जयपुर एक शहर-एक निगम का मॉडल, मगर कामकाज में दो सिस्टम बरकरार

Jaipur News: राजस्थान सरकार ने जयपुर में “एक शहर-एक निगम” का बड़ा ऐलान तो कर दिया, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है. कागजों में अब जयपुर एकीकृत नगर निगम बन चुका है. मगर हकीकत में यह एक निगम, दो सिस्टम की तरह चलने वाला है.

जयपुर एक शहर-एक निगम का मॉडल, मगर कामकाज में दो सिस्टम बरकरार

Jaipur News: राजस्थान सरकार ने जयपुर में “एक शहर-एक निगम” का बड़ा ऐलान तो कर दिया, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है. कागजों में अब जयपुर एकीकृत नगर निगम बन चुका है. मगर हकीकत में यह एक निगम, दो सिस्टम की तरह चलने वाला है.

निगम आयुक्त के आदेश के मुताबिक व्यवस्था की सुचारुता के नाम पर पूर्व ग्रेटर निगम के क्षेत्र को पार्ट-1 और पूर्व हेरिटेज निगम के क्षेत्र को पार्ट-2 का नाम दिया है. यानी नाम बदल गया पर काम वही दो-दो रास्तों से होगा. जयपुर में नगर निगम ग्रेटर और हेरिटेज को मर्ज कर एकीकृत नगर निगम जयपुर का गठन तो कर दिया गया पर कामकाज के तौर-तरीके देखकर लगता है नाम एक, सिस्टम दो.

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निगम आयुक्त ने आगामी आदेशों तक नया स्ट्रक्चर जारी करते हुए पूर्व ग्रेटर इलाके को पार्ट-1 और पूर्व हेरिटेज इलाके को पार्ट-2 घोषित किया है, लेकिन इस आदेश के बाद ना तो जनता के लिए न दफ्तर बदले न कर्मचारी. फाइलें वहीं से चलेंगी, जहां पहले चलती थीं. फर्क सिर्फ इतना है कि अब सब आदेश के अनुसार पार्ट-1 (पूर्व ग्रेटर) और पार्ट-2 (पूर्व हैरिटेज) दोनों में एक-एक अतिरिक्त आयुक्त काम देखेंगे.

नरेंद्र कुमार बंसल को अतिरिक्त आयुक्त प्रथम (पार्ट-1) और प्रवीण कुमार को अतिरिक्त आयुक्त द्वितीय (पार्ट-2) की जिम्मेदारी दी गई है. दोनों के पास अपने-अपने क्षेत्र की पूरी प्रशासनिक कमान होगी. यानी पार्ट-1 इलाके की फाइलें बंसल के जरिए कमिश्नर तक जाएंगी और पॉर्ट-2 इलाके की फाइलें प्रवीण कुमार के रास्ते. यह भी तय किया गया है कि अगर कोई फाइल दोनों पार्ट से जुड़ी हुई है, तो वह अतिरिक्त आयुक्त-प्रथम (पार्ट-1) के जरिए ही कमिश्नर के पास जाएगी.

ग्रेटर और हेरिटेज के जिन इलाकों में पहले अलग-अलग अफसर काम संभालते थे. वहीं अब पार्ट-1 और पार्ट-2 के नाम से जारी रहेंगे. फर्क बस इतना है कि अब वे एक ही कमिश्नर के तहत दो अलग रास्तों से रिपोर्ट करेंगे. एक शहर–एक निगम की घोषणा के साथ लोगों को उम्मीद थी कि अब एक ही सिस्टम के तहत काम होंगे. फाइलों और अनुमोदनों की प्रक्रिया सरल हो जाएगी, लेकिन प्रशासनिक ढांचे में अब भी ग्रेटर–हेरिटेज की पुरानी सीमाएं जीवित हैं.

फर्क बस इतना है कि अब बोर्ड पर नया नाम लिखा है. बहरहाल निगम एक हुआ जरूर है, लेकिन दो टीमों की फील्ड स्ट्रक्चर अभी जस का तस है. यह व्यवस्था फिलहाल एक प्रयोग जैसी है, जो तय करेगी कि आगे कैसे एकीकृत होगा. उद्देश्य ट्रांजिशन फेज में कामकाज को बाधित न होने देना बताया जा रहा है, लेकिन अंदरखाने कई अफसर मानते हैं कि यह अस्थायी व्यवस्था नहीं बल्कि पुराने ढांचे की नई पैकिंग है.

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