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Rajasthan Politics News: राजस्थान की राजनीति में एसआई भर्ती पर क्रेडिट लेने की होड़ ने उबाल ला दिया है, जहां दो दिग्गज नेताओं—डॉ. किरोड़ी लाल मीणा और हनुमान बेनीवाल—की जुबानी जंग ने पूरे प्रदेश की खासी किरकिरी कराई है. एक किरोड़ी, एक हनुमान—एक का आरोप तो दूसरे का प्रत्यारोप, हनुमान ने डॉ. किरोड़ी को भला-बुरा कहा, तो डॉ. किरोड़ी नॉन-स्टॉप हो गए और हनुमान पर बजरी, पैसा, पार्टी, पेपर लीक जैसे आरोपों की बौछार कर दी. हनुमान भी पीछे न रहे, उन्होंने किरोड़ी पर ब्लैकमेल करने और नेताओं से पैसे वसूलने जैसे आरोप लगा दिए.
दोनों ने न तो एक-दूसरे की मान-मर्यादा देखी, न गरिमा का ख्याल रखा; एक बार गुस्सा भड़का तो दोनों कहते ही चले गए. हालांकि, दोनों ने लंबा साथ दिया था, लेकिन राहें जुदा होते ही एक-दूसरे की आंख की किरकिरी बन गए. हनुमान ने जयपुर में रैली कर एसआई भर्ती रद्द करने की मांग की, भारी भीड़ जुटाई, तो किरोड़ी ने भी युवाओं का समर्थन किया और हनुमान के धरना स्थल पर जाकर खड़े हुए. फिर ऐसा क्या हुआ कि रिश्ते, दोस्ती, बड़प्पन सब तार-तार हो गया?
डॉ. किरोड़ी और हनुमान बेनीवाल दोनों आंदोलन की राजनीति के पर्याय हैं. किरोड़ी लाल मीणा का राजनीतिक सफर लंबा है—विधायक, मंत्री, निर्दलीय लोकसभा सांसद, राज्यसभा सदस्य—लेकिन उनकी मेहनत के मुकाबले कम मिला; उनके कार्यकर्ता उन्हें मुख्यमंत्री देखने को लालायित हैं.
हनुमान ने पिता की विरासत संभाली, 2008 से बीजेपी विधायक बने, फिर रालोपा बनाई; खींवसर से तीन बार विधायक, भाई नारायण बेनीवाल भी जीते, नागौर से दो बार सांसद. जानकारों का मानना है कि एसआई भर्ती पर किरोड़ी ने अपनी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोला, हनुमान युवाओं के साथ संघर्ष करते रहे; हाईकोर्ट ने रद्द की तो दोनों ने अपनी सफलता से जोड़ा. जोश में आपा खो बैठे, क्योंकि जीवन की मेहनत के बावजूद राजनीति में उतना हासिल नहीं हुआ—यह टीस ने आग बबूला कर दिया.
किरोड़ी का दबदबा पूर्वी राजस्थान में, हनुमान का नागौर-जोधपुर-बाड़मेर तक, कार्यकर्ता इसे अपनी सफलता मानकर प्रचार कर रहे थे. क्रेडिट की प्रतिस्पर्धा ने जुबानी जंग का हथियार बनाया. जानकारों ने इसे राजस्थान का काला अध्याय कहा. राजस्थान के नेताओं के आपसी व्यवहार, दोस्ती और गरिमामयी संसदीय जीवन की देशभर में मिसालें हैं—कुंभाराम आर्य और मोहनलाल सुखाड़िया के तल्ख रिश्तों में भी सम्मान, शिवचरण माथुर-हरिदेव जोशी की अनबन में नीचता न दिखाई, भैंरोसिंह शेखावत-मोहनलाल सुखाड़िया की तनातनी में सम्मान, अशोक गहलोत-वसुंधरा राजे की खटास को राजनीति तक सीमित रखा. लेकिन किरोड़ी-हनुमान की जंग ने सब पर पानी फेर दिया.
नई पीढ़ी को क्या सीख मिलेगी?
बेहतर यही कि दोनों जनता के सामने आएं, पछतावा करें या आरोपों की हकीकत रखें—कौन सच बोल रहा, कौन छुपा रहा. लेकिन मुद्दे की गूंज अगले चुनाव तक बनी रहेगी, क्योंकि क्रेडिट से जुड़ा है तो कौन दावा छोड़ेगा.