सीकर: 27 फरवरी से 7 मार्च तक होगा वार्षिक लक्‍खी मेला, उमड़ेगा आस्‍था और श्रद्धा का सैलाब

खाटूश्‍याम बाबा का लक्‍खी मेले पर हर रोज फूलों से आलौकिक श्रृंगार किया फाल्‍गुनी मेले में बंगाली कलाकारों के द्वारा बाबा श्‍याम का फूलों से श्रृंगार किया जाएगा.

सीकर: 27 फरवरी से 7 मार्च तक होगा वार्षिक लक्‍खी मेला, उमड़ेगा आस्‍था और श्रद्धा का सैलाब
दस दिनों तक खाटूनगरी में आस्‍था और श्रद्धा का सैलाब उमड़ेगा.

अशोक शेखावत, सीकर: शीश का दानी, लखदातार, हारे का सहारा, बाबा श्‍याम हमारा जैसे अनेकों नाम से पुकारे जाने वाले खाटूश्‍याम बाबा के वार्षिक लक्‍खी मेले की तैयारियां जोरों पर हैं. 

27 फरवरी से सात मार्च तक आयोजित होने वाले दस दिवसीय लक्‍खी मेले में पैंतीस से चालीस लाख से अधिक श्याम भक्‍तों के आने की संभावना है. इसके चलते सीकर जिला प्रशासन, पुलिस प्रशासन और श्‍याम मंदिर कमेटी ने श्‍याम भक्‍तों के लिए तमाम व्‍यवस्‍थाओं को अमलीजामा पहनाना शुरू कर दिया है. व्‍यवस्थाओं को लेकर मैराथन मीटिंग आयोजित हो रही है. दस दिनों तक खाटूनगरी में आस्‍था और श्रद्धा का सैलाब उमड़ेगा.

करोड़ों लोगों की आस्‍था का केंद्र बाबा श्‍याम का आलौकिक मंदिर राजस्‍थान के शेखावाटी अंचल के सीकर के खाटूश्‍यामजी कस्‍बे में स्थित है. राजस्‍थान की राजधानी जयपुर से 80 किलोमीटर दूर और सीकर से 44 किलोमीटर में बाबा श्‍याम का धाम खाटूश्‍यामजी स्थित है. उत्तर-पश्चिम रेलवे के रींगस रेलवे स्‍टेशन से महज .6 किलोमीटर की दूरी पर बाबा श्‍याम विराजमान हैं.  महाभारतकालीन के महाबली बर्बरीक के अलौकिक दिव्य शीश करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था और भक्ति का केंद्र बन हुए हैं. भक्तजन आस्था की डोर से बंधे असीम आशा लिए बाबा श्याम के दरबार में हर वर्ष शीश नवाने आते हैं.

बाबा श्‍याम की महिमा का ऐसा है बखान
महाभारत काल में पांडवों के वनवास के दौरान महाबली भीम और राक्षसी हिडिंबा के विवाह से एक पुत्र उत्पन्न हुआ. केश विहीन सिर होने के कारण उसका नामकरण ‘घटोत्कच’ किया गया. घटोत्कच का विवाह समयावधि में प्रागज्योतिषपुर दानवी साम्राज्ञी रूपवती राजकुमारी कामकंटका से हुआ. इनके एक दिव्य बालक का जन्म हुआ. सघन घुंघराले केशों वाले दिव्य बालक का जन्म होने के कारण उसे ’बर्बरीक’ नाम दिया गया. देवयोनि के कारण इस दिव्य बालक का विकास तीव्रता से हुआ. 

अल्पावधि में ही इस तेजस्वी बालक बर्बरीक ने भगवान शिव तथा नव दुर्गाओं की कठोरतम आराधना, तप-साधना करते हुए महर्षि विजय के शिष्यत्व में आयुद्धों, शास्त्रों और तीन बाणों की दैविक शक्तियां प्राप्त करते हुए स्वयं को असीम बलशाली, वीर योद्धा, महापराक्रमी अपराजेय बनाते हुए, हारने वाले का साथी बनने का संकल्प लिया और ऐतिहासिक महासमर महाभारत का युद्ध देखने के लिए कुरुक्षेत्र की ओर चल पड़ा. 

भगवान श्रीकृष्ण ने ली परीक्षा
दूरदृष्टा लीलावतार भगवान श्रीकृष्ण ने बालक को आते देखा तो राह में एक पीपल के पेड़ के नीचे ब्राह्मण वेश में बैठ गए. अलौकिक तेजस्वी बालक ने ब्राह्मण को सादर प्रणाम किया तो ब्राह्मण वेषधारी भगवान श्रीकृष्ण ने उसका परिचय और प्रयोजन पूछा. दिव्य वीर बर्बरीक के तीन बाणों की अलौकिक अपराजेय शक्तियों को जानकर उसकी परीक्षा लेने की ठानी. वीर बालक को पीपल के पेड़ की ओर संकेत करते हुए छेदन करने को कहा. वीर बर्बरीक ने एक ही बाण से पीपल के सारे पत्तों का छेदन कर दिया. एक पत्ता ब्राह्मण वेषधारी भगवान श्रीकृष्ण के पैर के नीचे दबा होने के कारण तीर उनके पैर के चतुर्दिक चक्कर लगाने लगा. यह देख ब्राह्मण ने पत्ते पर से अपना पैर हटाया तो उसका छेदन कर तीर वापस तूणीर में चला गया. 

ऊंची जगह स्थापित हुआ बर्बरीक क शीश
लीलावतार भगवान श्रीकृष्ण ने महाभारत के धर्मयुद्ध के संभावित परिणामों के संदर्भ में चिंतन-मनन कर मन ही मन कुछ निश्चय किया. योगेश्वर ने अपनी योगमाया के प्रभाव से भावी धर्मयुद्ध में सत्य की विजय हेतु उस वीर योद्धा का शीश दान में मांग लिया. वीर बर्बरीक ने महाभारत के संपूर्ण महासमर को देखने की इच्छा जाहिर करते हुए सहर्ष अपना शीष काटकर समर्पित कर दिया और बन गए शीष के दानी. बर्बरीक की इच्छानुसार भगवान श्रीकृष्ण ने उनके शीश को अमृत से अभिसिंचित कर एक ऊंची जगह स्थापित करवा दिया, जहां से उस दिव्य शीश ने संपूर्ण महाभारत देखा. 

पांडवों ने भी किए बर्बरीक के दिव्य शीश के दर्शन
महासमर की समाप्ति पर गर्वोन्मत्त पांडवों को श्रीकृष्ण वीर बर्बरीक के दिव्य शीश के पास ले गए. ऐतिहासिक महासमर महाभारत के अमर साक्षी ने श्रीकृष्ण के सुदर्शन चक्र को ही विजयश्री के लिए एकमात्र उत्तरदायी ठहराया. सुनकर सभी पाण्डव हतप्रभ रह गए. भगवान श्रीकृष्ण ने वीर बर्बरीक के अलौकिक दिव्य शीश को वरदान दिया कि वह कलयुग में उनके ही एक नाम ‘‘श्‍याम‘‘ के रूप में पूजित होगा. वह हारे का सहारा बनकर शरणागत की हर समस्या का समाधान करेगा. जो सच्चे मन से उनको याद करेगा उसके सारे सपने सच और हर इच्छा पूर्ण होगी. वह इस लोक और परलोक में यश का भागी होगा. कलयुग में बर्बरीक के दिव्‍य शीश का खाटूश्‍यामजी में मिलने के बाद यहां बाबा श्‍याम के शीश की पूजा की जाने लगी और विशाल मंदिर बनाया गया.

श्‍याम दरबार में शीश नवाकर पूजा-अर्चना करते हैं भक्त
बाबा श्‍याम हारे के सहारे लखदातार का दरबार खाटूश्‍यामजी कस्‍बा जिसे श्‍याम नगरी खाटूधाम के नाम से भी पुकारा जाता है, हर वर्ष फाल्गुन महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी एवं द्वादशी को बाबा श्‍याम का वार्षिक लक्खी मेला लगता है. इसमें लाखों श्रद्धालु हाथ में बाबा श्‍याम का पवित्र निशान लिए जयघोष करते हुए पहुंचते हैं. श्‍याम दरबार में शीश नवाकर पूजा-अर्चना करते हैं.  

हर वर्ष फाल्‍गुन महीने के शुक्‍ल पक्ष की एकादशी और द्वादशी को बाबा श्‍याम का मेला आयोजित होता है. हालांकि सर्वाधिक भीड़ एकादशी और द्वादशी मेले पर होती है लेकिन प्रशासन और मंदिर कमेटी ने लाखों भक्‍तों की भीड़ के चलते और इस मेले की समयावधि बढ़ा दी. अब यह मेला दस दिनों तक आयोजित होने लगा है लेकिन यह मेला पूरे परवान पर एकादशी और द्वादशी पर होता है. वार्षिक फाल्‍गुनी के मेले के अलावा हर महीने की एकादशी और द्वादशी को भी बाबा श्‍याम के लाखों भक्‍त दर्शन कर मनोतिया मांगते हैं और पूजा अर्चना करते हैं. 

भक्‍तों के ठहरने के लिए की जाती हैं व्यवस्थाएं
वहीं, नवविवाहित जोड़े भी मनौतियां मांगते हैं. मासिक और वार्षिक मेलों में लाखों भक्‍तों की भीड़ उमड़ती है, जिसके लिए प्रशासन और मंदिर कमेटी की ओर से तमाम व्‍यवस्‍थाएं की जाती हैं तो श्‍याम भक्‍तों और विभिन्‍न सामाजिक धार्मिक संगठनों की ओर से भी निशुल्‍क भोजन-पीने के पानी चिकित्‍सा सहित अन्‍य सुविधाओं की व्‍यवस्‍थाएं की जाती हैं. हर साल करोड़ों श्‍याम भक्‍त बाबा श्‍याम के दर्शन करने आते हैं. करोड़ों भक्‍तों के ठहरने के लिए विभिन्‍न संगठनों ट्रस्‍टों श्‍याम मंदिर कमेटी की ओर से ठहरने की भी व्‍यवस्‍थाएं की जाती हैं तो सैकडों धर्मशालाएं खाटूनगरी में बनी हुई हैं, जहां श्‍याम भक्‍त ठहरते हैं. 

मेले के लिए कई बार हुई है मीटिंग
इस वर्ष में होने वाले विशाल लक्‍खी मेले की तैयारियों को लेकर कलेक्‍टर यज्ञ मित्र सिंह देव, एसपी डॉ. गगन दीप सिंगला और श्‍याम मंदिर कमेटी की कई बार बैठकें हो चुकी हैं और तमाम तैयारियां को अमलीजामा पहनाया जा रहा है. मेले के‍ दिनों में मंदिर चौबीस घंटे दर्शन के लिए खुला रहता है लेकिन श्रंगार और भोग के लिए कुछ पलों के लिए बाबा श्‍याम का पर्दा किया जाता है. इसके लिए रोजाना मंगला आरती के साथ पूजा-अर्चना का दौर शुरू होता है, जो देर रात तक जारी रहता है.

तीन हजार  पुलिसकर्मियों की ड्यूटी लगाई गई
बाबा श्‍याम के 27 फरवरी से आयोजित होने वाले मेले में तीन हजार  पुलिसकर्मियों की ड्यूटी लगाई गई है, जो पूरी सुरक्षा की कमान संभालेंगे. अतिरिक्‍त बसें और ट्रेनों का संचालन किया जाएगा. मेले में पूरा खाटूधाम यानि खाटूश्‍याम नगरी सीसीटीवी कैमरे की नजर में रहेगा. सैकड़ों सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएंगे और ड्रोन कैमरों से पूरी निगरानी की जाएगी. मंदिर कमेटी की ओर चिकित्‍सा, पानी, बिजली सहित अन्‍य सुविधाएं भक्‍तों के लिए की जाएंगी.

बाबा श्‍याम को हर रोज भोग लगाया जाएगा
खाटूश्‍याम बाबा का लक्‍खी मेले पर हर रोज फूलों से आलौकिक श्रृंगार किया फाल्‍गुनी मेले में बंगाली कलाकारों के द्वारा बाबा श्‍याम का फूलों से श्रृंगार किया जाएगा, तो पूरा मंदिर परिसर भी फूलों से सजाया जाएगा. पूरे दस दिनों तक मेले में बाबा श्‍याम का हर रोज अलग-अलग फूलों से श्रृंगार किया जाएगा. बाबा श्‍याम को हर रोज भोग लगाया जाएगा. मेले की तैयारियां जोरों पर हैं ताकि भक्‍तों को किसी तरह की असुविधा नहीं हो.