Nagaur News : राजपूताना रियासतों के दौर में पिछले 200 साल से भी ज्यादा समय से चली आ रही परंपरा के तहत हर साल, डीडवाना - कुचामन जिले के परबतसर में वीर तेजा मंदिर के पास स्थित विशाल मैदान में वीर तेजा जी इस मेले का आयोजन होता आ रहा है, जो इस बार एक बछड़े की कीमत के चलते अब तक खास रहा है.
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Nagaur News : एशिया के सबसे चर्चित और ऐतिहासिक पशु मेलों में से एक, डीडवाना-कुचामन जिले का परबतसर वीर तेजा पशु मेला इन दिनों पूरे परवान पर है. नागौरी नस्ल के बैलों के लिए देशभर में पहचान रखने वाला यह मेला न केवल किसानों और पशुपालकों का केंद्र है, बल्कि यहां आने वाले खरीददारों के लिए भी यह एक बड़ा आकर्षण बन चुका है.
हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश समेत कई राज्यों से आए खरीददार इन दिनों मेले की रौनक को और बढ़ा रहे हैं. राजपूताना रियासतों के दौर में पिछले 200 साल से भी ज्यादा समय से चली आ रही परंपरा के तहत हर साल, डीडवाना - कुचामन जिले के परबतसर में वीर तेजा मंदिर के पास स्थित विशाल मैदान में इस मेले का आयोजन किया जाता है.
मेले के आयोजक पशुपालन विभाग की ओर से सजावट, पशु देखभाल और खरीद-बिक्री की सभी व्यवस्थाएं की जाती हैं. पशुपालन विभाग में उपनिदेशक राजेंद्र प्रसाद जो कि इस मेले के प्रभारी है, उन्होंने बताया की "हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश सहित विभिन्न राज्यों से खरीददार यहां नागौरी नस्ल के बैल, ऊंट और अन्य पशु खरीदने आते हैं. हम पशुपालकों की सुविधा के लिए सभी औपचारिकताएं और जरूरी दस्तावेज यहीं तैयार कर देते हैं, ताकि रास्ते में उन्हें किसी परेशानी का सामना न करना पड़े.
परबतसर का यह मेला खास तौर पर नागौरी नस्ल के बैलों के लिए मशहूर है. हालांकि, पिछले कुछ वर्षों से तीन साल से कम उम्र के बछड़ों के परिवहन पर पाबंदी के कारण बाहरी राज्यों के कुछ पशुपालकों का रुझान थोड़ा कम हुआ है. बावजूद इसके, नागौरी नस्ल के बैलों की मांग आज भी राजस्थान से बाहर खूब है.
स्थानीय पशुपालक रतन ने बताया की "हम किसान पूरे साल बैलों को अच्छे चारे और देखभाल से तैयार करते हैं. नागौरी नस्ल के बैल मजबूत, तेज और मेहनती होते हैं, इसलिए उनकी मांग बाहर के राज्यों में बहुत है. यह मेला हमारे लिए बिक्री का सबसे बड़ा मंच है.
पशु मेले में बैलों के साथ-साथ ऊंट, घोड़े, भैंस और अन्य पशुओं की भी खरीद-बिक्री होती है. पशुपालन विभाग यहां विभिन्न प्रतियोगिताओं का आयोजन करता है. जैसे सबसे ताकतवर बैल, सबसे सुंदर भैंस, या सबसे अच्छे तरीके से सजे हुए पशु की प्रतियोगिता. विजेता पशुपालकों को सम्मानित किया जाता है.
इधर पंजाब से पशु खरीदने के लिए मेले में आए गुरप्रीत सिंह ने बताया की "मैं यहां खास नागौरी बैल खरीदने आया हूं. यहां के बैल मेहनत करने में माहिर होते हैं और खेती में बहुत काम आते हैं. नागौरी नस्ल के बैलों की फुर्ती लाजवाब होती है हम पंजाब में होने वाली पशुओं की दौड़ प्रतियोगिता के लिए खास तौर से नागौरी नस्ल का बैल खरीदने परबतसर आए है". वहीं एक और पशु खरीददार संतोष कुमार ने बताया की "परबतसर का मेला पूरे देश में मशहूर है. यहां एक जगह पर इतने अच्छे बैल और भैंस मिलना वाकई खास अनुभव है.
परबतसर का वीर तेजा पशु मेला सिर्फ खरीद-बिक्री का केंद्र नहीं, बल्कि यह राजस्थान की पशुपालन परंपरा, ग्रामीण संस्कृति और किसानों की मेहनत का उत्सव भी है. नागौरी नस्ल के बैलों की ताकत, ऊंटों की शान और ग्रामीण बाजार की चहल-पहल इसे देखने वालों के लिए यादगार अनुभव बनाती है.
यह मेला न केवल आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देता है, बल्कि सामाजिक मेल-जोल और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का भी बेहतरीन माध्यम है. मेला मैदान मे अब तक करीब 1300 पशु पहुंच चुके है. जिनमे सबसे ज्यादा गोवंश है. एशिया के प्रसिद्ध इस पशु मैले मे नागौरी नस्ल का एक बछड़ा एक लाख रूपये मे बिका है.
ये बछड़ा किसान भगवाना राम जाट निवासी ठाकरियावास तहसील डिडवाना का है. इसे पंजाब के गुरदासपुर के एक व्यापारी ने खरीदा है. व्यापारी ने बताया की इन बछड़ो को वें अपने गांव मे दौड़ प्रतियोगिता मे उतारते है. वही देर रात जिला प्रशासन और पशु पालन विभाग द्वारा सांस्कृतिक संध्या का भी आयोजन किया गया. रंगारंग प्रस्तुतियो मे लोक कलाकारों ने मारवाड़ी, कालबेलिया, घूमर और लोक गीतों सें दर्शकों को मन्त्रमुग्ध कर दिया. कार्यक्रम मे संस्कृति और परम्पराओं की झलक ने माहौल को उत्साहपूर्ण बना दिया.
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