पेड़-पौधे के लिए संजीवनी बनी 'मटका सिंचाई विधि', जानें कैसे करती है काम?

इस तकनीक से पौधे शत-प्रतिशत जीवित तो रहते ही हैं, साथ ही 20 से 30 प्रतिशत तेजी से ग्रोथ करते हैं. 

पेड़-पौधे के लिए संजीवनी बनी 'मटका सिंचाई विधि', जानें कैसे करती है काम?
मटका विधि से पौधे की जड़ों में नमी बनी रहने के कारण पौधा हरा-भरा रहता है.

रोशन शर्मा, जयपुर: राजस्थान के रेतीले, सूखे जंगलों में पेड़ लगाना और उसे जीवित रख कर बड़ा विशालकाय बनाना, वो भी पानी की कमी के बीच, ये शायद कम ही संभव हो पाता है, लेकिन अब इस काम को संभव बनाने के लिए राजस्थान वन विभाग ने मिट्टी के मटकों वाली पद्धति का सहारा लिया है.

इतना ही नहीं, इस तकनीक से पौधे शत-प्रतिशत जीवित तो रहते ही हैं, साथ ही 20 से 30 प्रतिशत तेजी से ग्रोथ करते हैं. 

सूखे जंगलों में पौधे से पेड़ तैयार करना किसी चैलेंज से कम नहीं होगा लेकिन इस चैलेज को राजस्थान वन विभाग की टीम पूरा कर दिखाया है. ड्राई फॉरेस्ट कहे जाने वाले जंगलों में पौधों को कम पानी के सहारे जीवित कैसे रखा जाए, ये झालाना जंगल में वन विभाग की टीम ने कर के दिखाया है. जंगली बबूल से अटे पड़े जंगल में फल और छायादार पेड़ों को जीवित रखने के लिए वन विभाग ने मिट्टी के मटकों का सहारा लिया है. ये मटके पेड़-पौधों के लिए किसी संजीवनी बूटी से कम नहीं हैं.

गर्मियों में जल जाते थे पौधे
झालाना जंगल में विगत वर्षों में बड़ी सख्या में प्लांटेशन किया गया, लेकिन बारिश हम होने और पौधों को समय पर पानी नहीं मिलने के कारण बड़ी सख्या में पौधे गर्मियों में जल जाते थे लेकिन मटका विधि के सहार जिन पौधों को लगाया गया, उनके चौंका देने वाले रिजल्ट सामने आए. झालाना लेपर्ड सफारी जंगल के वन अधिकारी की मानें तो सामान्य विधि से लगाए गए पौधों से ज्यादा अच्छे रिजल्ट मटका विधि से लगाए गए पौधो में देखने को मिले.

इन मिट्टी के मटकों को पेड़ या पौधे की जड़ों के पास जमीन में दबा दिया जाता हैं और फिर इसमें पानी भरा जाता हैं. मटके के तले में एक छोटा सा सुराख किया होता है, जिससे पौधे की जड़ों में पानी बूंद-बूंद करके टपकता रहता है. मटका विधि से पौधे की जड़ों में नमी बनी रहने के कारण पौधा हरा-भरा रहता है और पेड़ जलता नहीं है. 

इस विधि की खास बात यह है कि इससे पौधे को जितने पानी की जरूरत होती है, उतना ही पानी मटकों से निकलता है. सर्दियों में एक सप्ताह से 2 सप्ताह तक पानी चलता है जबकि गर्मियों में इसमें तीन दिन से सप्ताह भर तक एक मटके का पानी चल जाता है. इस तकनीक से पेड़-पौधों की ग्रोथ में भी सुधार होता है.