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पढ़िए यूरिया की डिमांड और सप्लाई का पूरा लेखा-जोखा, जानिए कैसे चलती है सप्लाई चेन

यूरिया संकट के कारण प्रदेश के किसान की परेशानी को देखते हुए राज्य के लोगों में जिज्ञासा इस बात को जानने की भी है कि आखिर किसान को यूरिया हासिल करने के जरिये क्या-क्या है? 

पढ़िए यूरिया की डिमांड और सप्लाई का पूरा लेखा-जोखा, जानिए कैसे चलती है सप्लाई चेन
यूरिया संकट के बीच लाइन में खड़े राज्य के किसान. (फाइल फोटो)

शशि मोहन, जयपुर: यूरिया संकट के कारण इन दिनों प्रदेश के किसान काफी परेशान है. लेकिन राज्य के आम लोगों में जिज्ञासा इस बात को जानने की भी है कि आखिर किसान को यूरिया हासिल करने के जरिये क्या-क्या है? सवाल यह भी कि क्या यूरिया की बिक्री केवल सरकारी स्तर पर ही हो रही है या फिर ओपन मार्केट में भी यूरिया मिल सकता है? आखिर ऐसा क्या है इस यूरिया में जो किसान लाइन लगाकर भी सरकारी सप्लाई से ही यूरिया खरीदना चाहता है?

कौन करता है यूरिया की सप्लाई? क्या है यूरिया आवंटन का आधार?

1. यूरिया की सप्लाई केंद्र सरकार की तरफ से राज्यों को उनकी मांग के हिसाब से की जाती है. अलग-अलग फसल के समय राज्य का कृषि विभाग यूरिया की मांग का आकलन एक रिपोर्ट के जरिए केंद्र को भेजता है.

2. राज्य की मांग के अनुसार सभी राज्यों को माहवार कोटा आवंटित किया जाता है. फिर यह कोटा केन्द्र की तरफ़ से पूरे महीने में अलग-अलग तारीखों पर जारी किया जाता है. 

3. यूरिया की सप्लाई रेलवे रैक के जरिये की जाती है. रेलवे की एक रैक में तकरीबन 3 हज़ार मीट्रिक टन यूरिया आता है. 

4. कुछ जगहों पर ज्यादा मांग की सूरत में राज्य सरकारें अपने प्रदेश में यूरिया उत्पादक कम्पनियों को सड़क मार्ग से सप्लाई के निर्देश भी देती हैं. 

देश में यूरिया उत्पादक कम्पनियां -  केंद्र ने चंबल फर्टिलाइजर, श्रीराम फर्टिलाइजर, जीएनएफसी, एनएफएल, इफको, कृभको, आरसीएफ, आईपीएल और कोरोमंडल जैसे यूरिया उत्पादकों को यूरिया सप्लाई के लिए अधिकृत कर रखा है.

कैसे चलती है यूरिया सप्लाई की चैन?

1. देश में यूरिया के घरेलू उत्पादन के साथ ही यूरिया का आयात भी किया जाता है. इम्पोर्टेड यूरिया कुछ हद तक सस्ता पड़ता है इसलिए विदेशों से भी मंगाया जाता है. 

2. केन्द्र की तरफ़ से राज्यों को यूरिया आवंटन किया जाता है. 

3. राज्यों में अलग-अलग हिसों में रेलवे रैक के जरिये यह यूरिया पहुंचाया जाता है. 

4. डीलर अपने यहां पीओएस मशीन पर किसान का अंगूठा लगवाकर उसे रिकॉर्ड में लेता है और उसके बाद ही यूरिया दिया जाता है. 

5. यूरिया का थम्ब इम्प्रेशन आते ही आधार से जुड़े होने के चलते यह डेटा केन्द्र के रिकॉर्ड में अपडेट हो जाता है और केन्द्र में किसान को यूरिया की डिलीवरी रजिस्टर हो जाती है. 

आखिर सरकारी सप्लाई से ही यूरिया क्यों खरीदता है किसान?

1. यूरिया की उत्पादन लागत 1150 से 1250 रुपए प्रति बैग तक आती है.

2. इतना महंगा यूरिया खरीदने में किसान अपने स्तर पर सक्षम नहीं है.

3. लिहाजा केन्द्र सरकार रियायती दरों पर यूरिया सप्लाई की व्यवस्था करती है. 

4. देश में सबसे ज्यादा सब्सिडी केन्द्र की तरफ़ से यूरिया पर ही दी जाती है. 

5. फिलहाल 266 रुपए 40 पैसे प्रति बैग की दर से राजस्थान के किसान को यूरिया दिया जा रहा है. 

6. ओपन मार्केट में यूरिया की उपलब्धता इतनी ज्यादा नहीं है. 

7. साथ ही कोई भी किसान यूरिया के लिए 267 रुपए प्रति बैग की बजाय 1150 रुपए नहीं देना चाहेगा. इसीलिए किसान यूरिया की सरकारी सप्लाई को ही प्राथमिकता देते हैं. 

फसल को कब-कब पड़ती है यूरिया के खाद की जरूरत?

कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि गेहूं और सरसों की फसल के समय यूरिया की ज्यादा जरूरत होती है. हालांकि दो बार दिए जाने वाले यूरिया के लिए सरकारी स्तर पर सप्लाई का आकलन दो बार के हिसाब से ही किया जाता है, लेकिन कई बार किसान एक साथ ही दोनों बारी का यूरिया लेना चाहता है.

सरसों में 55 दिन के अन्तराल में दो बार यूरिया की दरकार - 

सरसों की बुवाई के बाद फसल को पहला पानी 35 वें दिन दिया जाता है और उससे ठीक पहले प्रति बीघा 15 किलो की मात्रा के हिसाब से खेत में यूरिया दिया जाना चाहिए. सरसों की दूसरी पिलाई 20 दिन बाद होती है. इस तरह से 55 दिन में सरसो को यूरिया देना होता है.

गेहूं की फसल को 66 दिन में दो बार चाहिए यूरिया - 

गेहूं की फसल की बात करें तो इसमें पहली पिलाई 21 वें दिन होती है और उससे ठीक पहले 20 किलोग्राम प्रति बीघा के हिसाब से यूरिया खेत में डालना होता है. इसके 45 दिन बाद दूसरी पिलाई से ठीक पहले भी गेहूं की फसल को यूरिया चाहिए. अभी जो मांग आ रही है वह गेहूं के लिए है. कुछ किसान पहली और दूसरी पिलाई से पहले ही दोनों बार का यूरिया एक साथ इकट्ठा करना चाह रहे हैं. इसके चलते कुछ जगह यूरिया की बनावटी कमी दिखाई दी है.

'नीम कोटेड' हुआ यूरिया, सरकार ने यूरिया के कट्टे का साइज़ भी बदला

गेहूं की फसल के लिए प्रति बीघा में बीस किलोग्राम यूरिया देना होता है. कुछ समय पहले दूध और दूसरे खाद्य पदार्थों में यूरिया की मिलवाट की बात सामने आई तो सरकार ने पैटर्न बदल दिया. यूरिया को 'नीम कोटेड' कर दिया. इससे यूरिया में कड़वाहट आई तो खाद्य पदार्थों में मिलावट रुकी. दूसरी तरफ़ किसान के खेत को नीम की खाद मिलने से मिट्टी को भी यूरिया की कम मात्रा की ज़रूरत होने लगी. 
ऐसे में सरकार ने यूरिया के कट्टों का साइज़ भी बदल दिया. पहले यूरिया का एक बैग 50 किग्रा का आता था, लेकिन किसान किलोग्राम की भाषा की बजाय आधा कट्टे, पौन कट्टे या एक कट्टे की भाषा ही बेहतर तरीके से समझता है. ऐसे में सरकार ने कट्टे का साइज़ घटाकर यूरिया के एक कट्टे में 45 किग्रा की पैकिंग कर दी.