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Rajasthan News: राजस्थान के जयपुर की पहाड़ियों में बसा आमेर, इन दिनों सिर्फ इतिहास ही नहीं, बल्कि अध्यात्म का भी केंद्र बना है. जहां एक ओर सावन का पवित्र महीना श्रद्धा की वर्षा लाया है. वहीं दूसरी ओर अंबिकेश्वर महादेव मंदिर में घट रहा है एक ऐसा दृश्य, जिसे देखकर भक्तों की आस्था और भी दृढ़ हो जाती है.
यहां गर्भगृह में स्थित शिवलिंग हर वर्ष सावन में जल में समा जाता है. खास बात ये है कि यह भूगर्भ से आता है. मान्यता है कि यह गंगाजल स्वयं शिव का अभिषेक करने आता है. यह कोई सामान्य जल नहीं है. इसे हम मां गंगा का रूप मानते हैं. शिवजी इस दौरान जल समाधि में चले जाते हैं. यह प्रकृति की आराधना है, ईश्वर की महिमा का प्रमाण है.
सावन की पावन बेला में जब चारों ओर हरियाली और भक्ति का माहौल होता है, तब जयपुर के आमेर क्षेत्र में स्थित अंबिकेश्वर महादेव मंदिर दिव्य ऊर्जा का स्रोत बन जाता है. पहाड़ियों की गोद में स्थित यह शिवधाम इन दिनों जलमग्न शिवशिला के रूप में भक्तों के लिए अद्भुत अनुभूति बन चुका है. हर साल की भांति इस बार भी जैसे ही सावन ने दस्तक दी.
मंदिर के गर्भगृह में स्थित शिवलिंग पर भूगर्भ से जलधारा का स्वाभाविक प्रवाह शुरू हो गया. आश्चर्यजनक रूप से यह जल किसी बाहरी स्रोत से नहीं आता, बल्कि धरती की अतल गहराई से स्वतः प्रस्फुटित होता है. इसे भक्तगण मां गंगा का साक्षात स्वरूप मानते हैं, जो स्वयं भगवान शिव का अभिषेक करने आती हैं.
मंदिर के मुख्य पुजारी संतोष व्यास के अनुसार यह घटना केवल भौगोलिक या मौसम विज्ञान से नहीं समझी जा सकती. यह भोलेनाथ की लीला है. जहां सृष्टि स्वयं अपने सृजनकर्ता की आराधना में लीन हो जाती है. श्रद्धालु इस दृश्य को देखकर भावविभोर हो उठते हैं और इसे ''जल समाधि'' का प्रतीक मानकर आराधना करते हैं.
भूतल से मंदिर की गहराई लगभग 22 फीट है और शिवलिंग तक पहुंचने के लिए भक्तों को विशेष झरोखे से दर्शन करने होते हैं. जलस्तर बढ़ने के बावजूद श्रद्धालु घंटों तक गर्भगृह के बाहर खड़े सीढ़ियों पर खड़े होकर पूजा अर्चना करते है, लेकिन इस जलमग्न शिवशिला के दर्शन मात्र से ही उनकी आंखें श्रद्धा से छलक उठती हैं.
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इतिहास में अम्बिकेश्वर महादेव मंदिर का उल्लेख भागवत पुराण और शिव पुराण दोनों में मिलता है. मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने यहां ग्वाल बालों संग तप किया था और राजा अमरीश ने इसी अंबिका वन में घोर तपस्या कर भगवान शिव को प्रसन्न किया था. अंबिका वन ही कालांतर में ''अंबिकेश्वर'' और फिर ''आम्बेर'' के नाम से प्रसिद्ध हुआ.
सावन में यहां हर पत्थर शिवमय प्रतीत होता है और हर जलकण में गंगाजल की अनुभूति होती है. भक्तों का विश्वास है कि यह मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि अध्यात्म, इतिहास और चमत्कार का त्रिवेणी संगम है. श्रद्धालु इस अलौकिक अनुभूति को अपने जीवन की सबसे पवित्र स्मृति मानते हैं.
जल में डूबा शिवलिंग, भक्तों की आस्था में डूबा मंदिर और गूंजते ''हर-हर महादेव'' के स्वर यह दृश्य सावन के धार्मिक महत्व को चरम पर पहुंचा देता है. बहरहाल, सावन की शिवभक्ति जब प्रकृति से जुड़ जाती है, तब अंबिकेश्वर महादेव मंदिर जैसे स्थल केवल तीर्थ नहीं, दिव्य अनुभूति बन जाते हैं.
यहां न केवल जलाभिषेक हो रहा है, बल्कि आस्था भी निरंतर बह रही है. जयपुर की ऐतिहासिक धरोहरों में यह मंदिर केवल स्थापत्य नहीं, एक जीवंत आस्था का स्तंभ है. सावन में यहां का हर क्षण, हर दर्शन एक अध्यात्मिक यात्रा है.
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