जैसलमेर: खतरे में गाज़ी फकीर परिवार की सल्तनत, जानिए इस बार क्या हैं सियासी समीकरण

किसने सोचा था कि पायलट और गहलोत एपिसोड की तपिश गाज़ी फकीर परिवार की सल्तनत हिला देगी. 

जैसलमेर: खतरे में गाज़ी फकीर परिवार की सल्तनत, जानिए इस बार क्या हैं सियासी समीकरण
फाइल फोटो

हिंगलाज दान, जैसलमेर: किसने सोचा था कि पायलट और गहलोत एपिसोड की तपिश गाज़ी फकीर परिवार की सल्तनत हिला देगी. जैसलमेर की राजनीति में गाज़ी फकीर ही कांग्रेस की एकमात्र धुरी रहा है. सियासत की भाषा में गाज़ी फकीर को सरहद का सुल्तान कहते है, लेकिन इस बार धनदे परिवार फकीर सल्तनत की नींव हिलाने की तैयारी कर चुका है.

पायलट-गहलोत एपसोड का परिणाम ये हुआ कि मौजूदा वक्त में राजस्थान में कांग्रेस (Congress) की प्रदेश कार्यकारिणी नहीं है. संगठन के नाम पर सिर्फ प्रदेशाध्यक्ष है. लिहाजा पंचायती राज चुनाव में पार्टी ने कमान विधायकों और हारे हुए विधायक प्रत्याशियों को दी. नतीजतन जैसलमेर विधानसभा में कमान विधायक रूपाराम धनदे के हाथों में आ गई और धनदे ने गाज़ी फकीर परिवार को अपने इलाके की राजनीति में दखल देने से साफ मना कर दिया.

कांग्रेस से बागी मैदान में फकीर परिवार
इन चुनावों से पहले जैसलमेर जिले में पंचायत समितियों के प्रधान से लेकर जिला प्रमुख और जिले की दोनों विधानसभा सीटों पर MLA का टिकट फकीर परिवार की मर्जी के बिना किसी को नहीं मिल सकता था, लेकिन इस बार रूपाराम धनदे ने गाज़ी फकीर परिवार के सदस्यों को टिकट ही नहीं दिया. तो अपना अस्तित्व बचाने के लिए फकीर परिवार के 4 सदस्य निर्दलीय मैदान में उतर गए.

मौजूदा टकराव की वजह क्या है ?
2008 से पहले जैसलमेर जिले में एक ही विधानसभा थी, लेकिन 2008 के परिसीमन में पोकरण अलग से विधानसभा बन गई. 2008 में सालेह मोहम्मद पोकरण से विधायक बने. इस वक्त जैसलमेर जिला प्रमुख भी सालेह मोहम्मद का भाई था. इस बार पंचायत पुनर्गठन में जैसलमेर में 3 नई पंचायत समितियां बनी. अब जैसलमेर विधानसभा में कुल 5 पंचायत समितियां हो गई, लेकिन पोकरण में सिर्फ एक सांकड़ा पंचायत समिति है. फकीर परिवार का लगभग हर सदस्य सक्रीय राजनीति में है. ऐसे में गाज़ी फकीर परिवार जैसलमेर की पंचायत समितियों से अपने परिवार के सदस्यों को सियासी ऑक्सीजन देना चाहता था, लेकिन रूपाराम धनदे ने इस बार फकीर परिवार के खिलाफ खुलकर मोर्चा खोल दिया और फकीर परिवार के किसी सदस्य को टिकट ही नहीं दिया. ऐसे में अपने अस्तित्व को बचाने के लिए कई सदस्य निर्दलीय मैदान में उतरे है. 

गाज़ी फकीर परिवार का सियासी इतिहास 
फकीर परिवार 1975 में राजनीति में आया था. गाज़ी फकीर का राजनीति में लाने वाले जैसलमेर के तत्कालीन विधायक भोपाल सिंह थे. भोपाल सिंह 1972 में लगातार दूसरी बार जैसलमेर के विधायक बने थे. इससे पहले 1967 में वो स्वतंत्र पार्टी के टिकट पर विधायक बने थे. गाज़ी फकीर ने जैसलमेर में सियासी वर्चस्व स्थापित करने के लिए पहला दांव 1985 में खेला. विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के टिकट पर भोपाल सिंह मैदान में थे. बीजेपी की ओर से जुगत सिंह चुनाव लड़ रहे थे, लेकिन फकीर परिवार ने निर्दलीय मुल्तानाराम बारूपाल को मैदान में उतारकर मुस्लिम-मेघवाल गठबंधन का फॉर्मूला सेट किया. मुस्लिम-मेघवाल गठबंधन के इसी फॉर्मूले के सहारे फकीर परिवार पिछले 35 सालों से जैसलमेर पर राज कर रहा है.

फकीर परिवार ने दूसरा दांव 1993 में खेला. 1990 में जनता दल के टिकट पर जैसलमेर से जितेंद्र सिंह जीते थे. 1993 में जितेंद्र सिंह कांग्रेस के पाले में चले गए और कांग्रेस से टिकट ले आए. जितेंद्र सिंह राजपरिवार से आते थे. वैसे फकीर परिवार ने हुकमसिंह, रघुनाथसिंह, चंद्रवीरसिंह से लेकर रेणुका भाटी जैसे राजपरिवार के सदस्यों का हमेशा सहयोग किया, लेकिन जितेंद्र सिंह फकीर परिवार की मर्जी के बिना टिकट लाए थे. ऐसे में फकीर परिवार की ओर से फतेह मोहम्मद जैसलमेर विधानसभा से मैदान में उतरे. हालांकि नतीजों में फतेह मोहम्मद और जितेंद्र सिंह दोनों हार गए और बीजेपी के गुलाब सिंह चुनाव जीत गए, लेकिन जितेंद्र सिंह को हराकर फकीर परिवार ने अपना रास्ता फिर से साफ कर दिया.

1998 में जितेंद्र सिंह के खिलाफ गोवर्धन कल्ला को फकीर परिवार ने जितवाया था, लेकिन उनके रिश्तों में भी दूरियां बढ़ने लगी. 2003 में फकीर परिवार ने गोवर्धन कल्ला का टिकट कटवाकर जनक सिंह को कांग्रेस से टिकट दिलाया. बाद में जनकसिंह के रिश्ते भी फकीर परिवार से बिगड़े तो हालात ये हो गए कि जनक सिंह को भी मजबूरन कांग्रेस छोड़नी पड़ी. सुनीता भाटी का भी कांग्रेस में करियर सिर्फ इसीलिए नहीं बन पाया क्योंकि उनके फकीर परिवार के साथ रिश्ते कभी अच्छे नहीं रहे. 2008 में सुनीता भाटी को जैसलमेर से टिकट भी मिला, लेकिन फकीर परिवार का साथ नहीं मिला तो हार का सामना करना पड़ा. कुल मिलाकर गाज़ी फकीर ने जैसलमेर की राजनीति में कांग्रेस के भीतर अपने बराबर किसी को खड़ा नहीं होने दिया.

जैसलमेर में कांग्रेस के भीतर फकीर परिवार से 1985 के बाद किसी ने सीधी टक्कर नहीं ली. जिसने भी टक्कर ली. उन्हैं बाद में मजबूर होकर कांग्रेस छोड़नी पड़ी. रणवीर गोदारा से लेकर जितेंद्र सिंह जैसे तमाम उदाहरण मौजूद है. जो जितेंद्र सिंह 1993 में फकीर परिवार की मर्जी के बिना कांग्रेस का टिकट लाए थे. उन्हें भी बाद में वापिस बीजेपी में जाना पड़ा और 1998 में बीजेपी के टिकट पर जैसलमेर विधानसभा से मैदान में उतरे. जितेंद्र सिंह 1998 में भी नहीं जीत पाए.

गाज़ी फकीर परिवार और धनदे परिवार के रिश्ते
2003 और 2008 के विधानसभा चुनावों में जब दो बार लगातार जैसलमेर से बीजेपी को जीत मिली. 2003 में बीजेपी की ओर से राजपूत समाज से सांग सिंह भाटी चुनाव जीते. 2008 में जैसलमेर से पोकरण अलग विधानसभा बनी तो जैसलमेर से बीजेपी ने छोटू सिंह भाटी को मैदान में उतारा. और छोटू सिंह जीतने में कामयाब रहे. इधर पोकरण में फकीर परिवार से सालेह मोहम्मद चुनाव जीत गए. गाज़ी फकीर ने मुस्लिम-मेघवाल गठबंधन के सहारे में अपनी सियासत मजबूत करने के लिए जैसलमेर सीट पर मेघवाल प्रत्याशी के तौर पर रूपाराम धनदे का साथ दिया. 2013 में सुनीता भाटी का पत्ता कटवाकर रूपाराम को टिकट भी दिलाया. लेकिन रूपाराम को जितवा नहीं पाए. हालांकि बाद में पूरी ताकत लगाकर जिला परिषद में जिला प्रमुख की सीट धनदे परिवार को दिलाने में कामयाब रहे.

गाज़ी फकीर परिवार और धनदे परिवार में दुश्मनी की वजह
बताया जाता है कि 2013 के विधानसभा चुनाव में रूपाराम धनदे की हार के बाद से दोनों परिवारों के रिश्ते कभी पूरी तरह से सही नहीं रहे. 2015 में भी दोनों परिवारों में अदावत की खबरें सार्वजनिक हुई थी. हालांकि 2018 में पोकरण से बीजेपी ने प्रताप पुरी महाराज को मैदान में उतारा. तो हिंदुत्वादी ध्रुवीकरण में चपेट में आकर हारने के डर से दोनों परिवारों में नजदीकियां फिर बढ़ी. 2018 में जैसलमेर सीट पर बीजेपी की ओर से सांगसिंह मैदान में उतरे. सांगसिंह को प्रताप पुरी महाराज का भी आशीर्वाद था. ऐसे में ध्रुवीकरण की चपेट में आने के डर से दोनों सीटों पर धनदे-फकीर परिवार ने एक दूसरे का सहयोग किया. लेकिन जीत के बाद सालेह मोहम्मद मंत्री बने तो उनका दखल जैसलमेर विधानसभा में भी बढ़ने लगा. जैसलमेर जिले में उच्च अधिकारी भी सालेह मोहम्मद की पसंद के लगने लगे. जाहिर सी बात है सरकारी मशीनरी भी रूपाराम की तुलना में सालेह मोहम्मद को तवज्जो देने लगी. सालेह मोहम्मद जैसलमेर विधानसभा में भी अपना प्रभाव बढ़ाने लगे. और फकीर परिवार की बढ़ती महत्वकांक्षा को धनदे परिवार भली भांति भांप चुका था.

दोनों परिवारों के बीच भीतरखाने बढ़ रही दुश्मनी पहली बार जैसलमेर नगर परिषद चुनावों में सामने आई. जब नगर परिषद के सभापति पद पर फकीर परिवार ने अपने आदमी को बिठाने के लिए निर्दलीय प्रत्याशी को समर्थन दे दिया. और रूपाराम धनदे समर्थित कांग्रेस प्रत्याशी चुनाव हार गया. ऐसे में पंचायती राज चुनाव में धनदे परिवार को ढ़ील नहीं बरतना चाहता था. जैसलमेर में रूपाराम धनदे ने फकीर परिवार से किसी को टिकट ही नहीं दिया. क्योंकि अगर टिकट देते तो बाद में प्रधान बनाने का फैसला रूपाराम से खिसककर फकीर परिवार के पाले में चला जाता. परिणाम ये हुआ कि फकीर परिवार के सदस्य निर्दलीय मैदान में है.

अब ये है दोनों परिवारों का गणित
सिर्फ पंचायत समिति में ही नहीं, जिला परिषद में भी दोनों परिवार आमने सामने है. धनदे परिवार से विधायक रूपाराम धनदे की बेटी और पूर्व जिला प्रमुख आंजना मेघवाल के अलावा रूपाराम का बेटा हरीश मेघवाल जिला परिषद सदस्य के तौर पर मैदान में है. जाहिर सी बात है धनदे परिवार की ओर से जिला प्रमुख के लिए दो दावेदार मैदान में है. तो वहीं फकीर परिवार की ओर से अब्दुला फकीर के अलावा अमरदीन की पत्नी भी जिला परिषद का चुनाव लड़ रहे है. जाहिर सी बात है जिला प्रमुख पद के लिए भी फकीर परिवार और धनदे परिवार में सीधा मुकाबला होना तय है.

अमरदीन की पत्नी कांग्रेस के टिकट पर जिला परिषद का चुनाव लड़ रही है लेकिन अमरदीन खुद कांग्रेस से बागी होकर चुनाव लड़ रहे है. इसके अलावा फकीर परिवार से अमीन खान, पिराणे खान और इलियास फकीर भी निर्दलीय पंचायत समिति सदस्यों का चुनाव लड़ रहे है. जाहिर सी बात है, अगर जीते, तो प्रधान पद के लिए भी ताल ठोकेंगे. या फिर अपने सियासी वर्चस्व को बनाए रखने के लिए धनदे समर्थित उम्मीदवारों को हराने के लिए भी जाल बिछा सकते है.

ऐसे में अब ये जिला परिषद और पंचायत समिति का चुनाव ही ये तय करेगा कि जैसलमेर की राजनीति में गाज़ी फकीर परिवार का एक ध्रुव राज रहेगा. या धनदे परिवार फकीर को सियासी सल्तनत से बेदखल करने में कामयाब रहेंगा. अगर जिला प्रमुख और पंचायत समितियों में प्रधान के पदों तक फकीर परिवार नहीं पहुंच पाता है, तो उसके लिए आगे का रास्ता बेहद मुश्किल होने वाला है. मुस्लिम मेघवाल गठबंधन टूटने का असर आने वाले विधानसभा चुनावों पर भी पड़ेगा. तो फिर 2023 में पोकरण विधानसभा से भी सालेह मोहम्मद को मुश्किलें हो सकती है.

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