आर्थिक संकट से जूझ रहे झालावाड़ के दरांती निर्माता लोहार, कुछ यूं सुनाई दास्तान

कम बारिश और कोरोना महामारी के चलते लोहार जाति के धंधे चौपट हो गए.

आर्थिक संकट से जूझ रहे झालावाड़ के दरांती निर्माता लोहार, कुछ यूं सुनाई दास्तान
प्रतीकात्मक तस्वीर.

महेश परिहार, झालावाड़: जिले के डग कस्बे में एक मोहल्ला ऐसा भी है, जहां बड़ी संख्या में लोहार जाति के लोग निवास करते हैं और बरसों से दरांती और खंडासी सहित अन्य लोहे के औजार तैयार करके अपनी आजीविका चलाते हैं लेकिन इस वर्ष एक और कोरोना महामारी तो दूसरी ओर बारिश ने भी साथ नहीं दिया. कम बारिश और कोरोना महामारी के चलते लोहार जाति के धंधे चौपट हो गए.

जहां चाकुओं की बात आए तो उसकी विशेषता पर रामपुरी शब्द अनायास ही उसके साथ जुड़ जाता है, उसी तरह झालावाड़ जिले में कृषक समुदाय द्वारा फसल काटने में प्रमुख उपयोग में लिए जाने वाले औजार दराती व खंडासी के साथ भी झालावाड़ जिले के डग कस्बे का नाम प्रमुखता से लिया जाता है. डग कस्बे की बनी दरारियाँ ना केवल झालावाड़ बल्कि सीमावर्ती मालवा मध्य प्रदेश और गुजरात क्षेत्र तक बिकने जाती है लेकिन अब दरांती निर्माण में लगा लोहार समुदाय इन दिनों खासी आर्थिक परेशानियों का सामना कर रहा है. 

यह भी पढ़ें- सवाई माधोपुर में पलटी श्रद्धालुओं से भरी ट्रैक्टर-ट्रॉली, 2 की मौत, 29 घायल

 

आखिर क्यों हुए इनके ऐसे हालात
कस्बे के लोहार मोहल्ला निवासी बुजुर्ग रामचन्द्र लोहार ने बताया कि उनकी कितनी ही पीढ़ियां यह पुश्तैनी कार्य करती रही हैं. कृषि कार्य में आने वाले दरांती और गंडासी को धार देने में डग में निवास करने वाले लोहार समुदाय विशेष कला रखता है, इसी खासियत के चलते डग में बनी दरांती और गंडासिया न केवल झालावाड़ जिले और राजस्थान बल्कि सीमावर्ती मध्य प्रदेश तथा गुजरात तक बिकने जाती है. किसी समय डग कस्बे में लोहार समुदाय का एक बाजार हुआ करता था, जहां इन कृषि औजारों को बनाने और बेचने का बड़े स्तर पर कार्य चलता था लेकिन समय के साथ आए बदलाव ने लोहार समुदाय के सामने आर्थिक संकट खड़ा कर दिया. अब लोहार समुदायों के कारीगर बाजार में दुकानें न लगाकर अपने घरों में ही छोटे कारखाने चला रहे हैं, जहां तपती भट्टीयों के बीच गर्म लोहे पर हथौड़े की पड़ती चोटों से वे लोहे के टुकड़े को दराती व गंडासे सहित कृषि के अन्य औजार में तब्दील कर देते हैं.

गुजारा तो सभी परिवारों का ठीक चल रहा था, लेकिन इस वर्ष कोरोना ओर सोयाबीन फसल खराब होने से उनका धंधा चोपट हो गया. माल बना रखा है, मगर माल का भाव और उठाव नही होने से उन्हें आर्थिक परेशानी से जूझना पड़ रहा है.

यह भी जानिए
बता दें कि डग कस्बे में 40 से 50 परिवार इस व्यवसाय से जुड़े हैं, जिनकी आजीविका का स्त्रोत मात्र यही है. अधिकतर माल राजस्थान, गुजरात और मध्यप्रदेश मे जाता है, जो इस वर्ष कोरोना माहामारी के चलते सम्भव नहीं हो पाया. बुजुर्ग रामचंद्र लोहार के अनुसार सरकार के द्वारा उन्हें किसी प्रकार की कोई आर्थिक सहायता नहीं दी जाती है, मजबूरन सभी साहूकारी ब्याज पर धंधा कर रहे हैं. सरकार अगर चाहे तो यहां इस प्रकार का एक छोटा उद्योग लगाकर इन लोगों को लाभान्वित कर सकती है, जिससे कि इन लोगों को रोजगार मिल सके और साथ ही झालावाड़ जिले का डग कस्बा अपनी विशेष पहचान भी कायम रख सके.