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कोटा: पुलवामा में हुए शहीद के परिवार को 6 माह बाद भी नहीं मिली मुआवजे की राशि

सुविधाओं एवं घोषणा के पैकेज के लिए सरकारी दफ्तरों में चक्कर काटना शहीद के परिजनों की नियति बना हुआ है. 

कोटा: पुलवामा में हुए शहीद के परिवार को 6 माह बाद भी नहीं मिली मुआवजे की राशि
शहीद के घर तक पक्की सड़क बनाने की मांग छह माह तक पूरी नहीं हुई.

हेमंत सुमन/कोटा: सीमा पर युद्ध हो या सीमा के अंदर आतंकी हमला, सैनिक हमारे देश के लिए बलिदान देने से पीछे नहीं हटते. देश के लिए जान देने वाले वीर शहीदों को सम्मान एवं परिवार को सहारा मिलता तो है लेकिन सरकारी तंत्र की जटिलताएं परिजनों की हिम्मत तोड़ देती है. 14 फरवरी 2019 का दिन कोई नहीं भूल सकता जब पुलवामा में सीआरपीएफ जवानों के वाहनों पर आतंकवादियों ने हमला कर दिया. हमले में चालीस से अधिक जवान शहीद हो गए. 

इस आतंकवादी हमले ने लोगों की आत्मा को अंदर तक झकझोर दिया. घटना के बाद पूरा देश रो पड़ा. हर आंख से आंसू और पाकिस्तान के रवैये को लेकर गुस्सा दिखा. घटना में कोटा जिले के सांगोद क्षेत्र के लाल हेमराज मीणा भी शहीद हुए. घटना के बाद केन्द्र सरकार ने पाकिस्तान से इसका बदला भी लिया लेकिन शहीद के परिजन अब भी अपने हक के लिए संघर्ष कर रहे है तो उन्हें अब भी सरकारी मदद का इंतजार है.

शहीद हेमराज मीणा की शहादत के बाद परिजनों को दिलासा देने सरकार के कई मंत्री और आला अधिकारी पहुंचे. सब ने परिजनों को दुखद क्षण में साथ रहने का भरोसा दिलाया. किसी ने सहारा देने की बात कही तो किसी ने सम्मान और सुविधा देने की, लेकिन परिजनों को घटना के छह माह बाद ही इस बात का मलाल है कि अब कोई उनकी सुध लेने नहीं आ रहा. हेमराज के परिवार को सरकार से पैकेज में शामिल पचास लाख की आर्थिक सहायता राशि के अलावा अभी तक कुछ नहीं मिला. दिलासा देने आए मंत्रियों ने शहीद परिवार से जो वादे किए वो अभी तक फाइलों में उलझे हुए है.

सुविधाओं एवं घोषणा के पैकेज के लिए सरकारी दफ्तरों में चक्कर काटना शहीद के परिजनों की नियति बना हुआ है. विनोदकलां में शहीद के घर तक पक्की सड़क बनाने की मांग छह माह तक पूरी नहीं हुई. शहीद के घर तक पहुंचने के लिए कई फीट कीचड़ में गुजरना पड़ता है. पीडब्ल्यूडी ने सड़क के प्रस्ताव बनाए लेकिन मामला सरकारी फाइलों में अटक गया.

शहादत के बाद यहां पहुंचे राज्य के मंत्रियो की विनोदखुर्द में अंतेष्ठी स्थल पर शहीद स्मारक बनाने की घोषणा भी पूरी नहीं हुई. स्मारक स्थल के आसपास पशुओं का जमावड़ा लगा रहता है, अंतेष्ठी स्थल की भी किसी सरकारी नुमाईंदे ने बाद में कोई सुध ली. शहीद के नाम पर सांगोद कॉलेज का नामकरण भी नहीं हो सका. सांगोद में शहीद के आवास तक सड़क जरूर बनी लेकिन यहां शहीद की प्रतिमा लगाने की मंत्रियों की घोषणा सरकारी कागजों में अटकी है. अब शहीद परिवार इन घोषणाओं को पूरा करवाने में दफ्तरों के चक्कर काट रहा है. 

शहीद की वीरांगना मधुबाला एवं उनके परिजनों की आंखों के आंसू भले ही सूख गए हो लेकिन सरकारी तंत्र की जटिलताओं में शहीद के परिजन ऐसे उलझे की अब भी उन्हें सरकारी मदद के लिए दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ रहे है. अब देखना यह है कि सरकार शहीद और शहीदों के परिवारों की मदद के लिए कितनी तत्परता दिखाती है.