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Rajasthan Minor Daughter Rape Case: राजस्थान हाईकोर्ट ने नाबालिग बेटी से दुष्कर्म के जघन्य अपराध में दोषी पिता की ओर से दायर आपराधिक अपील को खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई आजीवन कारावास की सजा को पूरी तरह बरकरार रखा है. हाईकोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि जब अपराध करने वाला स्वयं पिता हो, जो बच्चे का प्राकृतिक संरक्षक माना जाता है, तब यह अपराध केवल कानून का उल्लंघन नहीं बल्कि पारिवारिक विश्वास और सामाजिक मूल्यों का घोर पतन है.
न्यायाधीश विनीत कुमार माथुर एवं न्यायाधीश चंद्रशेखर शर्मा की डिवीजन बेंच ने अपील को खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया. मामला डूंगरपुर जिले के वर्दा थाना क्षेत्र से जुड़ा है, जहां वर्ष 2022 में दर्ज एफआईआर के अनुसार अभियुक्त ने अपनी नाबालिग बेटी के साथ कई बार दुष्कर्म किया. घटना के समय पीड़िता की मां रक्षाबंधन के अवसर पर अपने मायके गई हुई थी. मां के लौटने पर पीड़िता ने रोते हुए पूरी घटना बताई, जिसके बाद पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई गई.
ट्रायल कोर्ट ने मामले की सुनवाई के बाद अभियुक्त को भारतीय दंड संहिता की धारा 376(2), 376एबी तथा पोक्सो अधिनियम की धारा 6 के तहत दोषी मानते हुए आजीवन कारावास एवं जुर्माने की सजा सुनाई थी. इसके खिलाफ अभियुक्त ने हाईकोर्ट में अपील दायर कर साक्ष्यों पर सवाल उठाए और डीएनए व एफएसएल रिपोर्ट को अपने पक्ष में बताया. हाईकोर्ट ने सभी दलीलों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि नाबालिग पीड़िता की गवाही पूरी तरह विश्वसनीय, सुसंगत और स्वाभाविक है.
अदालत ने माना कि इतनी कम उम्र में किसी बच्ची का अपने ही पिता के खिलाफ झूठा बयान देना असंभव प्रतीत होता है. न्यायालय ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में केवल डीएनए रिपोर्ट नकारात्मक होना अभियोजन को कमजोर नहीं करता, जब अन्य मजबूत साक्ष्य और परिस्थितियां आरोपी के खिलाफ स्पष्ट हों. कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पोक्सो अधिनियम के तहत नाबालिग के मामले में सहमति का कोई सवाल ही नहीं उठता.
पीड़िता द्वारा घटना बताने में हुई देरी को भी अदालत ने सामाजिक दबाव, भय और पारिवारिक परिस्थितियों के कारण स्वाभाविक माना. हाईकोर्ट ने कहा कि बच्चों के विरुद्ध यौन अपराध समाज के लिए सबसे घातक हैं और ऐसे अपराधों पर किसी प्रकार की नरमी न्याय व्यवस्था के उद्देश्य को ही कमजोर करेगी.
साथ ही कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि पीड़िता को राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण की मुआवजा योजना के तहत 7 लाख रुपये का मुआवजा दिया जाए. हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के निर्णय को पूरी तरह सही ठहराते हुए अभियुक्त की अपील खारिज कर दी .
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