Rajasthan News: मारवाड़ के तिंवरी में हाली अमावस्या पर 200 साल पुरानी परंपरा के तहत घड़ों से मानसून का आकलन किया गया. ज्येष्ठ में कमजोर बारिश, आषाढ़ अंत में मानसून की शुरुआत और श्रावण-भाद्रपद में अच्छी बारिश के संकेत मिले, जिससे किसानों में उम्मीद जगी.
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Jodhpur News: मारवाड़ में मानसून का इंतजार सिर्फ मौसम विभाग के पूर्वानुमान तक सीमित नहीं है. आज तिंवरी क्षेत्र में हाली अमावस्या के मौके पर करीब 200 साल पुरानी परंपरा एक बार फिर जीवंत नजर आई, जब घड़ों के जरिए मानसून का आकलन किया गया. सुबह से ही कुम्हार के घर ग्रामीणों की भीड़ जुटनी शुरू हो गई थी. चाक पर घूमती मिट्टी से जैसे ही एक-एक कर पांच छोटे घड़े आकार लेने लगे, माहौल में उत्सुकता साफ महसूस होने लगी. हर नजर इन घड़ों पर टिकी थी, मानो यही आने वाले मौसम का फैसला सुनाने वाले हों. निर्धारित विधि के अनुसार जमीन पर आयताकार आसन बनाकर चार घड़े चारों कोनों में और एक बीच में रखा गया.
कोनों के घड़े ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण और भाद्रपद महीनों के प्रतीक रहे, जबकि बीच का घड़ा आकाश का. पूजा-अर्चना के बाद इंद्र देव का स्मरण करते हुए सभी घड़ों में धान और पानी भरा गया और फिर शुरू हुआ इंतजार-उस क्षण का, जब घड़े अपना संकेत देंगे. ग्रामीणों की मौजूदगी में घड़ों पर लगातार नजर रखी गई. इस परंपरा के अनुसार एक मिनट को तीन दिन के बराबर माना जाता है और घड़े के फूटने का समय ही बारिश का अनुमान तय करता है. आज के इस लाइव प्रयोग में ज्येष्ठ माह का घड़ा करीब 9 मिनट बाद फूटा, जिसे 27 दिनों के हिसाब से ज्येष्ठ में कमजोर बारिश का संकेत माना गया.
वहीं आषाढ़ का घड़ा करीब साढ़े चार मिनट में फूटा, जिससे 27 जून से 5 जुलाई के बीच मानसून की शुरुआत का संकेत मिला. श्रावण और भाद्रपद के घड़ों से भी अच्छे संकेत मिलने पर किसानों के चेहरों पर संतोष साफ झलक उठा. किसान प्रेमसुख परिहार ने बताया, “हाली अमावस्या के दिन हम सभी किसान कुम्हार के घर एकत्र होते हैं. चाक पर पांच घड़े बनाए जाते हैं और उन्हें विधि-विधान से स्थापित कर पूजा की जाती है. हर घड़ा एक महीने का संकेत देता है और उसके फूटने के समय से हम बारिश का अनुमान लगाते हैं. यह परंपरा हमारे बुजुर्गों से चली आ रही है और आज भी हम इसे पूरी आस्था के साथ निभाते हैं.”
वहीं किसान देवाराम परिहार ने कहा, “इस विधि में एक मिनट को तीन दिन के बराबर माना जाता है. जैसे इस बार ज्येष्ठ का घड़ा 9 मिनट में फूटा, तो इसका मतलब उस महीने में बारिश कमजोर रहेगी. हमारे अनुभव में कई बार यह अनुमान सही साबित हुआ है, इसलिए हम इसे आज भी मानते हैं.” पूरी प्रक्रिया आस्था और परंपरा के साथ आगे बढ़ी. शुरुआत पंचामृत से हुई, जिसे पहले धरती को अर्पित किया गया और फिर कुम्हार के चाक, भगवान शंकर, गणेश और आकाश की पूजा की गई. कुम्हार को किसान का प्रतीक मानते हुए उसे घड़ों का पानी पांच बार पिलाया गया.
अच्छी बारिश की कामना के लिए इंद्र देव को विशेष भोग भी लगाया गया. एक दिन पहले भिगोए गए बाजरे से सुबह खींच (खिचड़ी) बनाई गई और गुड़-आटे से गलवानी तैयार कर प्रसाद के रूप में बांटी गई. हालांकि इस परंपरा का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है, लेकिन मौके पर मौजूद बुजुर्गों और किसानों का कहना है कि कई बार यह आकलन वास्तविक मानसून के काफी करीब साबित हुआ है. यही वजह है कि आज भी तिंवरी में यह परंपरा न केवल जीवित है, बल्कि हर साल पूरे विश्वास और उत्साह के साथ निभाई जाती है.
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