सिरोही के सबसे बड़े अस्पताल में नहीं हैं पर्याप्त सुविधाएं, इलाज को तरह रहे बीमार बच्चे

यहां बने तीन वार्ड एसएनसीयू, पीएनसी व एमटीसी में भर्ती रहने वाले गंभीर बीमार बच्चों के 32 वॉर्मर बेड पर ऑक्सीजन की सेंट्रलाइज्ड सप्लाई तक नहीं होती. ऐसे में सिलेंडर से ऑक्सीजन देनी पड़ती है. 

सिरोही के सबसे बड़े अस्पताल में नहीं हैं पर्याप्त सुविधाएं, इलाज को तरह रहे बीमार बच्चे
जिला अस्पताल में इलाज के लिए रोजाना 125 बच्चे पहुंच रहे हैं.

सिरोही: राजस्थान के सिरोही जिले के सबसे बड़े अस्पताल में ही बच्चों के इलाज के लिए पर्याप्त सुविधाएं नहीं हैं, इसलिए सर्जरी समेत गंभीर बीमार बच्चों को यहां से रेफर किया जाता है. जिले में अभी तक एक साल में 13 बच्चों की मौत हो चुकी है, जिला अस्पताल में इलाज के लिए रोजाना 125 बच्चे पहुंच रहे हैं. यहां बने तीन वार्ड एसएनसीयू, पीएनसी व एमटीसी में भर्ती रहने वाले गंभीर बीमार बच्चों के 32 वॉर्मर बेड पर ऑक्सीजन की सेंट्रलाइज्ड सप्लाई तक नहीं होती. ऐसे में सिलेंडर से ऑक्सीजन देनी पड़ती है. 

हाल ही में विशेषज्ञ चिकित्सकों की टीम ने कोटा के जेकेलोन अस्पताल में ऑक्सीजन की सेंट्रलाइज्ड सप्लाई सीधे सभी नवजातों तक नहीं हो पाने को नौनिहालों की मौत का प्रमुख कारण बताया है. अब, स्थानीय अधिकारी भी बच्चों के मौत का कारण यही बता रहे हैं. एनएनसीयू में सेंट्रलाइज्ड ऑक्सीजन की लाइन बिछी हुई है, जबकि, पीएनसी व एमटीसी वार्ड में लाइन बिछाना बाकी है.

वहीं, आबूरोड में पिछले डेढ़ साल से शिशु रोग विशेषज्ञ नहीं होने से बच्चों को रेफर करना पड़ रहा है. इसके अलावा पिंडवाड़ा, सरूपगंज, रोहिड़ा, कृष्णगंज व रेवदर में भी पिछले काफी समय से शिशु रोग विशेषज्ञों की कमी है.जिला अस्पताल में जन्मजात मूक-बधिर नवजातों की जांच के लिए मशीन तक नहीं है. कोई भी सरकार हो, बच्चों की सेहत से जुड़े इस गंभीर मुद्दे पर आजतक किसी ने ध्यान नहीं दिया और न ही अस्पताल की तरफ झांकना मुनासिब समझा.

सिरोही जिला अस्पताल के एमटीसी वार्ड (कुपोषण उपचार केंद्र) में एक खिडक़ी टूटी हुई है, जबकि दूसरी जाम होने से बंद ही नहीं होती. ऐसे में हाड़ कंपाने वाली सर्दी में यहां भर्ती होने वाले बच्चे ठिठुर जाते हैं. एमटीसी वार्ड में महज 10 बेड ही होने से अमूमन एक बेड पर दो-दो, तीन-तीन बच्चों को सुला दिया जाता है. शिशु वार्ड प्रभारी डॉ. राजेंद्र कोठारी ने बताया कि एमटीसी वार्ड का विस्तार किया गया है. खिड़कियों की मरम्मत की गई थी। दुबारा करवा देंगे. डॉ. कोठारी ने बताया कि एक साल में 150 बच्चों को रेफर किया गया है. सेंट्रलाइज्ड ऑक्सीजन, फायर सिस्टम और संक्शन लाइन बिछाने का काम चल रहा है और जन्मजात मूक-बधिर नवजातों की जांच के लिए मशीन पहुंच चुकी हैं, लेकिन स्टाफ नहीं होने से काम में नहीं ली जा रही है.

शिवगंज सीएचसी में ग्यारह महिनों में 93 बच्चों को भर्ती किया गया, जिसमें से 19 बच्चों को उच्च श्रेणी अस्पताल में रेफर किया गया. अस्पताल प्रभारी डॉ. गोपाल सिंह ने बताया कि यहां शिशु विशेषज्ञ डॉ. माणकचंद जैन कार्यरत है और बच्चों का उपचार करने के लिए आपातकालीन वार्ड की सुविधा है.

आबूरोड के राजकीय सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में डेढ़ साल से शिशु रोग विशेषज्ञ ही नहीं है. सालभर से यहां से 17 गंभीर बीमार बच्चों को जिला अस्पताल रेफर किया गया. यहां पर छह वार्मर है इनमें से दो ही चालू है. शेष चार का विशेषज्ञ के अभाव में उपयोग नही हो रहा है. अस्पताल प्रभारी डॉ. एमएल हिंडोनिया के अनुसार डेढ़ साल से बालरोग विशेषज्ञ डॉक्टर नही होने से दिक्कत हो रही है. इसके अभाव में नवजात में क्रोनिक बीमारी होने पर उसे रेफर इलाज के लिए जिला मुख्यालय रेफर करना पड़ता है. डॉ. हिंगोनिया ने बताया कि सालभर में दस नवजात शिशुओं की मौत हुई है.

वहीं, उपखंड मुख्यालय का सबसे बड़ा अस्पताल एक डॉक्टर के भरोसे चल रहा है. यहां शिशु रोग विशेषज्ञ समेत पांच डॉक्टर्स के पद खाली है. सीएचसी में बच्चों के इलाज के लिए में वार्मर, एम्बोबैग ऑक्सीजन, एंटिविट, नेमबोलेजिन समेत अन्य उपकरण है, लेकिन विशेषज्ञ के अभाव में ये धूल फांक रहे हैं। सालभर में 171 बच्चों को इलाज किया. बाकी बच्चों को सिरोही रेफर किया.

आदिवासी बाहुल्य पिंडवाड़ा उपखंड मुख्यालय के सीएचसी में भी बच्चों के इलाज के लिए सरकारी अस्पताल में पर्याप्त सुविधाएं नहीं है. यहां 2016 से शिशु रोग विशेषज्ञ का पद खाली होने से वार्मर समेत अन्य मशीनें धूल बंद कमरे में धूल फांक रही हैं. पिंडवाड़ा में रोजाना करीब 70 बच्चे इलाज के लिए पहुंच रहे हैं, जिनका इलाज एमओ डॉ. कुंदन ङ्क्षसह गिल करते है. रोजाना 2 बच्चों को सिरोही अस्पताल रेफर किया जाता है.