कोटा: डिलीवरी के लिए ज्यादा पैसे मांगने के मामले में बढ़ी अस्पताल की मुश्किलें...

दरअसल, बारां जिले के शाहबाद कस्बे के गांव देवरी निवासी भरत, 27 अक्टूबर को उसकी गर्भवती पत्नी को बारां से मेडिकल कॉलेज अस्पताल ला रहा था.

कोटा: डिलीवरी के लिए ज्यादा पैसे मांगने के मामले में बढ़ी अस्पताल की मुश्किलें...
प्रसूता का पति इलाज के पहले ही 61 हजार रुपये खर्च कर चुका था.

मुकेश सोनी/कोटा: राजस्थान के कोटा सीएमएचओ ने प्रसूता से इलाज के नाम पर ज्यादा पैसे मांगने के मामले में जाच पूरी कर रिपोर्ट जिला कलेक्टर को सौप दी है. जांच में सामने आया कि शीला चौधरी रोड, तलवंडी स्थित राधा कृष्णा हॉस्पिटल द्वारा प्रसूता से डिस्चार्ज के समय 46 हजार रुपये की और मांग की गई थी. जबकि प्रसूता का पति इलाज के पहले ही 61 हजार रुपये खर्च कर चुका था. यानि जितना अस्पताल प्रबंधन ने काम किया था उतना पैसा मरीज जमा करवा चुका था. 

वहीं, जांच के दौरान अस्पताल प्रबंधक व स्टाफ की ओर से अलग अलग जानकारियों दी गई जो संदेह पैदा कर रही थी, इस कारण दो बार अस्पताल प्रबंधन से बयान लिए गए, लेकिन अस्पताल प्रबंधन सबूत पेश नहीं कर पाया. पीड़ित पक्ष के बयान लिए गए. सीएमएचओ ने भी माना है कि निजी अस्पताल द्वारा गैर जिम्मेदार रवैया अपना कर गरीब मरीज से ओर पैसे जमा करवाने की डिमांड की गई थी. सीएमएचओ द्वारा की गई जाच के बाद राधा कृष्णा हॉस्पिटल की मुसीबत बढ़ सकती है.

ये था मामला
दरअसल, बारां जिले के शाहबाद कस्बे के गांव देवरी निवासी भरत, 27 अक्टूबर को उसकी गर्भवती पत्नी को बारां से मेडिकल कॉलेज अस्पताल ला रहा था. एम्बुलेन्स चालक ने उसे गुमराह करके शहर के निजी अस्पताल राधा कृष्णा में पहुंचा दिया. जहां, अस्पताल के डॉक्टर ने प्रसव (डिलीवरी) का खर्चा कुल 20 हजार रुपये बताया था, जिस पर भरत राजी हो गया. 

इस बीच अस्पताल प्रबंधन बिल पर बिल थमता गया. भरत ने मजबूरी में गांव की जमीन व उसकी बहनों के मंगल सूत्र तक गिरवी रखने पड़े. अस्पताल ने और पैसे जमा कराने की डिमांड करते हुए प्रसूता को डिस्चार्ज करने से इनकार कर दिया. इधर भरत की जेब खाली हो चुकी थी उसने सबकुछ इलाज में खर्च कर दिया था. उसका धैर्य भी टूट चुका था. वह और उसके परिजन अस्पताल के बाहर फूटफूट कर रो रहे थे. उसी दौरान कोटा विवि के पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष विजय प्रताप सिंह ने भरत की मदद की. वह पीड़ित भरत को लेकर सीधा जिला कलक्टर के पास पहुंचा. जिला कलक्टर ने मामले को गम्भीरता से लेते हुए सीएमएचओ को मौके पर भेजा और पूरे मामले की जाच के निर्देश दिए. जी मीडिया ने भी सामाजिक सरोकार निभाते हुए पीड़ित की आवाज को सरकार व जिला प्रशासन तक पहुंचाया.

गरीब के साथ न्याय नहीं हुआ
सीएमएचओ डॉ बीएस तंवर का कहना है कि अस्पताल निदेशक को इस प्रकार का कार्य नहीं करना चाहिए था. गरीब जनता के साथ न्याय नहीं हुआ है. उन्होंने कहा कि आशा है कि आगे सभी निजी अस्पताल जिम्मेदारी निभाए,ओर गरीबो से इस तरह का व्यवहार नहीं करे. इस सम्बंध में निजी अस्पताल संचालको को मीटिंग में पाबंद भी किया है, की वो ईमानदारी से काम करे. ताकि भविष्य में इस तरह की पुनरावृत्ति ना हो. जांच रिपोर्ट कलक्टर को सौप दी है. अब जिला कलक्टर के निर्देश के बाद ही अस्पताल के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी.

सीएमएचओ द्वारा की गई जाच से जाहिर होता है कि स्वास्थ्य सेवा को बाजार के हवाले कर देना आम लोगों के लिए घातक साबित हो रहा है. निजी अस्पताल में अब जान बचाने का काम कम, लेने का काम ज्यादा होता दिखता है. कभी लापरवाही की शक्ल में मरीज दम तोड़ते हैं तो कभी मोटे इलाज के बिल देखकर. यानि कई निजी अस्पताल रुपया बनाने की मशीन बने हुए हैं.