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कोटा: भीषण गर्मी से नहरें सूखीं, किसान सिंचाई के लिए पानी को मोहताज

खेतों में पानी पहुंचे इसके लिए सरकार ने नहरे तो बना दी लेकिन उनमें पानी की एक बूंद नहीं है. किसान सिंचाई के लिए बूंद-बूंद पानी को मोहताज है.

कोटा: भीषण गर्मी से नहरें सूखीं, किसान सिंचाई के लिए पानी को मोहताज
नहर एवं वितरिकाएं खानपुर तहसील के 16 एवं सांगोद तहसील के 50 गांवों में फैली हुई है.

हेमंत सुमान/कोटा: किसान, एक ऐसा वर्ग जो अपने खुन पसीने से फसले उगाता है ताकि देश के करोड़ों लोगों को दो जून की रोटी मिल सके. भारत की अगर बात करें तो कृषि प्रधान देश होने के बावजूद यहां किसानों की स्थिति किसी से छिपी नहीं है. खेतों में पानी पहुंचे इसके लिए सरकार ने नहरे तो बना दी लेकिन उनमें पानी की एक बूंद नहीं है. किसान सिंचाई के लिए बूंद-बूंद पानी को मोहताज है. कुछ ऐसे ही हालातों से जूझ रहै है कोटा जिले के सांगोद क्षेत्र के हजारों किसान. 

खेतों में लहलहाती फसलों के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है तो वो है सिंचाई के लिए पानी. अगर किसी क्षेत्र में नहर हो तो माना जाता है कि किसानों के खेत भी सरसब्ज होंगे. लेकिन कोटा जिले के सांगोद क्षेत्र में हालात इसके उलट है. करीब साढ़े चार दशक पहले हरिश्चन्द्र सागर सिंचाई परियोजना के अस्तित्व में आने के बाद माना जा रहा था कि इससे खेत सरसब्ज होंगे तो किसानों की माली हालत भी सुधरेगी. लेकिन हालात इसके उलट है. किसानों को नहरों में पानी नहीं मिल रहा. खेत सूखे पड़े है वहीं किसान नहरी पानी की राह ताकते है.

वर्ष 1977 में बनी परियोजना में गांव-गांव और हर खेत को पानी पहुंचाने के लिए 36 किमी लम्बाई की मुख्य नहर समेत 108 किलोमीटर लम्बाई की वितरिकाओं का निर्माण करवाया गया. नहर एवं वितरिकाएं खानपुर तहसील के 16 एवं सांगोद तहसील के 50 गांवों में फैली हुई है. परियोजना से कोटा जिले के सांगोद क्षेत्र के 37470 एकड़ तथा झालावाड़ जिले के खानपुर तहसील के 10153 एकड़ में सिंचाई का प्रावधान रखा गया. लेकिन आज तक अंतिम छोर तक कभी किसानों को सिंचाई के लिए पानी नहीं मिला.

किसानों के खेतों को सरसब्ज करने की मंशा से सरकार ने परियोजना में करोड़ों रुपए खर्च किए. लेकिन पानी संग्रहण के लिए बांध नहीं बनाया. झालावाड़ जिले के हीचर गांव के पास कालीसिंध नदी से परियोजना की मुख्य नहर को जोड़ा गया. बारिश में कालीसिंध नदी का जलस्तर बढ़ने पर नदी का पानी नहर में आता है. उस दौरान किसानों को नहरी पानी की जरूरत नहीं होती. रबी की फसलों में जब किसानों को पानी की जरूरत होती है तो नहर सूखी पड़ी रहती है. ऐसे में किसान बरसों से परियोजना पर बांध निर्माण की मांग करते आ रहै हैं. लेकिन सरकार की नजरे इस और इनायत नहीं हो रही. 

नहरों व माइनरों की मरम्मत को लेकर भी विभाग को कभी पर्याप्त बजट नहीं मिला. चार दशक से मरम्मत को तरस रही परियोजना की नहर जीर्ण-शीर्ण होकर टूटने के कगार पर है तो माइनर जर्जर होकर धारासाही हो चुके है. नहर में जलप्रवाह के लिए बने गेट और नहर की दीवारे जर्जर होकर टूट चुकी है. ऐसे में किसानों के लिए परियोजना छलावा बनी है. मुख्य नहर जगह-जगह से टूटी है तो माईनर भी क्षतिग्रस्त होकर जमीद्दोज हो चुके है.