भीलवाड़ा में जिला प्रशासन की कोशिशों के बाद भी नहीं सुधर रहा स्वच्छता का स्तर

डूंगरपुर के जिला अधिकारी ने जनता में स्वच्छता के प्रति जागरूकता पैदा की, लेकिन भीलवाड़ा की जनता को जिला अधिकारी के प्रयासों से कोई फर्क पड़ता नजर नहीं आ रहा है. 

भीलवाड़ा में जिला प्रशासन की कोशिशों के बाद भी नहीं सुधर रहा स्वच्छता का स्तर
जिसकी वजह से शहर की स्वच्छता रैटिंग में गिरावट आई है.

जयपुर: प्रदेश को स्वच्छ ओर सुंदर बनाने की दिशा में सभी निकायों, जिला प्रशासन, शहरी और ग्रामीण विकास से जुड़ी संस्थाओं को निर्देशित किया गया, लेकिन भीलवाड़ा को तत्कालीन भाजपा सरकार के राज में मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने सबसे गंदे शहर की ऐसी उपमा दी, जो सत्ता परिवर्तन के बाद भी नहीं हट पाई है. दिनों दिन सफाई की रेटिंग में अपने स्थान से गिरने वाले भीलवाड़ा को फिर से स्वच्छता के पायदान पर लाने और सबसे स्वच्छ शहर में शुमार करने के लिए जिला कलेक्ट्र ने सामाजिक संगठनों के साथ मिलकर एक पहल की शुरूआत की है. हालांकि करीब एक माह का समय बीत जाने के बाद भी डीएम की इस पहल का शहर में कोई खास असर देखने को नहीं मिला.

डूंगरपुर के जिला अधिकारी ने जनता में स्वच्छता के प्रति जागरूकता पैदा की, लेकिन भीलवाड़ा की जनता को कलेक्टर के प्रयासों से कोई फर्क पड़ता नजर नहीं आ रहा है. सफाई व्यवस्था में पिछड़े भीलवाड़ा को डूंगरपुर की तर्ज पर स्वच्छ बनाने के लिए भले ही कवायद शुरू की गई हो, लेकिन एक माह बाद भी शहर में हालात जस के तस है. 13 मई को अभियान की शुरूआत के समय दावे किए गये थे कि डूंगरपुर की तरह ही प्रत्येक मोहल्ले की समिति बनाई जायेगी, जिसमें 50 प्रतिशत महिलाएं होगी, हर बस्ती में इस प्रकार का अभियान चलाया जाऐगा, जिसमे गीला व सूखा कचरा अलग एकत्र किया जा सकेगा। समिति में स्थानीय उद्योगपतियों, सामाजिक संगठनों को जोड़ा जाऐंगा, लेकिन अब तक कोई प्रयास इस और नहीं किया गया.

नगर परिषद ने भी गत सालो में कई बार प्रयास कर शहर को स्वच्छ बनाने की कोशिश की, स्थिति यह है कि लाखों रुपए का खर्चा होने के बावजूद शहर गंदा है. शहर के सभी 55 वार्डों में ऑटोटिपर संचालित हैं. इन पर हर माह करीब 15 लाख रुपए खर्च हो रहे हैं. इसके बावजूद भी घरों से गंदगी एकत्र नहीं हो पा रही है. साफ तौर पर अगर देखा जाये तो शहरवासियों की बड़ी लापरवाही तो है, साथ ही साथ अधिकारियों की अनदेखी के चलते शहर ओडीएफ नहीं हो सका.

परिषद का काम सर्वे टीम को पसंद नहीं आया, सफाई के लिए लगे वाहनों में जीपीएस लगाना था, लेकिन नहीं लगने से इनकी ट्रेकिंग नहीं हो रही, परिषद में पूरे संसाधन नहीं है, गार्डन सूखे पड़े है, कचरा ढंग से एकत्र और निस्तारित नहीं हो रहा और परिषद राजस्व अर्जित करने में लगी है. ऐसे ही कई कारण है जिनकी वजह से शहर की स्वच्छता रैटिंग में गिरावट आई है. 

हालांकि शहर की बिगड़ी सफाई व्यवस्था के लिए केवल और केवल परिशद और प्रशासन को जिम्मेदार ठहराना एक हद तक सहीं नही है. क्योंकि परिषद ने नगर परिषद भीलवाड़ा के नाम से एप्लीकेशन बना कर लोगों की समस्याओं के निदान का प्रयास किया, लेकिन वह फ्लॉप हो गई. खुले में शौचमुक्त के लिए टीम जब सर्वे करने आई तो कीरखेड़ा में लोग खुलज में शौच करते पाए गए. इस पर शहर को ओडीएफ के दायरे से बाहर कर दिया गया. 

सर्वे टीम ने कचरे का निस्तारण सहीं नहीं मानते हुए अंक काट दिए. परिषद ने छह जगह स्मार्ट डस्टबिन लगाए, ताकि बाजार साफ रहे, लेकिन लोगों ने उसे भी फेल कर दिया. शहर के सभी वार्डो में ऑटोटीपर से घर-घर कचरा संग्रहण किया जाता है, लेकिन जनता इसमें भी यह बहाने बनाती है कि ऑटोटिपर बहुत जल्दी आता है. हम तो नौ बजे उठते हैं. ऐसे में इतना जल्दी कचरा नहीं डाल सकते हैं. हम नौकरी करते हैं. ऑटोटिपर देरी से आता है, तब तक हम ऑफिस चले जाते हैं. ऑटोटिपर आता है लेकिन रुकता नहीं है. ऐसे में कचरा डालने का समय नहीं मिलता. इस तरह की बातों ने आज शहर को सबसे गंदे शहर की उपमा दी है, लेकिन जनता को इससे कोई फर्क पड़ता नजर नहीं आ रहा.