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Jaipur News: प्रदेश की ब्यूरोक्रेसी इन दिनों ‘कुर्सी संग्राम’ की धीमी चाल से जूझ रही है. जहां एक तरफ आरएएस से बने आईएएस अफसर अपनी पहली असली जिम्मेदारी का इंतजार कर रहे हैं. वहीं आरपीएस से बने आईपीएस अफसर चुटकियों में नई पोस्टिंग पाकर दफ्तर संभाल चुके हैं.
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि तीन महीने पहले प्रमोट हुए आईएएस अफसर आज भी उन्हीं कुर्सियों पर जमे हुए हैं, जिन पर वे आरएएस रहते बैठते थे. दूसरी ओर इस माह की शुरुआत में प्रमोशन पाए पांच आईपीएस अफसरों को महज तीन हफ्तों में नई जिम्मेदारी थमा दी गई.
नियुक्ति अपने आप रद्द हो जाएगी
प्रदेश की ब्यूरोक्रेसी में इन दिनों ट्रांसफर-पोस्टिंग और प्रमोशन सबसे बड़ा मुद्दा बनी हुई है. तीन महीने पहले RAS अफसरों को IAS में प्रमोट किया गया. लेकिन आज भी ये अफसर उसी कुर्सी पर बैठे हैं. जिस पर प्रमोशन से पहले थे. दूसरी तरफ 20 दिन पहले RPS से IPS बने अफसरो की यही तस्वीर बिल्कुल उलट है. इस महीने की शुरुआत में प्रमोट हुए 5 आईपीएस अफसर पीयूष दीक्षित, विशनाराम, पुष्पेंद्र सिंह राठौड़, कमल शेखावत और अवनीश कुमार को तीन हफ्ते के भीतर पोस्टिंग मिल गई. अब ये अफसर नए पदों पर कार्यभार संभाल चुके हैं. इसी कड़ी में सबसे रोचक मामला डीओपी सचिव के.के. पाठक का है. केंद्र सरकार ने 13 सितंबर को उन्हें उर्वरक मंत्रालय में संयुक्त सचिव नियुक्त किया, लेकिन जयपुर से रिलीव ही नहीं किया गया. अब स्थिति यह है कि 21 दिन की समय सीमा नजदीक है और यदि तब तक रिलीव नहीं हुए तो नियुक्ति अपने आप रद्द हो जाएगी.
दूसरे RAS अफसर की पोस्टिंग कर दी गई
आरएएस से आईएएस में प्रमोशन पाकर 2016 बैच में शामिल किए गए नवनीत कुमार, सुखवीर सैनी, हरफूल सिंह यादव, राजेश वर्मा, सुरेश चंद्र, महेंद्र खींची, अजीत सिंह राजावत, अवधेश शर्मा, राकेश शर्मा, जगवीर सिंह, बृजेश चंदोलिया, डॉ. हर सहाय मीणा, जुगल किशोर मीणा, राकेश राजोरिया, ललित कुमार और डॉ. शिव प्रसाद सिंह जैसे अफसर प्रमोशन के बाद भी वही काम कर रहे हैं. जो RAS रहते करते थे. इन्हें IAS तो बना दिया गया, लेकिन जिम्मेदारियां बढ़ाने के बजाय वही फाइलें और वही डेस्क थमा दी गईं. जबकि इसी बैच के डायरेक्ट IAS आज जिलों में कलेक्टर बनकर काम कर रहे हैं. प्रमोटी IAS हरफूल सिंह यादव को तो नई सूची से बाहर कर दिया गया. उनकी जगह दूसरे RAS अफसर की पोस्टिंग कर दी गई, नतीजा यह हुआ कि यादव अब एपीओ होकर घर बैठे हैं.
‘प्राथमिकताओं’ का खेल तो नहीं
बहरहाल, ब्यूरोक्रेसी की इस ‘धीमी बनाम तेज’ चाल ने सरकारी गलियारों में नई बहस छेड़ दी है. सवाल उठ रहा है कि आखिर एक ही सिस्टम में दो कैडर के अफसरों के साथ इतना अलग व्यवहार क्यों? कहीं यह महज ‘प्राथमिकताओं’ का खेल तो नहीं? सवाल ये है कि जब RPS से IPS बने अफसरों को तुरंत जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है तो RAS से IAS बने अफसरों को क्यों इंतजार करवाया जा रहा है? ब्यूरोक्रेसी के गलियारों में इस सवाल ने ही सबसे ज्यादा चर्चा गर्म कर दी है.
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