सिरोही: चंद्रावती नगरी में दबी है 11वीं शताब्दी के वैभव की कीर्तिगाथा, पढ़ें इतिहास

चंद्रावती नगरी नगरी तीन नदियों बनास, सुकड़ी और सिवरनी नदी के संगम स्थल पर बसी हुई है. 

सिरोही: चंद्रावती नगरी में दबी है 11वीं शताब्दी के वैभव की कीर्तिगाथा, पढ़ें इतिहास
इस चंद्रावती नगरी में 999 मंदिरों का उल्लेख है.

साकेत गोयल, सिरोही: आपने मोहनजोदड़ो, हड़प्पा और सिंधु घाटी सभ्यता के बारे में किताबों में पढ़ा और सुना है. हम यहां बात एक ऐसे शहर की कर रहे हैं, जो की 7वीं से 13वीं शताब्दी के मध्य का है. उसका वैभव और संस्कृति 11 और 12वीं शताब्दी में पूरे विश्व में चरम पर थी. 

यहां की स्थापत्य कला और संस्कृति की विश्व में मिसाल दी जाती थी. हम बात कर रहे हैं सिरोही जिले के आबूरोड के समीप स्थित चंद्रावती नगरी की. यह नगरी तीन नदियों बनास, सुकड़ी और सिवरनी नदी के संगम स्थल पर बसी हुई है. 

चंद्रावती का इतिहास 7वी से 13वी शताब्दी के मध्य का है. इतिहासकारों के अनुसार, विश्व के सबसे धनी शहरों में इस चंद्रावती का नाम शुमार था. भारतीय पुरातत्वविदों ने कितने ही प्राचीन नगरों के दबे अवशेषों को बाहर निकाला है. इसके बावजूद भी अभी तक कई नगर धरती की परतों में सोये हुए है. ऐसे ही नगरों में से एक है परमारों की नगरी चंद्रावती, जिसके कलावशेष अपने विगत वैभव की कीर्तिगाथा को लेकर सिसक रहे हैं. 

वर्तमान में विशेष सरंक्षण के अभाव में यहां के अनेकों वर्ष पुराने कलावशेष और प्राचीन दुर्लभ मूर्तियां को देखने पर लगता है कि मानों ये अपनी अवस्था पर जार-जार रोने पर विवश है. इस नगरी की कुछ मूर्तियों को संग्रहालय में रखा गया है, लेकिन अभी भी कलावशेष यहां खुले आसमान के नीचे स्थान-स्थान पर पड़े हुए हैं. वहीं, इतिहासकारों के अनुसार, यहां अभी भी अनेकों मूर्तियां और कलावशेष दबे हुए होने की उम्मीद है. वहीं, शहरवासियों के अनुसार यह नगरी किसी जमाने में बहुत ही महत्तवपूर्ण रही है. इस नगरी से यहां हजारों वर्ष पुरानी लोगों की संस्कृति देखने को मिलती है.

कब, कैसे हुई चंद्रावती नगरी की स्थापना
चंद्रावती की स्थापना, उत्थान और पतन के स्पष्ट प्रमाण तो अभी तक इतिहास की परतों में छिपे हैं लेकिन प्राप्त साहित्यिक स्रोतो के अनुसार सातवीं से 13 वी सदी के मध्य यह मध्यकालीन नगर संस्कृति एंव व्यापार का प्रमुख केन्द्र थी. यहां कुछ वर्ष पूर्व विश्वविद्यालयो के प्रोफेसर और छात्रों की ओर से किए गए सर्वेक्षण में यहां प्रागेतिहास काल से संबंधित सामग्री भी प्राप्त हुई है, जो इस क्षेत्र को महत्वपूर्ण बनाती है. प्राप्त ऐतिहासिक जानकारी के अनुसार यह चंद्रावती नगरी परमार राजाओं की राजधानी थी एवं पश्चिम भारत के सामरिक और व्यापारिक मार्गों के केंद्र में स्थित होने के कारण मध्यकाल में तुर्की आक्रांताओं का शिकार बनी क्योंकि उनके लिए गुजरात विजय का आकर्षण था. ऐसी इतिहासकारों की मान्यता है कि परमारों के पतन के साथ ही इस नगरी का भी पतन हुआ होगा.

राजस्थान एवं गुजरात की सीमा पर सिराही जिल के आबूरोड रेलवे स्टेशन से करीब 6 किलोमीटर की दूरी पर स्थित इस चंद्रावती नगरी का अपना लम्बा इतिहास और पुरातात्विक महत्व है. किन्तु यहां बिखरे पाषाणी कला वैभव के अवशेष एवं  धरती के आगोश में समाये खण्डहर मानवीय उपेक्षा और शोषण की कहानी कहते हैं. 

ज़ी मीडिया के संवाददाता ने भी सिरोही जिले के आबूरोड के समीप स्थित चंद्रावती  के इतिहास को जानने और समझने की कोशिश की. कई दिनों तक चंद्रावती  नगरी के जंगलों में जाकर जगह जगह बिखरे अवशेषों के अतीत में झांकने की कोशिश की. यहां जगह जगह बिखरे पडे मंदिरों और भवनों के अवशेष मानों रो-रो कर कह रहे हो कि कोई आए उनकी सुने. 

कई बार उजाड़ी गई चंद्रावती नगरी
चंद्रावती के इतिहास को जानने के लिए सबसे पहले हमारी टीम ने शुरूआत यहां बने संग्रहालय से की. यहां संग्रहालय पहुंचकर हमने यहां संजोकर रखे गए अवशेषों को देखा तथा इतिहास को जानने की जानने की कोशिश की. यहां इस संग्रहालय में कई 11वी और 12वी सदी की मूर्तियां रखी गई हैं, जो कि स्थापत्य और शिल्पकला का बेजोड़ उदाहरण है और उस सदी का ज़ीवंत दृश्य सामने लाती हैं. यहां पर हमने कई खंडित मूर्तियां भी हमे देखने को मिली. इतिहासकारों के अनुसार, उस समय यह समृद्ध नगरी कई बार तुर्की आंक्राताओं का शिकार हुई है तथा इस नगरी को उजाड़ने की कोशिश की गई है. 

यहां इस संग्रहालय से चंद्रावती के इतिहास की थोड़ी जानकारी लेकर हम इस नगरी के रहस्य को जानने को आगे बढ़े तो नजदीक एक मंदिर के अवशेष देखने को मिले. यह मंदिर पूरा ज़ीर्णशीर्ण हालत में था. बताया जा रहा है कि यह मंदिर एक शिव मंदिर था लेकिन ध्यान नहीं दिए जाने कारण यह अपने अस्तित्व को खोता जा रहा है. इसके आसपास कई मूर्तियां बिखरी पड़ी हुई थी, जो मानों अपने अस्तित्व को तलाश कर रही हों. 

इतिहासकारों के अनुसार, यहां इस चंद्रावती नगरी में 999 मंदिरों का उल्लेख है, जिसमें शिव, विष्णु और जैन मंदिरों के बारे में इतिहास के पन्नों में जानकारी मिलती है. बताया यह भी जाता है कि जब यहां मंदिरों में एक साथ आरती होती थी, तब आरती के समय मंदिर की घंटियों की आवाज कई किलोमीटर दूर माउंट आबू के गुरू शिखर तक सुनाई देती थी. 

इतिहासकारों का मानना है कि यहां पर इस नगरी की सुरक्षा के लिए पहाड़ों पर सुरक्षा चौकियां भी स्थापित की गई थी, जहां से सैनिक इस नगरी की सुरक्षा किया करते थे. इतिहासकारों के अनुसार, यहां इस नगरी की सुरक्षा के लिए सात सुरक्षा चौकियों के बारे में बताया गया है. आज भी पहाड़ों पर इन सुरक्षा चौकियों के अवशेष मौजूद हैं. इतना ही नहीं, इन पहाड़ों और जंगलों में उस सदी के प्राचीन अवशेष अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं. 
यह आज भी खोज का विषय है कि चंद्रावती का ध्वंस कब हुआ एवं कब इसने अपना वैभव खोया. उपलब्ध साक्ष्यों के अनुसार, चंद्रावती नगर संस्कृति का केंद्र था एवं इसका निर्माण निश्चित मानदंडों के आधार पर हुआ था. इसके नगर नियोजन के प्रमाण यहां की सड़कें, मंदिर, वावड़िया एवं उनकी विशिष्ट स्थिति है.

फिर क्या था करीब 14 से 15 मजूदरों के साथ इस स्थान पर खुदाई की गई तथा एक के बाद एक मंदिर के अवशेष बाहर निकलना शुरू हो गए. करीब चार महीने तक यहां चली खुदाई में एक बावड़ी पर बना शिव मंदिर बाहर निकला. बताया जा रहा है कि करीब जमीन से 3 फीट नीचे यह मंदिर था. इस स्थान पर खुदाई के दौरान शिवलिंग और सूर्य भगवान की मूर्ति के साथ अन्य भगवान की मूर्तियां भी बाहर निकली. 1982 में जिन 15 लोगों ने इस स्थान पर खुदाई की थी, उसमें से एक व्यक्ति से ज़ी मीडिया के संवाददाता साकेत गोयल ने मुलाकात की और इस मंदिर का रहस्य जानने की कोशिश की. आज इस मंदिर में देश भर से श्रद्धालु दर्शन के लिए आते है तथा यह मंदिर सभी की आस्था का केन्द्र बना हुआ है.

आज गुजरात और राजस्थान के इतिहास की विस्मृत कड़ियों को जोड़ने वाली इस चंद्रावती  नगरी के अवशेषों के अस्तित्व को बचाए रखने का संकट है क्योंकि औद्योगिक क्षेत्र के विस्तार एवं औद्योगिक भूखंडों के आवंटन से इस क्षेत्र में फैले पुरातात्विक अध्ययन की सहायक सामग्री, इस क्षेत्र के वैज्ञानिक पुरातात्विक सर्वेक्षण के पूर्व ही नष्ट हो जाएगी. यह हमारा दुर्भाग्य है कि पुरातत्व विभाग के लिए भी इसके लिए कुछ खास नहीं कर रहा है जबकि यह स्थान विभाग द्वारा संरक्षित विरासत केंद्र है. चंद्रावती के बिखरे कला वैभव को विश्व के सामने रखने वाले कर्नल जेम्स टॉड थे. उन्हें अपनी ट्रैवल्स इन वेस्टर्न इंडिया नामक पुस्तक में इस नगर का जो चित्रो के साथ उल्लेख किया, वह पुरातत्वविदों एवं कलामर्मज्ञों को एक जोड़ने वाले थे. 

पिछले 4 से 5 वर्ष पूर्व भी यहां चंद्रावती  नगरी में कुछ स्थानों पर खुदाई की गई थी. यहां पुरातत्व विभाग की देख-रेख में की खुदायी के दौरान कई आश्चर्यजनक बातें सामने आई. इस खुदाई के दौरान यह सामने आया कि इन नगरी के नीचे की बनावट इस तरह से है कि भवनों के निचले सतह जो बनाये गये हैं, वह बिल्कुल ही भूकम्परोधी हैं क्योंकि इसकी बनावट बालू और पत्थरों के साथ बनायी गयी है ताकि कम्पन की स्थिति में भवनों को नुकसान न पहुंचे. इस खुदाई के दौरान यहां करीब 14 सौ साल पुराने भवन मिले हैं. आबूरोड के समीप बसी यह दुनिया आज भले ही खंडहर के रुप में जमीन में दबी हुई है.

खुदाई के दौरान यहां प्राचीन किले की दीवारें, पानी के मटके, मूर्तियां, गेहूं पीसने की चक्की और अनाज के दाने जैसी महत्तवपूर्ण वस्तुएं यहां निकली थी, जिसको पुरातत्व विभाग ने अपने संरक्षण में रखा हुआ है. संभावना जताई जा रही है यदि अभी भी दोबारा यहां खुदाई होती है तो और भी बेशकीमती वस्तुएं यहां से निकलेंगी तथा यह भी संभावना जताई जा रही है कि इस काल में यह नगरी काफी समृद्ध एंव वैभवशाली रही होगी.
खुले आसमान के नीचे कई किलोमीटर में फैली इस चंद्रावती नगरी को विशेष सरंक्षण की आवश्यकता है तथा यहां खुले में पड़ी बेशकीमती मूर्तियों को सुरक्षा की जरूरत है. सोचने पर मजबूर करने बात यह है कि यह पूरी नगरी केवल पुरातात्विक विभाग के केवल कर्मचारी के भरोसे है.