Barmer News: बाड़मेर में कुर्सी की जंग! एक पद पर दो अधिकारियों के दावे से मचा हड़कंप

Rajasthan News: राजस्थान के बाड़मेर अल्पसंख्यक मामलात विभाग में कार्यक्रम अधिकारी की कुर्सी पर हजारीराम लीलड़ और अमीन खान दोनों के दावे से विवाद गहराया. दोहरी हाजिरी रजिस्टर और स्पष्ट आदेश की कमी से कर्मचारी असमंजस में, कामकाज ठप और लाभार्थी परेशान हैं.

Barmer News: बाड़मेर में कुर्सी की जंग! एक पद पर दो अधिकारियों के दावे से मचा हड़कंप
Image Credit: barmer newsSource: ज़ी न्यूज़ डेस्क

Barmer News: राजस्थान के बाड़मेर में जिला अल्पसंख्यक मामलात विभाग में शिक्षा विभाग से आए कार्मिक ने कुर्सी पर दावा करते हुए खुद को कार्यक्रम अधिकारी बताया तो पहले से पदस्थापित कार्यक्रम अधिकारी की गैर मौजूदगी में कार्यभार ग्रहण करने का प्रयास किया. यह नजारा बाड़मेर में देखने को मिला. जिसकी अब चारों तरफ चर्चा हो रही है.

दो दावों से बिगड़ी व्यवस्था
वहीं कार्यक्रम अधिकारी के एक ही पद पर दो अधिकारियों के दावे ने पूरे कार्यालय की व्यवस्था बिगाड़ दी है. जानकारी के मुताबिक, विभाग में हजारीराम लीलड़ और अमीन खान दोनों खुद को कार्यभारधारी बता रहे हैं. स्थिति यह है कि उपस्थिति के दो अलग-अलग रजिस्टर चल रहे हैं, जिससे कर्मचारियों में आदेश अनुपालन को लेकर भारी असमंजस है. मौके के हालात इस दोहरे दावे और अलग रजिस्टरों की पुष्टि करते है. यहां पिछले एक महीने से कुर्सी को लेकर खींचतान जारी है. इस दौरान कार्यालयीन कामकाज प्रभावित हुआ है और लाभार्थियों के फाइल-निस्तारण में देरी की शिकायतें सामने आई हैं. आरोप है कि एक दिन सुबह 11 बजे तक कार्यालय पर ताला रहा और नवपदस्थापित अधिकारी हजारीराम लीलड़ को कमरे में प्रवेश नहीं दिया गया, जिससे तनावपूर्ण स्थिति बनी.

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क्या बोले प्रशासनिक विशेषज्ञ?
प्रशासनिक विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में स्पष्ट पदस्थापन/कार्यभार आदेश और हैंडओवर-टेकओवर मेमो सार्वजनिक करना आवश्यक होता है, ताकि द्वंद्व की स्थिति समाप्त हो सके. विभागीय मुख्यालय को चाहिए कि वह तत्काल दोनों पक्षों के दस्तावेजों की स्क्रूटनी कर एकल अधिकृत अधिकारी की घोषणा करे और कार्यालय में एकीकृत हाजिरी रजिस्टर लागू करे. जब तक कोई स्पष्ट लिखित आदेश न आए, कर्मचारियों के लिए समानांतर आदेशों का पालन करना कठिन बना रहेगा और योजनाओं का क्रियान्वयन प्रभावित होता रहेगा.

लाभार्थियों का सीधा नुकसान
फिलहाल, जिला प्रशासन और विभागीय उच्चाधिकारियों की भूमिका अहम है. अगर शीघ्र निर्णय नहीं लिया गया तो विभाग की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगेगा और लाभार्थियों को सीधा नुकसान होगा.

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