Pali Rakshabandhan: आज हम आपको राजस्थान के उस गांव के बारे में बताने जा रहे हैं, जहां रक्षा बंधन पर कोई खुशियां नहीं मनाई जाती हैं बल्कि यहां मातम मनाया जाता है.
&w=896&h=504&format=webp&quality=medium)
Pali Rakshabandhan: रक्षाबंधन पर्व जहां हर समाज, जाति, क्षेत्र में मनाया जाता है. वहीं, पालीवाल ब्राह्मण इस पर्व को नहीं मनाते हैं. इसके पीछे पालीवाल ब्राह्मणों के इतिहास की दर्दनाक घटना है. पालीवाल ब्राह्मण समाज के लोग बताते हैं कि हमारे समाज के लोग यह पर्व विक्रम संवत 1348 से नहीं मना रहे हैं. यह आज भी कायम है. इस दिन इस समाज के लोग श्रावणी रक्षाबंधन की बजाय इस दिन को बलिदान दिवस के रूप मे मनाते हुए तर्पण करते है.
बताया जाता है कि एक समय पाली नगर में लगभग सवा लाख पालीवाल ब्राह्मण परिवार रहते थे. वे सभी बहुत समृद्ध और सुखी थे. उनकी संपन्नता के कारण, उन पर अक्सर पहाड़ी लुटेरों द्वारा हमले होते थे. इन हमलों से परेशान होकर, पालीवाल ब्राह्मणों के मुखिया, जसोधर, ने राव सीहा से मदद मांगी. उन्होंने राव सीहा को एक लाख रुपये का नजराना भेंट कर अपनी रक्षा की प्रार्थना की. राव सीहा ने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली और समय-समय पर लुटेरों से लड़कर उनकी रक्षा की.
कुछ समय बाद, मुगलों ने पाली पर हमला कर दिया. राव सीहा ने आक्रमणकारियों का बहादुरी से सामना किया और युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए. उनके बाद, उनके बड़े बेटे आस्थान ने गद्दी संभाली और पालीवाल ब्राह्मणों की रक्षा का भार उठाया.
विक्रम संवत 1347 में, जलालुद्दीन खिलजी, जो फिरोजशाह द्वितीय के नाम से दिल्ली का शासक बना, ने अगले साल पाली पर हमला कर दिया. युद्ध लंबे समय तक चला, लेकिन जीत नहीं मिलने पर उसने एक क्रूर चाल चली. उसने गायें काटकर पाली के एकमात्र पानी के स्रोत, लाखोटिया तालाब, में डलवा दी. इससे तालाब का पानी दूषित हो गया और पानी की भारी समस्या उत्पन्न हो गई. इसी युद्ध में आस्थान भी वीरगति को प्राप्त हुए.
इसके बाद, विक्रम संवत 1348, श्रावण पूर्णिमा के दिन, जो रक्षा बंधन का पर्व था, पालीवाल ब्राह्मणों ने अपने धर्म और स्वाभिमान की रक्षा के लिए युद्ध में भाग लिया. उन्होंने केसरिया धारण किया और मैदान में उतर गए. इस युद्ध में हजारों पालीवाल ब्राह्मण मारे गए. ऐसा कहा जाता है कि शहीदों के शरीरों से 9 मन जनेऊ उतारी गई और जो महिलाएं सती हुईं, उनके चूड़ियों का वजन 84 मन था.
इस भीषण घटना के बाद, बचे हुए पालीवाल ब्राह्मणों ने पाली का त्याग करते हुए जैसलमेर रियासत में शरण ली. हजारों ब्राह्मणों के बलिदान और माताओं के वैधव्य से दुखी होकर, उन्होंने एकता और धर्म रक्षा का परिचय देते हुए पाली नगर को हमेशा के लिए छोड़ दिया.
इसी दुखद घटना की याद में, पालीवाल ब्राह्मण आज भी रक्षा बंधन का पर्व नहीं मनाते हैं. यह त्योहार उनके लिए बलिदान और स्वाभिमान के एक दर्दनाक अध्याय का प्रतीक बन गया है और इस दिन अपने पूर्वजों के बलिदान को बलिदान दिवस के रूप मे मनाते हुए तालाब में तर्पण करते है.
राजस्थान की ताज़ा ख़बरों के लिए ज़ी न्यूज़ से जुड़े रहें! यहां पढ़ें Rajasthan News और पाएं Pali News हर पल की जानकारी. राजस्थान की हर खबर सबसे पहले आपके पास, क्योंकि हम रखते हैं आपको हर पल के लिए तैयार. जुड़े रहें हमारे साथ और बने रहें अपडेटेड!