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Jodhpur News :राजस्थान हाईकोर्ट ने गरीब कैदियों के अधिकारों को मजबूती देते हुए पैरोल व्यवस्था पर एक महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसला सुनाया है. राजस्थान हाईकोर्ट जोधपुर मुख्यपीठ ने जेल से भेजी गई, एक कैदी की चिट्ठी को रिट याचिका मानते हुए स्पष्ट किया कि गरीबी कोई अपराध नहीं है और पैरोल किसी की आर्थिक हैसियत पर निर्भर नहीं हो सकती.
कोर्ट ने पैरोल पर रिहाई के दौरान गरीब कैदियों से भारी-भरकम जमानती मांगने के अधिकारियों के यांत्रिक और असंवेदनशील रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई. जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस फरजंद अली की डिवीजन बेंच ने अपने रिपोर्टेबल जजमेंट में भविष्य के लिए पैरोल प्रक्रिया को मानवीय बनाने हेतु नई गाइडलाइन जारी की.
कोर्ट ने निर्देश दिया कि अब पैरोल के मामलों में बॉन्ड और जमानत की शर्त तय करते समय कैदी की सामाजिक और आर्थिक स्थिति को अनिवार्य रूप से ध्यान में रखा जाए. यह मामला सेंट्रल जेल, जोधपुर में आजीवन कारावास की सजा भुगत रहे पाली जिले के निवासी खरताराम से संबंधित है.
क्या था मामला ?
खरताराम हत्या के एक मामले में वर्ष 2014 से जेल में बंद है. 29 सितंबर 2025 को जिला पैरोल कमेटी ने उसे चौथी बार 40 दिन की नियमित पैरोल देने का आदेश जारी किया, लेकिन साथ ही 25-25 हजार रुपए के दो जमानती पेश करने की शर्त लगा दी. अत्यंत गरीब और साधनहीन होने के कारण खरताराम इस शर्त को पूरा नहीं कर सका. वकील करने के लिए भी उसके पास पैसे नहीं थे. मजबूर होकर उसने जेल से ही एक पोस्टकार्ड के माध्यम से हाईकोर्ट को अपनी व्यथा बताई. हाईकोर्ट ने इस चिट्ठी को ही रिट याचिका मानते हुए मामले की सुनवाई की.
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि यह चौथा अवसर है, जब खरताराम को केवल जमानती न दे पाने की वजह से हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा है. इससे पहले 2019, 2020 और 2022 में भी उसे पैरोल स्वीकृत हुई थी, लेकिन हर बार जमानती की शर्त लगाई गई. उन तीनों मौकों पर हाईकोर्ट ने हस्तक्षेप कर शर्त हटाई और उसे निजी मुचलके पर रिहा करने के आदेश दिए थे. इसके बावजूद अधिकारियों द्वारा चौथी बार फिर वही शर्त दोहराई गई, जिसे कोर्ट ने गंभीर लापरवाही माना.
डिवीजन बेंच ने टिप्पणी की कि यह एक परेशान करने वाला पैटर्न है, जो सिस्टम की संस्थागत उदासीनता को दर्शाता है. कोर्ट ने कहा कि यदि कोई कैदी गरीब है और जमानती पेश नहीं कर सकता, तो उससे जमानती मांगना व्यावहारिक रूप से उसे पैरोल से वंचित करने जैसा है. पैरोल एक सुधारात्मक अधिकार है, न कि केवल पैसे वालों के लिए आरक्षित सुविधा.
हाईकोर्ट ने जिला पैरोल कमेटी के आदेश को निरस्त करते हुए खरताराम को 50 हजार रुपए के निजी मुचलके पर पैरोल पर रिहा करने का निर्देश दिया. साथ ही, पूरे प्रदेश में गरीब कैदियों के लिए पैरोल प्रक्रिया को न्यायसंगत बनाने हेतु 6 सूत्रीय नई गाइडलाइन लागू करने के आदेश भी जारी किए.
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