BSF स्थापना दिवस: 5 गोलियां खाकर लिया था आतंकियों से लोहा, जानिए झुंझनू के लाल की कहानी

झुंझुनूं के चिड़ावा पंचायत समिति के सांख्यिकी अधिकारी रणसिंह एक ऐसे शख्स हैं, जिनके चेहरे पर हमेशा मुस्कान रहती है लेकिन इस शख्स की बहादुरी के किस्से आज भी बीएसएफ के जवानों में जोश पैदा करने के लिए सुनाए जाते हैं. 

BSF स्थापना दिवस: 5 गोलियां खाकर लिया था आतंकियों से लोहा, जानिए झुंझनू के लाल की कहानी
बटालियन 8 के सब इंस्पेक्टर रणसिंह तीन टुकड़िय़ों के साथ सर्च ऑपरेशन में जुटे

संदीप केडिया, झुंझुनूं: आज बीएसएफ का स्थापना दिवस है. आज ही के दिन 1965 में बीएसएफ की स्थापना की गई थी. बॉर्डर सुरक्षा के मामले में बीएसएफ के जवानों का कोई मुकाबला नहीं. अब तक कई बार ऐसे मौके आए, जब बीएसएफ के जवानों ने देश की तरफ आंख उठाने वाले आतंकवादियों को मौत की नींद सुलाया है. 

बीएसएफ के जवानों के इसी जज्बे को सलाम करते हुए आज पेश है बीएसएफ में कार्यरत एसआई रणसिंह की कहानी, जिन्होंने पांच गोलियां खाने के बाद भी दुश्मनों के आगे घुटने नहीं टेके. 

झुंझुनूं के चिड़ावा पंचायत समिति के सांख्यिकी अधिकारी रणसिंह एक ऐसे शख्स हैं, जिनके चेहरे पर हमेशा मुस्कान रहती है. लेकिन इस शख्स की बहादुरी के किस्से आज भी बीएसएफ के जवानों में जोश पैदा करने के लिए सुनाए जाते हैं. रणसिंह पंचायत समिति में नौकरी जॉइन करने से पहले बीएसएफ में सब इंस्पेक्टर के रूप में सेवाएं दे चुके हैं. जम्मू कश्मीर में अपनी पोस्टिंग के दौरान इन्होंने अनेक ऑपरेशंस में हिस्सा लिया और दुश्मनों के छक्के छुड़ाए. ऐसा ही एक ऑपरेशन था प्राग क्षेत्र का ज्वॉइंट ऑपरेशन ऋषिनगर. 23 मई 1993 को हुए इस ऑपरेशन को रणसिंह कभी नहीं भुला सकते.

ऐसे शुरू हुआ ऑपरेशन
बीएसएफ की बटालियन 8 और बटालियन 92 ने आतंकियों के छुपे होने की सूचना लगने पर ये जॉइंट ऑपरेशन शुरू किया. बटालियन 8 के सब इंस्पेक्टर रणसिंह तीन टुकड़िय़ों के साथ सर्च ऑपरेशन में जुटे. कुत्तों के भौंकने से आतंकी सावधान हो गए और पहाड़ी पर जा चढ़े. रणसिंह भी साथियों के साथ चोटी पर चढ़ाई करने लगे. बीच में एक खुला मैदान से आया. यहां रणसिंह सबसे पहले पहुंचे और बाकी साथी पीछे छूट गए. इसी दौरान घात लगाए बैठे 5-6 आतंकियों ने उन्हें घेर लिया लेकिन रणसिंह ने मौत को सामने देखकर भी हिम्मत नहीं हारी. उन्होंने आतंकियों पर फायरिंग शुरू कर दी. उनकी फायरिंग से आतंकियों का सरगना ढेर हो गया लेकिन बाद में बाकी आतंकियों ने चारों और से उन पर फायरिंग की. इसमें रणसिंह बुरी तरह घायल हो गए. इसके बाद अन्य बीएसएफ साथियों को आता देख आतंकी मौके से भाग गए.

हर सैनिक को प्रेरणा देती है इनकी कहानी
रणसिंह को गंभीर हालत में श्रीनगर के बेस 92 हॉस्पिटल पहुंचाया गया. जहां उनके शरीर मे लगी 5 गोलियां निकाली गई और कई ऑपरेशंस चले. 3 माह उपचार के बाद वे स्वस्थ हुए. मेडिकल चेकअप में सफल नहीं होने पर 1994 में रणसिंह ने बीएसएफ से सेवानिवृत्ति ले ली. 1995 में चिड़ावा पंचायत समिति में बतौर प्रसार अधिकारी ज्वॉइन किया. रणसिंह को उनकी बहादुरी के लिए बीएसएफ महानिदेशक ने भी सम्मानित किया. एक बहादुर अधिकारी की ये गाथा हर सैनिक को प्रेरणा देती है.

रणसिंह जैसे मानों कितने ही झुंझुनूं जिले के जवान बीएसएफ समेत अन्य सेवाओं में रहते हुए देश के लिए न केवल जान दे दी बल्कि दुश्मनों के दांत भी खट्टे कर दिए.