कोटा: MBS में एक दवा काउंटर ऐसा भी जहां दवा के बदले मिलता है 'सर्टिफिकेट'

पिछले दो सालों से भामाशाह मरीजों को दवा के बदले केवल एनएसी (नॉन एवलेबल सर्टिफिकेट) दी जाती है. ऐसे में भामाशाह व बीपीएल लाभार्थियों को दवा के लिए इधर उधर भटकना पड़ता है. 

कोटा: MBS में एक दवा काउंटर ऐसा भी जहां दवा के बदले मिलता है 'सर्टिफिकेट'
आरएमडीएस स्टोर पर पिछले दो सालों से दवाइयों की सप्लाई नही की जा रही है.

मुकेश सोनी/कोटा: आपको जानकर हैरानी होगी कि सम्भाग के सबसे बड़े अस्पताल एमबीएस में एक दवा काउंटर ऐसा भी है जहां पिछले दो सालों से भामाशाह मरीजों को दवा के बदले केवल एनएसी (नॉन एवलेबल सर्टिफिकेट) दी जाती है. ऐसे में भामाशाह व बीपीएल लाभार्थियों को दवा के लिए इधर उधर भटकना पड़ता है. 

हम बात कर रहे है आरएमआरएस द्वारा संचालित आरएमडीएस स्टोर की. आरएमडीएस स्टोर पर पिछले दो सालों से दवाइयों की सप्लाई नही की जा रही है. अब तो ऐसा लगने लगा है कि षड्यंत्र के तहत इस स्टोर को गुपचुप तरीके से बन्द करने की तैयारी की जा रही है.

कभी होती थी 35 लाख सालाना कमाई
आरएमआरएस द्वारा संचालित आरएमडीएस स्टोर 35 लाख सालाना कमाई करता था. साल 2015-16 व साल 2016-17 में इस स्टोर ने प्रतिवर्ष 30 लाख से ज्यादा कमाई की थी. लेकिन पिछले दो साल से यहां दवा सप्लाई नही होने से कमाई 0 रुपए है. जबकि यहां तीन कर्मचारी लगे है. जिनमें 1 फार्मासिस्ट प्रभारी,1 हेल्पर व 1 ऑपरेटर है, जो भामाशाह व बीपीएल लाभार्थी मरीज को दवा के बदले एनएसी देने का काम करते है. 

इस स्टोर से भामाशाह लाभार्थियों को प्रति दिन 70 से 80 व बीपीएल लाभार्थियों को 20 से 30 एनएसी दी जाती है. आरएमडीएस स्टोर से एनएसी जारी होने के बाद 37 प्रतिशत डिस्काउंट वाली दुकान से लाभार्थी को दवा उपलब्ध करवाई जाती है.

अधिकारी भी जता चुके  हैं नाराजगी
संभागीय आयुक्त ही आरएमआरएस के अध्यक्ष होते है. इसी साल जनवरी माह में तत्कालीन संभागीय आयुक्त केसी वर्मा ने एमबीएस अस्पताल का निरीक्षण किया था. आरएमडीएस स्टोर की हालत देख उन्होंने नाराजगी जताई थी. उन्होंने अधिकारियों को जल्द व्यवस्था सुधार के निर्देश दिए थे. 6 माह बीत जाने के बाद भी हालत जस के तस है. 

अस्पताल के गलियारों में ये भी चर्चा है कि एक विशेष फर्म को फायदा पहुचाने के लिए जानबूझ कर आरएमडीएस स्टोर पर दवाएं नही मंगवाई जा रही. मेडिकल कॉलेज प्रशासन की नाक के नीचे ये सारा खेल हो रहा है. मेडिकल कॉलेज प्रशासन सब कुछ जानकर भी कुछ नहीं कर पा रहा है. कॉलेज प्रशासक मूकदर्शक बनकर बैठे है.