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Input Tax Credit Explainer: भारत सरकार ने साल 2025 में 22 सितंबर को GST में सुधार करते हुए पर्सनल लाइफ और हेल्थ इंश्योरेंस के प्रीमियम पर लगने वाली जीएसटी दरों को खत्म कर दिया था. जिसके बाद से माना जा रहा था कि इसकी मदद से लोगों के लिए बीमा सस्ता हो जाएगा और आम जनका को सीधा फायदा मिलेगा. हालांकि, राजस्थान समेत कई राज्यों में इसके उलट देखने को मिल रहा है. क्योंकि सरकार की तरफ से जीएसटी हटते ही बीमा कंपनियों ने अपने बेस प्रीमियम में लगभग 8 से 12 फीसदी तक की बढ़ोतरी कर दी. इसका नतीजा यह रहा कि राहत मिलने के बजाय ग्राहकों को पहले से ज्यादा प्रीमियम चुकाना पड़ रहा है.
बीमा कंपनियों की इस नीति के चलते कई उपभोक्ताओं को जीएसटी में मिली छूट का पूरा लाभ नहीं मिल सका है, जबकि कुछ लोगों पर तो अतिरिक्त आर्थिक बोझ ही बढ़ गया है. जानकारों का कहना है कि पहले कंपनियां अलग-अलग खर्चों पर दिए गए जीएसटी को बीमा प्रीमियम पर लगने वाले जीएसटी से समायोजित कर लेती थीं. लेकिन जीएसटी शून्य होने के बाद यह व्यवस्था खत्म हो गई. ऐसे में हुए नुकसान की भरपाई के लिए कंपनियों ने प्रीमियम बढ़ाकर उसका भार सीधे उपभोक्ताओं पर डाल दिया.
क्या है इनपुट टैक्स क्रेडिट (आईटीसी)?
इनपुट टैक्स क्रेडिट, जिसे आम भाषा में आईटीसी कहा जाता है, जीएसटी व्यवस्था का एक अहम हिस्सा है. इसका मतलब होता है कि व्यापार या सेवा से जुड़ी किसी भी खरीद पर जो GST चुकाया गया, उसे आगे बिक्री या सेवा देने पर वसूले जाने वाले GST से घटाने की सुविधा. सीधे शब्दों में कहें तो यह पहले दिए गए टैक्स की भरपाई का तरीका है, ताकि टैक्स पर दोबारा टैक्स न लगे.
बीमा कंपनियां भी अपने रोजमर्रा के कामकाज में कई तरह की सेवाएं और सामान लेती हैं, जैसे आईटी सेवाएं, ऑफिस खर्च, एजेंट कमीशन आदि. इन सब पर वे GST चुकाती हैं, जिसका दावा वे ITC के जरिए कर सकती हैं.
बीमा पॉलिसी में आईटीसी कैसे लगता है?
बीमा कंपनियां जब कोई पॉलिसी तैयार करती हैं, तो उसके पीछे कई खर्च होते हैं. इन खर्चों पर दिया गया GST पहले इनपुट टैक्स कहलाता है. अगर कंपनी को ITC का लाभ मिलता है, तो वह इस टैक्स को अपने अंतिम हिसाब से घटा लेती है. इसका सीधा असर यह होता है कि कंपनी पर टैक्स का बोझ कम पड़ता है और पॉलिसी का प्रीमियम नियंत्रित रहता है. जब ITC की सुविधा होती है, तो बीमा कंपनियों के लिए लागत कम हो जाती है और इसका कुछ फायदा ग्राहकों तक भी पहुंचता है.
जीएसटी हटने से क्या असर पड़ा?
हाल के समय में कुछ बीमा सेवाओं पर GST या ITC से जुड़ी छूट हटाई गई. इसका मतलब यह हुआ कि कंपनियां अब अपने कुछ खर्चों पर दिए गए टैक्स का क्रेडिट नहीं ले पा रही हैं. नतीजतन, जो टैक्स पहले एडजस्ट हो जाता था, वही अब सीधा खर्च बन गया. इससे बीमा कंपनियों की कुल लागत बढ़ गई.
फिर बेस प्रीमियम क्यों बढ़ा?
जब किसी कंपनी का खर्च बढ़ता है, तो उसका असर सीधे कीमतों पर पड़ता है. ITC न मिलने से बीमा कंपनियों का खर्च बढ़ा और इसी बोझ को संतुलित करने के लिए बेस प्रीमियम में बढ़ोतरी की गई. यानी GST हटने से भले ही ग्राहक को ऊपर से टैक्स कम दिखे, लेकिन अंदरूनी खर्च बढ़ने के कारण प्रीमियम महंगा हो गया.
लोगों की सैलरी और रोजमर्रा की जिंदगी पर असर
बीमा प्रीमियम बढ़ने का सीधा असर आम लोगों की मासिक सैलरी और बजट पर पड़ा है. पहले जो रकम बचत में जाती थी, अब वही बीमा प्रीमियम में खर्च हो रही है. खासतौर पर मध्यम वर्ग के परिवारों के लिए यह अतिरिक्त बोझ बन गया है, क्योंकि महंगाई पहले से ही रोजमर्रा के खर्च बढ़ा रही है.
इनपुट टैक्स क्रेडिट सिर्फ व्यापारियों तक सीमित विषय नहीं है. बीमा जैसे जरूरी सेक्टर में ITC की व्यवस्था बदलने से उसका असर सीधे आम आदमी की जेब तक पहुंचता है. इसलिए ITC को समझना जरूरी है, क्योंकि इसका संबंध सिर्फ टैक्स से नहीं, बल्कि आपकी बचत और खर्च से भी जुड़ा हुआ है.
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