कोटा: रंग लाई पशुपालन विभाग की मेहनत, 'कड़कनाथ' ने मिटाई किसानों की कड़की

कड़कनाथ चिकन का सेवन लाल रक्त कोशिकाओं और हीमोग्लोबिन को बढ़ाने में मदद करता है. यह पीड़ित रोगियों के लिए भी फायदेमंद है.

कोटा: रंग लाई पशुपालन विभाग की मेहनत, 'कड़कनाथ' ने मिटाई किसानों की कड़की
150 से अधिक किसान कडकनाथ की फार्मिग कर रहे हैं

राम मेहता/बारां: राजस्थान के बारां जिला प्रशासन का नारा 'कड़कनाथ पालिए, कड़की मिटाईए' किसानों को आकर्षित करने के लिए और कड़कनाथ मुर्गी पालन में शामिल किया था. वहीं, जिसका परिणाम दिखने लगा है. प्रशासन के इस पहल से इस व्यवसाय में किसानों की संख्या बढ़ गई है. बता दें कि 150 किसान इस व्यवसाय में लगे हुए हैं, जिससे बारां पहले स्थान पर है.

गौरतलब है कि कड़कनाथ, जिसे काले मासं के नाम से भी जाना जाता है, मध्य प्रदेश के झाबुआ में पाई जाने वाली जंगली काली मुर्गी की एक भारतीय नस्ल है. स्थानीय रूप से जाना जाता है काली मांस के रूप में, चिकन अपने काले मांस के लिए लोकप्रिय है. वैज्ञानिक आंकड़ों से पता चलता है कि कड़कनाथ मुर्गे में लौह तत्व एक साधारण मुर्गे की तुलना में लगभग 10 गुना होता है. इसकी लोहे की सामग्री के कारण, इसका रक्त, मांस और हड्डियां भी काले रंग की है. कड़कनाथ चिकन का सेवन लाल रक्त कोशिकाओं और हीमोग्लोबिन को बढ़ाने में मदद करता है. यह पीड़ित रोगियों के लिए भी फायदेमंद है.

जिला कलेक्टर इंद्र सिंह ने छत्तीसगढ़ की अपनी यात्रा के दौरान यह विचार प्राप्त करने के बाद बारां में कड़कनाथ मुर्गी पालन शुरू किया. वहीं, अब बारां जिले के किसानों की आय बढ़ाने के लिए अब उन्हें परंपरागत खेती के साथ-साथ पशुपालन के लिए भी प्रेरित किया जा रहा है. इसी उद्देश्य से बारां जिले के किसानों को अब महंगे दामों में बिकने वाले कड़कनाथ नस्ल के मुर्गी पालन से जोड़ा जा रहा है. संपूर्ण राजस्थान में लागू होने वाले इस पायलट प्रोजेक्ट की शुरुआत बारां जिले से की जा चुका है, जहां पर 150 से अधिक किसान कडकनाथ की फार्मिग कर रहे हैं 

कड़कनाथ नस्ल का मांस और अंडा काफी महंगा बिकता है. बारां जिले से सटे मध्यप्रदेश के झाबुआ क्षेत्र में कड़कनाथ चिकन की सबसे बेहतरीन ब्रीड काफी पाई जाती है. कड़कनाथ झाबुआ क्षेत्र की पहचान है. इसके मांस और अंडे की बाजार में काफी मांग होने के चलते इसके अच्छे दाम मिलते हैं. 

इसी का लाभ दिलाने के लिए जिला कलक्टर इन्द्र सिंह राव की पहल पर बारां जिले में कड़कनाथ मुर्गे के व्यवसाय को लेकर किसानों व पशुपालकों को प्रेरित किया जा रहा है. जिला कलक्टर के प्रयासों से इस मुर्गे के पालन को आत्मा प्रोजेक्ट में शामिल किया गया है ताकि किसानों की इस व्यवसाय से जुड़ी सभी जरूरतें आसानी से पूरी की जा सके. किसानों को प्रशिक्षित आत्मा प्रोजेक्ट (कृषि प्रौद्योगिकी प्रबंधन एजेंसी ) से जोड़ने के बाद पशुपालन विभाग के विशेषज्ञों और कृषि वैज्ञानिकों द्वारा अब इस व्यवसाय से जुड़ने की चाह रखने वाले वाले किसानों को मुर्गीपालन के लिए प्रशिक्षित कर रहे हैं. अंता कृषि विज्ञान केन्द्र में चल रहे प्रशिक्षण में 300 करीब कृषक और पशुपालकों को कड़कनाथ के व्यवसाय हेतु प्रशिक्षित किया जा चुका है. अब इन सभी प्रशिक्षणार्थियों को मध्यप्रदेश के झाबुआ में पोल्ट्री फर्मों में प्रशिक्षण के लिए भेजा जा रहा है 

कड़कनाथ मुर्गे की नस्ल भारत के मध्यप्रदेश राज्य के झाबुआ जिले में पाई जाती है. इस नस्ल का मुर्गी वंश पूर्ण रूप से काला होता है. यहां तक की इनका मांस और खून भी काला होता है. इनके अंडों का बाहरी रंग भूरा होता है. इनके अंडों का रंग काला होना केवल एक भ्रान्ति है. इस प्रजाति में रोग प्रतिरोधक क्षमता अधिक होती है. इनकी अन्य मुर्गों के मुकाबले मृत्यु दर काफी कम है. अन्य चिकन प्रजाति के मुकाबले इसके मांस और अंडे में पोषण तत्व कहीं अधिक पाए जाते हैं. इस प्रजाति में केलोस्ट्रोल की मात्रा बेहद कम होती होती है. इसके चलते कड़कनाथ की बाजार में काफी मांग है. 

कड़कनाथ का मांस और अंडा काफी महंगा बिकता है. जाहिर सी बात है जब बाजार में मांग ज्यादा होगी तो दाम भी अच्छे मिलना तय है. इन मुर्गियों द्वारा दिए गए अंडे बाजार में 50 से 80 रुपए तक के बिकते हैं. जबकि साधारण मुर्गी के अंडे की कीमत 4 से 5 रूपए तक है. कड़कनाथ के मांस का बाजार भाव 800 से लेकर 1000 रुपए प्रति किलो तक है. वहीं साधारण मुर्गे का मांस बाजार में 100 से 140 रुपए किलो तक में आसानी से उपलब्ध हो जाता है.