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जोधपुर का रेगिस्तान बना अरब के खजूरों का खजाना, हर साल सैंकड़ो टन का उत्पादन

कृषि विभाग की बागवानी मिशन योजना के तहत यहां पहले खजूर के साढ़े पांच सौ पौधे दो हेक्टेयर में लगाए गए थे. यहां ईराक की बरही किस्म के खजूर और मोरक्को की मेडजुल किस्म खजूर के पौधे लगाये गए थे. 

जोधपुर का रेगिस्तान बना अरब के खजूरों का खजाना, हर साल सैंकड़ो टन का उत्पादन
आम तौर पर चार साल के बाद खजूर के पौधौं से उत्पादन शुरु होता है.

भूपेश आचार्य/बाड़मेर: एक जमाने में बाजरे और ग्वार की जमीं कही जाने वाली थार इन दिनों खजूर का खजाना बन गई है. अपने आप मे इजराइली पद्धति को सार्थक करती यह पैदावार ना केवल यहां के खेतिहारों के लिए बल्कि यहां के व्यापारियों के लिए खास बन गई है. नवाचारों का हिस्सा बन चुकी खजूर की खेती रमजान के महीने में आमदनी का अच्छा आधार बन रही है.

खेती का जिक्र हो तो सभी मानेंगे कि बाड़मेर के रेतीले रेगिस्तान में खजूर की खेती होना नामुमकिन है. लेकिन ऐसा असम्भव काम भी सम्भव कर दिखाया बाड़मेर के चोह्टन इलाके के आलमसर गांव ने. बाड़मेर सेंट्रल का-ऑपरेटिव बैंक में व्यवस्थापक पद पर कार्यरत सादुलाराम चौधरी और उनके चिकित्सक पुत्र डॉ सुरेन्द्र चौधरी ने अपने खेत में बाजरा ग्वार या अन्य बाड़मेर की रेतीली धरती पर पैदा होने वाली फसल नहीं बल्कि खजूर की खेती करनी शुरू कर दी है. शुरुआती परेशानियों और असफलताओं को सहन करने के बाद इन्होने अपनी मेहनत के बल पर आज खजूर के सैकड़ो पौधे अपने खेत में विकसित कर दिए हैं. 

दरअसल खजूर एक ताड़ प्रजाति का वृक्ष है जिसका बाड़मेर जैसे इलाके में उम्मीद करना असम्भव सा है. खजूर की कृषि बड़े पैमाने पर इसके खाद्यफल के लिए की जाती है. चूंकि इसकी खेती बहुत पहले से हो रही है इसलिए इसका सटीक मूल स्थान तलाशना लगभग असंभव है, लेकिन जलवायु के अनुसार इसकी अनुकूलता को देखते हुए कहा जा सकता है कि इसकी खेती कम से कम बाड़मेर जैसे क्षेत्र में नहीं की जा सकती. 

कृषि विभाग की बागवानी मिशन योजना के तहत यहां पहले खजूर के साढ़े पांच सौ पौधे दो हेक्टेयर में लगाए गए थे. यहां ईराक की बरही किस्म के खजूर और मोरक्को की मेडजुल किस्म खजूर के पौधे लगाये गए थे. इन पौधौं के रोपण के बाद में इन पौधो ने खजूर की फसल देना शुरु कर दिया है. 

जबकि आम तौर पर चार साल के बाद खजूर के पौधौं से उत्पादन शुरु होता है. प्रगतिशील कृषक सादुलाराम के अनुसार बूंद-बूंद सिंचाई पद्धति से उन्होंने इस खेत को तैयार किया है. सभी पौधों को रोजाना 20 लीटर पानी की ही आवश्यकता होती है. कृषि फ़ार्म के संचालक डॉ सुरेन्द्र चौधरी के अनुसार इस बार की बम्पर फसल के बाद अपने फैसले पर खुश हैं. 

अरब के रेगिस्तान की मिठास अब पश्चिमी राजस्थान में भी घुलने लगी है. अरब देशों व रेगिस्तान की जलवायु समान होने से टिश्यू कल्चर पद्धति से तैयार खजूर की मिठास राजस्थान के बाड़मेर, जोधपुर, गंगानगर, नागौर के साथ अन्य जिलों में भी फैलने लगी है. बाड़मेर जिले के कई इलाकों में लगाए गए खजूर के उद्यान में टिश्यू कल्चर के पौधे अब उत्पादन देने लगे है. रमजान के महीने में खजूर की पैदावार पककर तैयार होने से रोजेदारों को सस्ते दामों पर खजूर उपलब्ध हो रही है, वहीं टेण्डर प्रक्रिया होने के बाद बाड़मेर से हजारों टन खजूर प्रदेश के अन्य हिस्सों में भी अपनी मिठास बिखेरेगी. 

जानकारों की माने तो इस साल मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियों के बाद भी सगरा भोजका के सरकारी फार्म हाउस में 220 टन खजूर का उत्पादन होने की उम्मीद है. उनके अनुसार यहां करीब चार किस्म की खजूर का उत्पादन वर्तमान में हो रहा है, जिसकी बाजार में मांग बहुत अधिक होने से तुड़ाई का ठेका लेने वाला ठेकेदार बड़ा मुनाफा कमा रहा है.

अरब का खजूर इजरायल पद्धति से अब थार के रेगिस्तान में भी आसानी से मुहैया हो रही है. पश्चिमी राजस्थन की जलवायु खजूर की खेती के लिए उपयुक्त होने से उत्तक संवर्धित तकनीक से स्थानीय जलवायु की परिस्थितियों में खजूर की खेती फल-फूल रही है. राजस्थान की जलवायु खजूर के लिए उपयुक्त होने से अब किसानों को खजूर के उद्यान लगाने के लिए किसानों को प्रोत्साहित किया जा रहा है. कई किसानों ने बाड़मेर के खजूर के उद्यान को देखने के बाद खजूर की खेती को अपनाया है और पैदावार भी लेने लगे है. बाड़मेर वर्ष 2014 से खजूर का उत्पादन कर रहा है. यहां खजूर का उत्पादन बाजार में बिक्री के लिए भी जा रहा है.