कोरोना काल में मनरेगा ने तोड़ा 11 सालों का रिकॉर्ड, 1.55 लाख श्रमिकों को मिला रोजगार

लॉकडाउन की वजह से श्रमिकों को रोजगार से हाथ धोना पड़ा है. ऐसे में नरेगा लोगों के लिए तारणहार बनकर आया है. 

कोरोना काल में मनरेगा ने तोड़ा 11 सालों का रिकॉर्ड, 1.55 लाख श्रमिकों को मिला रोजगार
प्रतीकात्मक तस्वीर.

जयपुर: जिले में कोरोना काल में मनरेगा के तहत जॉबकार्डधारी ग्रामीण परिवारों को रोजगार देने में 11 साल का रिकॉर्ड पीछे छूट गया है. नरेगा वेबपोर्टल की एमआईएस रिपोर्ट के अनुसार, जिले में 2200 कार्यों पर रिकॉर्ड एक लाख 55 हजार श्रमिक परिवारों को रोजगार मिला है. 

जयपुर जिले की 600 ग्राम पंचायतों में 2200 स्थानों पर चल रहे मनरेगा कार्यों के बदले मजदूरों को प्रतिदिन 3 करोड़ का मेहनताना बांटा जा रहा है. पढ़ें यह रिपोर्ट-

लॉकडाउन की वजह से बेरोजगार हुए प्रवासी कामगारों को 'मनरेगा' ने बड़ी संजीवनी दी है. जहां 11 साल में जिले में मनरेगा में रोज 80 हजार श्रमिक काम करने से ऊपर आंकड़ा नहीं पहुंच पाया लेकिन लॉकडाउन में प्रवासी मजदूर आने के बाद मनरेगा में काम करने वालों की संख्या दोगुनी होकर 1.55 लाख हो गई हालांकि जिले में दो लाख जॉब कार्ड एक्टिव हैं. लगातार प्रवासियों के आने और मनरेगा में काम मांगे जाने के बाद जिला परिषद अमला इस योजना को लेकर बेहद गंभीर हो गया है.

पिछले 11 साल का इस बार रिकॉर्ड टूटा 
जिला परिषद के मुख्य कार्यकारी अधिकारी से लेकर अन्य अधिकारियों की टीम रोजाना कार्य स्थलों का निरीक्षण कर रही है. जिला परिषद सीईओ भारती दीक्षित ने बताया कि पिछले 11 साल का इस बार रिकार्ड टूटा है. जिले की 600 ग्राम पंचायतों में 2200 जगह मनरेगा के तहत विकास कार्य चल रहे है, जिनमें 1.55 लाख लोगों को मजदूरी का अवसर मिला है. मनरेगा से प्रवासी मजदूरों को रोजगार मिला है. 

जिले में दूदू विधायक बाबूलाल नागर के क्षेत्र में सबसे अधिक लोगों को मनरेगा में रोजगार मिला है जबकि झोटवाड़ा विधायक और मंत्री लालचंद कटारिया के क्षेत्र में सबसे कम लोगों को काम मिला है. जिले में मनरेगा के तहत स्थानीय आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए यह काम किए जा रहे हैं, जिनमें गांव-ढाणियों में तालाबों का जीर्णाद्वार, बांध निर्माण, नए तालाबों का निर्माण, मेड़बंदी, भूमि समतलीकरण, जलकुंड आदि कार्य हो रहे हैं.

बढ़ाई गई महिला मजदूरों की संख्या
उधर अब जिले में मनरेगा में आधी मेट महिलाएं होंगी. जिला परिषद सीईओ भारती दीक्षित ने बताया कि जिले में पहले करीब 17-20 फीसदी ही महिला मेट थी लेकिन अब महिला मजदूरों की संख्या देखकर 50 से 60 फीसदी महिला मेट बनाने का लक्ष्य रखा है. सभी ग्राम विकास अधिकारी और बीडीओ को 8वीं पास महिला को मेट बनाने के निर्देश दिए हैं. उन्होंने बताया कि कि यह महिला सशक्तिकरण का ही पार्ट है. महिला मेट का परिवर्तन उसी स्थिति में किया जा सकता है. जब उसके स्थान पर मेट पैनल में अन्य महिला दर्ज हो, रोजगार चाहती हो. हर पंचायत में तैयार करने वाले मेट पैनल में 50 फीसदी महिला जरूरी है. हर कार्यस्थल पर 10 से 50 श्रमिकों पर एक ट्रेंड मेट होता है, जो श्रमिकों को हर दिन का टास्क देता है. उनके काम के मुताबिक मजदूरी तय करता है. मेट बनने के लिए जॉबकार्डधारी ग्रामीण महिला-पुरुष का बीपीएल परिवार से होना जरूरी है. विधवा, परित्यक्ता, एकल महिला, विकलांग फिर एससी-एसटी, ओबीसी और फिर सामान्य वर्ग को मेट के लिए मौका मिलेगा.

मनरेगा में किस वर्ष कितने श्रमिकों को प्रतिदिन रोजगार
वर्ष             संख्या

2020          1,55,260
2019          57,076
2018          53,113
2017          44,126
2016          62,327
2015          48,237
2014          79,602
2013          56,618

किस ब्लॉक में कितने श्रमिक
आमेर- 3348, बस्सी- 18,215, चाकसू- 9018, दूदू- 42,790 ,फागी- 24,631, गोविंदगढ़- 5694, जालसू- 2684, जमवारामगढ़- 9242, झोटवाड़ा-1086, कोटपूतली- 4019, पावटा- 6997, सांभर- 7356, सांगानेर- 3849, शाहपुरा- 4949, विराटनगर- 8077.

बहरहाल, लॉकडाउन की वजह से श्रमिकों को रोजगार से हाथ धोना पड़ा है. ऐसे में नरेगा लोगों के लिए तारणहार बनकर आया है. मनरेगा योजना में प्रत्येक ग्रामीण को 100 दिन के काम का अधिकार है. पहले दूसरे धंधों में लगे कामगार लॉकडाउन की वजह से गांव-ढाणियों में आ गए. ऐसे में अब उनको इस योजना का काफी सहारा मिल रहा है. अब राज्य सरकार की ओर से प्रवासी श्रमिकों के मनरेगा के जॉबकार्ड बनाने के लिए विशेष अभियान शुरू किया है. इसके तहत श्रमिकों के नए जॉबकार्ड भी बन रहे हैं.