और प्रचारक के मन में सिर्फ समर्पण
सरसंघचालक डॉ मोहनराव भागवत ने कहा भाव से हम स्वयंसेवक बनें, परिस्थिति अनुकूल रही तो प्रचारक बनें. प्रचारक के मन में इच्छा नहीं होती कि फोटाे छपे, यह भी इच्छा नहीं रहती कि कोई हमारे प्रति कृतज्ञता व्यक्त करे. राजस्थान से हैं तो प्रचारक जीवन पर ग्रंथ लिख दिया, लेकिन सुदूर दुनिया में भी प्रचारक की कहानी ऐसी ही होती है. प्रचारक का समर्पण केवल समय का नहीं रहता है, वो तो सबकुछ दे देता है, उसे नाम भी नहीं चाहिए. कितने ही नाम ऐसे होंगे जो हमें मालूम नहीं है. जो संघ कार्य के भाव को नहीं समझते वो टीका टिप्पणी भी करते हैं, हमने अपना चेहरा दिखाने के लिए संघ कार्य का वरण नहीं किया. अब संघ की स्थितियां बदल गई है. इनके समय में संघ कार्य अतिशय कठिन था. व्यक्ति प्रचारक निकले ऐसी कोई परिस्थिति नहीं थी, संघ का काम छोटा और उपेक्षित था. डॉ हैडगेवार पर भी हंसते थे, बच्चों को लेकर संघ कार्य करेगा. हिंदू संगठन मेंढक तोलने जैसा था.
संघ कार्य अनुभूति और कल्पना से परे
डॉ भागवत ने कहा कि संघ का कार्य अनुभूति और कल्पना से परे है. स्वयंसेवकों का समर्पण और समाज का आयाचित स्नेह भी कल्पना से परे है. उस समय ऐसी स्थिति थी कि संघ कार्य होने वाला था ऐसा भी कुछ नहीं था. कौन कल्पना कर सकता है कि शाखा चलाकर राष्ट्र का कुछ भला होने वाला है. लोग कहते थे कि हवा में डंडे घुमा रहे हैं, कुत्ते भी मारने के काम नहीं आएंगे, ये क्या राष्ट्र की सुरक्षा करेंगे ? सामने सब अंधेरा ही था, प्रचारक जाना यानि अंधेरे में कूदना. अपने हाथ से अपने भविष्य पर मिट्टी पोतने के समान था. लेकिन एक भाव था भारत माता के लिए मैं नहीं करूंगा तो कौन करेगा ? मैं उसका अच्छा पुत्र कैसे कहलाउंगा . ? स्वयंसेवकों में उत्कट भावना और हेडगवार पर विश्वास यही था . उस समय प्रचारक निकले देशभर में गए काम खड़ा किया कार्यकर्ता खड़े किए इतनी सुदृढ नींव बनाकर गए.
आज परिस्थिति में अंतर, लेकिन माथा पच्ची ज्यादा
डॉ भागवत ने कहा कि आज संघ की परिस्थित में बहुत बड़ा अंतर आया है. संघ का कार्य आज समाज व्यवस्था और लोगाें के बीच चर्चा का विषय है. कष्ट कम हुआ है, लेकिन माथा पच्ची जरूर बढ़ी है जो पहले नहीं थी. काम करने के लिए शरीर चलाने की समस्या नहीं है. इस अनुकूलता में प्रचारक ने क्या किया यह महत्वपूर्ण नहीं है, उसने क्या किया था यह महत्वपूर्ण है. महापुरुष उनके कृत्यों के लिए जाने जाते हैं, वहीं स्वयंसेवक जानते हैं कि हम महापुरुष नहीं है हम तो साधारण लोग हैं. स्वभाविक काम है अपने देश के लिए काम करना है. समर्पण होता है इसके चलते उनमें ताकत आ जाती है. अपने कुछ जन्मजात गुणों के अलावा संघ कार्य में बहुत नई बातें सीख लेते हैं. लेकिन उनकी शक्ति का पूर्ण आविष्कार तब होता है जब वो अपनी इच्छा को भी संघ में विसर्जित कर देते हैं. संघ ने जो काम बताया वो सबसे महत्वपूर्ण है, उसमें संतोष का भाव है . मैं मेरा, मेरी रूचि, मेरी अरूचि, मेरा अभिमत कुछ नहीं है, संघ जो कहेगा वो मैं करूंगा. समर्पण की शक्ति ऐसी होती है.
संघ को जानना है तो यहां आकर अनुभूति करें
डॉ भागवत ने कहा कि संघ के प्रचारक निकले हैं, अभी भी निकल रहे हैं. संघ कार्य सब विपरीतितओं के बावूजद लगातार बढ़ रह है. स्वयंसेवकों के भाव बल और जीवन बल से आगे बढ रहा है, यही संघ का रहस्य है . लोग बाहर से टीका टिप्पणी करते हैं, वो यह रहस्य बताने के बावजूद समझेंगे नहीं जब तक संघ में आकर संघ कार्य की प्रत्यक्ष अनुभूति नहीं लेते. आज इस परम्परा को समझने की आवश्यकता है. अब संघ की उपेक्षा और विरोध समाप्त हो गया है, अनुकूलता ही अनुकूलता है. न चाहते हुए प्रसिद्धि होती है, न चाहते हुए मान प्राप्त होता है. कार्य के आवश्यक भाग के नाते सम्मान पर बैठना पड़ता है.
ग्रंथ पढ़कर सीख लेनी चाहिए
भागवत ने कहा कि प्रचारकों की जीवटता से सीख लेना होगा. मानसिकता से हर स्वयंसेवक प्रचारक हो जाता है, प्रत्यक्ष परिस्थिति में अंतर आता है. संघ की यही जीवन शक्ति है. संघ को अपना कार्य सफल करना है तो इसी शक्ति से आगे बढ़ना है. संघ केवल शाखा मैदान या कागज नहीं है. संघ यानी स्वयंसेवक, संघ यानी स्वयंसेवकों का जीवन है. उनका भाव बल है और इसके आधार पर आगे बढ़ना है. इस ग्रंथ को पढना उनके प्रति कृतज्ञता गौरव का भान करना उनको अच्छा नहीं लगेगा लेकिन अगर इसको पढ़कर अपने कार्य से शतांश भाव आ गया तो वो खुश होंगे. इस ग्रंथ को स्वयंसेवकों को अपने घर में रखना चाहिए . स्वयंसेवकों की नई पीढ़ी को इसका वाचन करना चाहिए. हमारे पथ आलोकित करने वाला उस पथ पर चलने वाला ग्रंथ बन गया है. प्रकाशन किया है तो वरण किया है.
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