पाली: मोमबत्ती लेकर अंधेरे में मांगे वोट, सरपंच बनते ही पूरे गांव में लगवाई LED लाइट्स

मतदान से एक दिन पहले जब जन संपर्क के लिए शाम को दिग्विजय सिंह अपने समर्थकों के साथ मोमबत्तियां हाथों में लेकर गांव की गलियों में निकले तो एक साथ सैकड़ों मोमबत्तियों से गलियां रोशनी से जगमगा उठीं. 

पाली: मोमबत्ती लेकर अंधेरे में मांगे वोट, सरपंच बनते ही पूरे गांव में लगवाई LED लाइट्स
पूरा गांव शाम 6 बजे के बाद अंधेरे में रहता था.

सुभाष रोहिसवाल, पाली: जिले में एक ऐसा गांव भी है, जो देश के आजाद होने के बाद से रोशनी से रोशन नहीं हुआ. रियासतकालीन जोधपुर नरेश उम्मेद सिंह के द्वारा बसाए सरदार समंद गांव में संपन्न परिवार के घर बिजली थी बाकी पूरा गांव शाम 6 बजे के बाद अंधेरे में रहता था.

पंचायत राज लागू हुआ. सरपंच आए और गए लेकिन गांव में रोशनी कैसे हो, किसी ने नहीं नहीं सोचा. आखिर गांव के युवा सरपंच दिग्विजय सिंह ने वो कर दिखाया, जो आज तक कोई नहीं कर सका. सरपंच ने एलईडी रोड लाइट के साथ दो हाई मास्क लाइट भी लगाई. इसके बाद जब एक साथ लाइट्स चालू की तो मानो पूरे गांव में दीपावली जैसा माहौल हो गया.

दरअसल, जोधपुर के महाराजा उम्मेद सिंह ने सरदार समंद गांव बसाया था. यहां पर महाराजा ने बांध के साथ-साथ लेक पैलेस भी बनाया, जिसमें आज भी राजपरिवार छुट्टियां मनाने आते हैं. कई बीघा जमीन महाराजा के नाम है. देश आजाद हो गया लेकिन ये गांव आज भी मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रहा है. कई सरकारें आईं और गईं लेकिन किसी भी सरकार के नुमाइंदों ने इसकी सुध नहीं ली. आजादी के बाद कुछ संपन्न लोगों के घर पर ही रोशनी के लिए बिजली कनेक्शन रहा बाकी पूरा गांव अंधेरे में डूबा चला आ रहा है.

गांव में चोरों का आतंक हो गया
सरदार समंद गांव का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि 70 साल बाद भी मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रहा है. न पानी है, न बिजली और न सड़क. पंचायत राज आ गया. गांव के कई सरपंच आए और लेकिन मूलभूत सुविधाओं का  विकास नहीं कर सके. गांव में चोरों का आतंक हो गया. कई बड़ी चोरियां हुईं. शराबियों  का आतंक अलग से था. शाम को महिलाओं का घर से बाहर निकलना दूभर हो गया.

युवा सरपंच लेकर आया गांव में रोशनी
रोशनी की किरण लेकर आया गांव का युवा सरपंच दिग्विजय सिंह. दिग्विजय सिंह ने अपनी पढ़ाई-लिखाई जोधपुर से की. छात्र जीवन में जोधपुर के जयनारायण विश्व विद्यालय से राजनीति शुरू की. विश्वविद्यालय अध्यक्ष पद के लिए चुनाव में खड़े हुए लेकिन फर्जी मुकदमे का शिकार हो गए.

आखिर में जोधपुर छोड़कर दिग्विजय सिंह अपने गांव सरदार समंद आ गए. यहां पर लोगों और ग्रामीणों के बीच गए और उनका दर्द समझा. उनकी सोच रही कि शहर में विकास हो सकता है तो गांव में क्यों नहीं. गांव वालों और परिवार वालों के सामने अपने विचार रखे और सभी के सहमत होने पर  सरपंच का चुनाव लड़ा. सरपंच चुनाव में दिग्विजय सिंह का चुनाव चिन्ह मोमबत्ती आय. इसी चुनावी चिन्ह ने दिग्विजय सिंह को रोशनी की किरण दिखाई दी.

मोमबत्ती से मांगे वोट
मतदान से एक दिन पहले जब जन संपर्क के लिए शाम को दिग्विजय सिंह अपने समर्थकों के साथ मोमबत्तियां हाथों में लेकर गांव की गलियों में निकले तो एक साथ सैकड़ों मोमबत्तियों से गलियां रोशनी से जगमगा उठीं. यहीं से दिग्विजय सिंह ने बीड़ा उठाया कि क्यों नहीं गांव में रोशनी हो जाए.

अधिकारियों से की बातचीत
अधिकारियों से इस  समस्या के बारे में  बात की. अपने पंचायत के कोरम  के साथ प्रस्ताव लिया. डिस्कॉम में अग्रिम पैसा भी जमा करवा दिया फिर भी गांव  में रोशनी नहीं हुई. सरपंच ने अपने प्रयास जारी रखे. एलईडी लाइट कम पैसा और ज्यादा रोशनी मिले तो इसके लिए एक कंपनी को ठेका दिया. गांव की गलियों में 95 एलईडी लाइट और हाई मास्क लाइट लगवा दी. आखिर वो अपने लक्ष्य में सफल हो ही गए. सभी लाइट का कनेक्शन टाइमर स्विच से कर दिया जो एक साथ जलती और बंद हो जाती. दीपावली की रात जब एक साथ गांव में लाइट जली तो पूरा गांव सफ़ेद रोशनी से नहा उठा. लोगों के चेहरे पर ख़ुशी को देखकर युवा सरपंच दिग्विजय सिंह  भी फूले नहीं समा रहे थे.

गांव के लोगों में छाई खुशी
लोगों का कहना है कि अब हमें कोई डर नहीं. घर की बहू-बेटियां रात को भी घर से आराम से बाहर जा सकती है. उनका कहना है कि युवा सरपंच दिग्विजय सिंह सरदार समंद गांव लिए मसीहा बनकर आए. ऐसे सरपंच अन्य सरपंचों के लिए मिसाल होते हैं.