बस एक रात में कैसे श्रापित हो गए जैसलमेर में कुलधरा के 84 गांव, पढ़ें रोमांचक कहानी

जैसलमेर की आर्थिक समृद्धि की चाभी पालीवालों के हाथ में थी, जिसे पालीवालों ने कई बार साबित भी किया था. 

बस एक रात में कैसे श्रापित हो गए जैसलमेर में कुलधरा के 84 गांव, पढ़ें रोमांचक कहानी
पालीवाल ब्राह्मणों ने समय-समय पर जैसलमेर रियासत की शान में बढ़ोत्तरी की.

मनीष रामदेव, जैसलमेर: राजस्थान की रंग-बिरंगी संस्कृति अपने अलग-अलग रंगों के कारण विश्व भर में अपनी विशेष पहचान रखती है, शौर्य, स्वाभिमान और लोक संस्कृति के रंगों से सरोबार इस राजस्थान का कण-कण अपनी अलग कहानी लिए हुए है. इसी कड़ी से जुड़ा है स्वर्णनगरी जैसलमेर का कुलधरा.

जी हां, यह वही गांव है, जिसे जिसको भूतों की काल्पनिक घटनाओं से जोड़ कर हॉन्टेड विलेज का नाम दिया गया है. आज हम इसी कुलधरा गांव के बारे में जानेंगे कि क्या था यहां का वास्तविक इतिहास, जिसकी वजह से कुलधरा गांव जैसलमेर में विशेष महत्व रखता था और क्या कारण रहे कि एक ही रात में कुलधरा जैसे 84 गांव खाली हो गये?

यह कोई काल्पनिक बात नहीं हैं. घटना है जैसलमेर के रियासत काल की. शौर्य और स्वाभिमान की प्रतीक जैसलमेर की एक ऐतिहासिक जाति पालीवाल जिन्होंने अपने आत्मस्वाभिमान की खातिर एक ही रात में जिले के 84 गांव छोड़ दिए थे.

कौन थे पालीवाल
मूलतः पाली जिले से संबधित पालीवाल जाति पाली से अपने निर्वासन के बाद जब इधर उधर भटक रही थी, तब जैसलमेर रियासत के तत्कालीन महारावल ने उनकी कर्मशीलता एवं उनके हुनर को पहचानते हुए उनसे जैसलमेर में बसने की गुजारिश की ताकि इन कर्मशील लोगों के हुनर को काम में लेते हुए यहां की बंजर मरूभूमि में भी धान की पैदावार को बढ़ावा दिलाया जा सके. तत्कालीन महारावल ने उन्हें यहां बसते समय यह भी वचन दिया था कि आप लोग जब तक चाहें जैसलमेर में रह सकते हैं. राज्य आपके बसने का पूरा प्रबंध भी करेगा और आपसे इस राज्य में किसी भी प्रकार का कोई कर या लगान नहीं ली जाएगी. 

इससे यह अंदाजा भी लगाया जा सकता है कि पालीवाल जाति किस स्तर की कर्मशील और प्रयोगधर्मी रही होगी. पालीवाल अपनी व्यापार कला एवं कुशाग्र बुद्धि के लिए जाने जाते थे, जिन्होंने अपनी प्रतिभा के बल पर अपना भाग्य बनाया था. थार के रेगिस्तान में गेहूं की तरह की एक गहन पानी की फसल बढाने की कला में वे लोग माहिर थे. वे जिप्सम और चट्टानी भूमि पर फसलों के लिए पानी बनाये रखने तथा सतह के नीचे चलने वाले पानी की पहचान कर उसे उपयोग में लेने वाले लोग थे. उस काल में जैसलमेर की आर्थिक समृद्धि की चाभी पालीवालों के हाथ में थी, जिसे पालीवालों ने कई बार साबित भी किया था. 

आर्थिक समृद्धि के स्त्रोत थे पालीवाल
एक घटना के अनुसार, महारावल गजसिंह के पिता मूलराज सिंह ने उदयपुर महाराजा को गजसिंह के विवाह के लिए नारियल भेजा, जिसे उदयपुर महारावल द्वारा स्वीकार कर अपनी पुत्री राजकुमारी रूपकंपर का विवाह गजसिंह के साथ करने का तय किया. उनकी दो अन्य कन्याओं का विवाह भी किशनगढ़ और बीकानेर के राजकुमारों के साथ होना तय था. इसलिये विवाह का नारियल आते ही उन्होंने इसे तुरन्त विवाह का महूर्त निकाल बारात लाने का जैसलमेर महारावल को संदेश भेजा. महूर्त से दो दिन पूर्व ही जैसलमेर महारावल को यह संदेश मिला और वे तुरन्त गजसिंह अपने विशिष्ट रिश्ते नातेदारों के साथ उदयपुर के लिये रवाना हो गये. वहां हाथी, घोडा, रथपालकी और स्वर्णपालकियों के साथ किशनगढ़ और बीकानेर की वैभवशाली बारातों के आगे जैसलमेर की बारात फीकी नजर आ रही थी. इस पर उदयपुर दरबार के एक दरबारी ने जैसलमेर महारावल पर फिकरा कसा कि क्या सोच कर जैसलमेर के राजा मेवाड़ में शादी संबंध करने आ गये जबकि उनकी तो मेवाड़ रियासत से तो कोई बराबरी नहीं है. 

यह बात महारावल मूलराजसिंह को नागवार गुजरी और उन्होंने एक संदेश लिख कर उदयपुर के सेवक को दिया कि वो संदेश में लिखे अनुसार जैसलमेर के कुलधरा गांव जाकर जसरूप जी पालीवाल से मिल कर एक लाख स्वर्णमुद्राएं ले आएं. सेवक मन ही मन हंसता जैसलमेर की ओर आया और कुलधरा पहुंच कर घर के बाहर पशुओं के लिए चारा काट रहे मैले-कुचेले कपड़े पहने जसरूप जी से मिला और महारावल का संदेश उन्हें दिया. संदेशवाहक उस पालीवाल की हालत देख कर मन ही मन यह सोच रहा था कि इस गरीब के पास कहां एक लाख मुद्राएं होंगी? जैसलमेर महारावल ने हमें बेवकूफ बनाया लगता है लेकिन संदेश पढते ही जसरूपजी ने कहा कि महारावल साहब से शायद गलती हो गई है. उन्होंने यह नहीं लिखा कि कौन-सी एक लाख स्वर्णमुद्राएं मैं तुम्हें दूं क्योंकि उस जमाने में इरानी, तुर्रानी बादशाही और मुगली छाप की स्वर्णमुद्राएं प्रचलन में थी. 

जसरूप ने संदेशवाहक को अपने तहखाने में ले जाकर खड़ा कर दिया और कहा कि जो भी तुम्हें अच्छी लगे, वह एक लाख स्वर्णमुद्राएं गिन ले. संदेशवाहक ने उदयपुर जाकर वहां बैठे उदयपुर सहित बीकानेर और किशनगढ़ राजघरानों को यह बताया कि जैसलमेर के एक साधारण से किसान के घर में अगर इतनी अकूत संपत्ति है तो पूरे राज्य की संपन्नता का आंकलन करना सूरज को दीया दिखाना होगा. इस तरह पालीवाल ब्राह्मणों ने समय समय पर न केवल जैसलमेर रियासत की शान में बढ़ोत्तरी की है बल्कि महारावल की प्रतिष्ठा पर भी आंच नहीं आने दी.

फिर ऐसा क्या हुआ
अब आप सोच रहे होंगे कि फिर ऐसा क्या हुआ कि एक ही रात में पालवालों को अपनी बसी बसाई दुनिया छोड़नी पड़ी? तो वजह था दीवान सालिमसिंह मोहता, जो कि महारावल मूलराजसिंह के राज्य काल का सबसे प्रभावशाली व्यक्तियों में एक था. क्रूर शब्द उस व्यक्ति के लिए छोटा पडता था. कहा जाता था कि इस मरूभूमि में न अकाल का कोई इलाज था और न सालम का. एक अय्याश एवं रंगीन मिजाज के इस दीवान की देन ही कहे जा सकते हैं, आज का कुलधरा सहित अन्य 83 उजड़े गांव, जिन्हें पर्यटक कौतुहल से निहारते हैं. 

यह थी वजह पालीवालों के गांव छोड़ने की
दरअसल, खाभा गांव के पालीवाल हरजल की नवयौवना बेटी मिरगी, जिसके रूप और सौन्दर्य पर कामाशक्त हो, इस क्रूर दीवान ने उसे अपना बनाने के लिए कई लालच और प्रलोभन दिए. पालीवालों द्वारा दृढ़ रहते हुए अपने कुल की परम्पराओं का निर्वहन करने और संस्कृति विरूद्ध संबंध नहीं किया. इसी जिद के चलते इस दीवान द्वारा समस्त पालीवालों पर बेजा कर लगा दिये गये ताकि वे इनसे बचने के लिए उस नवयौवना का संबंध उसके साथ कर दें. जबकि उस काल में महारावलों द्वारा पालीवालों को यह वचन दिया गया था कि ब्राहम्ण और कर्मशील होने के कारण उनपर जैसलमेर रियासत में कभी भी किसी प्रकार का कर नहीं लगाया गया.

क्या रहा होगा उस घटना का रोमांच 
जब सम्वत् 1880 की श्रावणी पूनम के दिन 84 गांव के पालीवालों ने काठोड़ी के ऐतिहासिक मंदिर में एकत्र होकर एक ही लोटे से नमक मिला पानी पीकर यह संकल्प लिया कि वे अपनी जन्मभूमि-कर्मभूमि भले ही छोड़ दें लेकिन सालम के अत्याचारों के आगे शीश नहीं झुकाएंगे मतलब न तो वे सालिम सिंह के लगाए टैक्स को चुकायेंगे न ही उसकी हवस पूर्ति के लिए अपनी बहू-बेटियों को उसके महल में भेजेंगे. इसी संकल्प के साथ उन्होंने हमेशा के लिये जैसलमेर को कह अलविदा दिया.

उजड़े गांव दे रहे सम्पन्नता की गवाही
84 उजड़े गांव आज भी गवाह हैं पालीवालों के संकल्प के, जिसमें उन्होंने अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए अपनी मातृभूमि को सदा के लिये छोड़ कर चल दिये और ऐसे चले कि आज तक वापिस नहीं लौटे. उस दिन न तो कोई हाथ आगे बढ़ा उन्हें रोकने के लिए. न उनके कदम ठिठके अपने घरों को छोड़ते हुए. अपनी मातृभूमि को स्वर्ग बनाने वाले ये कारीगर अपना सब कुछ छोड़ कर अपना स्वाभिमान, अपनी इज्जत और अपना वजूद बचाने को चले गए. 

वे तो चले गये लेकिन इस मरूधरा को शापग्रस्त कर गये. उनके साथ आसमान भी रोया था पर कोई हाथ न उठा जो उन्हें जाने से रोकता. उन्हें कहता तुम इस मरूभूमि को स्वर्ग बनाने वाले कारीगर हो. इस रेगिस्तान को शापमुक्त कर सरशब्ज बनाने वाले तुम न जाओ. तुमने इस भूमि के भविष्य का निर्माण किया है. वे सब एक ही रात में अपना घर-आंगन, खेत-खलिहान और अपनी बसी बसाई दुनिया छोड़ गए. 

Edited by: Sandhya Yadav