कोटा: ग्रामीणों ने बदली मूक्तिधाम की सूरत, लगाए रंग-बिरंगे फूल

पांच साल पहले तक दुर्दशा के शिकार मुक्तिधाम में जगह-जगह झाड़ व बबूल के पेड़ हुआ करते थे.

कोटा: ग्रामीणों ने बदली मूक्तिधाम की सूरत, लगाए रंग-बिरंगे फूल
कांटो से भरे मुक्तिधाम मे रंग-बिरंगे हजारो फूल खिल रहे है.

सुल्तानपुर/हेमन्त सुमन: कहते हैं मन में कोई काम करने की हिम्मत और जज्बा हो तो कोई काम मुश्किल नहीं होता. कुछ ऐसा ही जोश और जज्बा दिखाया सुल्तानपुर के ग्रामीणों ने यहां बदहाल हो रहे मुक्तिधाम की सूरत बदलने को लेकर. जहां पहले लोगों को दिन में भी आने से डर लगता था आज वहां फूलों की बगिया नजर आती है.

हरे भरे पेड़ पौधों और फूलों से महकता यह परिसर कोई गार्डन नहीं बल्कि सुल्तानपुर का मुक्तिधाम है. पांच साल पहले तक दुर्दशा के शिकार इस मुक्तिधाम में जगह-जगह झाड़ व बबूल के पेड़ हुआ करते थे. अंतिम संस्कार के लिए आने वाले लोगों के बैठने की जगह नहीं थी तो शवों को भी कंधों पर ही रखना पड़ता था. बारिश में कीचड़ इतना की यहां खड़ा होना भी मुश्किल था. गांव के कुछ ग्रामीणो ने यहां की बदहाली देखी तो इसके कायाकल्प की ठानी और मुहिम शुरू की.

ग्रामीणों ने मुक्तिधाम सेवा समिति का गठन किया और यहां अन्तिम संस्कार के लिए आने वाले ग्रामीणो से राशि जुटाना शुरू किया. जिसके बाद जनसहयोग से मिले पैसों से यहां विकास शुरू हुआ. ग्रामीणों का प्रयास देख अन्य लोग भी इससे जुड़ते गए. यहां शव रखने के लिए जगह बनाई वहीं अंतिम क्रिया में आने वाले लोगों के लिए बैंच व कुर्सियां भी लगवाई गई. धीरे-धीरे ग्रामीणों ने अपनी मेहनत और लगन से बबूलों से अटे मुक्तिधाम को फूलों की वाटिका में तब्दील कर दिया.

कभी कांटो से भरे मुक्तिधाम मे रंग-बिरंगे हजारो फूल खिल रहे है. यहां चालीस से अधिक प्रजातियों के औषधीय पौधे व सैकड़ों किस्म के फूलदार पौधें लगे है. मुक्तिधाम में लगे पेड़ व परिसर में फैला हराभरा वातावरण लोगों को प्रकृति के बीच होने का अहसास कराते है. यहां आने वाले कई लोग मुक्तिधाम में लगे फूलों को तोड़कर रोजाना मंदिरों में भगवान के चरणों में चढ़ाते है. 

बीते पांच साल में यहां करीब पचास लाख रुपए के विकास कार्य हो चुके है. सरकार ने वर्ष 2014 मे मुक्तिधाम के लिए 2 बीघा भूमि आवंटन की थी लेकिन कई बार विभागो के चक्कर काटने पर प्रशासन द्वारा 2016 मे भूमि की पैमाईश की गई. लेकिन वहां बसे अतिक्रमियो को बेदखल नहीं किया. ऐसे मे ढाई साल बाद भी मुक्तिधाम को आंवटित दो बीघा भूमि नहीं मिल पाई है जिससे अब तक मुक्तिधाम का पूर्ण विकास नहीं हो पाया है.